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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह5 / 16

भजन 5

ब्याव बीनणी बिलखूं

तर्ज- ब्याव बीनणी बिलखूं...

धन-धन म्हारो भाग जागियो, सतगुरु आया आंगण में,

सगला म्हारा पाप धोय दिया, इस जुमले और जागण में । टेर।

समराथल सोने की नगरी, कण-कण हीरा मोती है,

जिण पर श्री गुरुदेव विराजे, अलख निरंजन जोती है।

आदि विष्णु जाम्भेजी रा, दर्शण पा लिया सागण मैं । 1।

भूल्यां भटक्या जीवां खातिर, जागण जमो रचायो है,

बरस एक में जमो दिराओ, ओही धरम भूलायो है ।

जमो दिराओ होम कराओ, सुख विष्णु गुण गावण में । 2।

बचपन खेलकूद में खोयो, भूल्यो रह्यो जवानी में,

गई जवानी, आयो बुढ़पो, गुरुजी री आज्ञा मानी मैं ।

भलो दिहाड़ो आज ऊगियो, बदी चवदश आई फागण में । 3।

इण जागण री महिमा भारी, मुख से वरणी ना जावे ।

हिरदे विष्णु नाम रहे, बाजोजी यूं फ रमावै ।

साधे मोमणे कमी ना राखी, साखी शब्द सुणावण में । 4।

धर्म कर्म ना भजन कियो है, जैसो तैसो हूं थारो।

दीन गरीब जान प्रभुजी बेड़ो पार करो म्हारो ।

भूली चूकी माफ करीज्यो, सेवा चाकरी राखण में । 5।

नवण प्रणाम मानज्यो म्हारी, सेवक भोलो भालो हूं,

ऊपर से उजलो दीसूं, पर मन भीतर सूं कालो हूं ।

रामकरण कहे फिर नहीं आऊं, इस आवा और जावण में । 6।