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गुरु जम्भेश्वर भगवान

सबदवाणी

सबदवाणी श्री गुरु जांभेश्वर भगवान के मुख से उच्चरित हुई है। प्रारंभ में यह मौखिक रूप में प्रचलित थी, तत्पश्चात् संत विल्होजी ने इसे लिपिबद्ध किया।

यहाँ उपलब्ध सबदवाणी स्वामी श्री कृष्णानंद आचार्य द्वारा संकलित एवं भावार्थित ग्रंथ ‘जंभसागर’ से ली गई है।

120 शब्द

120 शब्द

1गुरु चीन्हों गुरु चीन्ह् पुरोहित, गुरु मुख धर्म बखाणी। जो गुरु होयबा सहजे शीले शब्दे नादे वेदे, तिहिं गुरु का आलिंकार पिछाणी। छव दरसण जिहिं के रूपण थापण, संसार बरतण निज कर थरप्या सो गुरु प्रत्यक्ष जांणी। जिहिं के खरतर गोठ निरोतर वाचा, रहिया रूद्र समाणी। गुरु आप संतोषी अवरां पोखी, तंत महारस बांणी। के के अलिया बासण होत हुतासण, तामैं खीर दूहीजूं। रसूवन गोरस घीय न लीयूं, न तहां दूध न पाणी। गुरु ध्याईरे ज्ञानी तोड़त मोहा, अति खुरसाणी छीजत लोहा। पांणी छल तेरी खाल पखाला, सतगुरु तोड़े मन का साला। सतगुरु है तो सहज पिछाणी, कृष्ण चरित विन काचै करवै रह्यो न रहसी पांणी ॥1॥2मोरे छाया न माया लोही न मासूं, रक्तूं न धातूं मोरे माय न बापूं। आपण आपूं रोही न रापूं, कोपूं न कलापूं, दुख न सरापूं। लोई अलोई त्यूंह तृलोई ऐसा न कोई जंपा भी सोई, जिहिं जंपे आवागवण न होई। मोरी आद न जाणत, महीयल धूंवा बखाणत, उरध ढ़ाकले तृसूलूं। आद अनाद तो हम रचिलो, हमें सिरजीलो से कौण। म्हे जोगी के भोगी कै अल्प अहारी, ज्ञानी कै ध्यानी कै निज कर्मधारी। सोखी के पोखी, कै जल बिंबधारी, दया धर्म थापले निज बाला ब्रह्मचारी ॥2॥3मोरे अंग न अलसी तेल न मलियो, ना परमल पिसायो। जीमत पीवत भोगत विलसत दीसां नाही, म्हापण को आधारूं। अड़सठ तीर्थ हिरदै भीतर, बाहर लोका चारूं। नान्ही मोटी जीया जूणी, एति सांस फूरंतै सारूं। वासंदर क्यूं एक भणिजै, जिहिं के पवन पिराणों। आला सूका मेल्है नाही, जिहिं दिश करै मुहाणौं। पापे गुन्है वीहे नाही, रीस करै रीसाणौं। बहूली दौरे लावण हारू, भावै जाण मैं जाणूं। न तूँ सुरनर न तूँ शंकर, न तूँ राव न राणों। काचै पिण्ड अकाज चलावै, महा अधूरत दाणों। मौरे छुरी न धारूं लोह न सारूं, न हथियारूं। सूरज को रिप बिहंडा नाही, तातै कहा उठावत भारूं। जिहिं हाकणड़ी बलद जू हाकै, न लोहै की आरूं ॥3॥4जद पवन न होता पाणी न होता, न होता धर गैणारूं। चन्द न होता सूर न होता, न होता गिंगदर तारूं। गऊ न गोरू माया जाल न होता, न होता हेत पियारूं। माय न बाप न बहण न भाई, साख न सैण न होता पख परवारूं। लख चौरासी जीया जूणी न होती, न होती बणी अठारा भारूं। सप्त पाताल फूंणीद न होता, न होता सागर खारूं। अजिया सजिया जीया जूणी न होती, न होती कुड़ी भरतारूं। अर्थ न गर्थ न गर्व न होता, न होता तेजी तुरंग तुखारूं। हाट पटण बाजार न होता, न होता राज दवारूं। चाव न चहन न कोह का बाण न होता, तद होता एक निरंजन शिम्भू। कै होता धंधूकारूं बात कदो की पूछै लोई, जुग छतीस विचारूं। तांह परैरे अवर छतीसूं, पहला अन्त न पारूं। म्हे तदपण होता अब पण आछै, बल बल होयसा कह कद कद का करूँ विचारूं ॥4॥5अइयालो अपरंपर बाणी, म्हे जपां न जाया जीऊं। नव अवतार नमो नारायण, तेपण रूप हमारा थीयूं। जपी तपी तकपीर ऋषेश्वर, कांय जपीजै तेपण जाया जीऊं। खेचर भूचर खेत्रपाला परगट गुप्ता, कांय जपीजै तेपण जाया जीऊं। वासग शेष गुणिंदा फुणिंदा, कांय जपीजै तेपण जाया जीऊं। चोषट जोगनी बावन भैरूं, कांय जपीजै तेपण जाया जीऊं। जपां तो एक निरालंभ शिम्भू, जिहिं के माई न पीऊं। न तन रक्तूं न तन धातूं, न तन ताव न सीऊं। सर्व सिरजत मरत विवरजत, तास न मूल ज लेणा कीयों। अइयालो अपरंपर बाणी, म्हे जपां न जाया जीऊं ॥5॥6भवन भवन म्हें एका जोती, चुन चुन लिया रतना मोती। म्हे खोजी थापण होजी नाही, खोज लहां धुर खोजूं। अल्लाह अलेख अडाल अजोनी स्वयंभूं, जिहिं का किसा विनाणी। म्हे सरै न बैठा सीख न पूछी, निरत सुरत सब जाणी। उतपति हिन्दू जरणा जोगी, किरिया ब्राह्मण, दिल दरवेसां। उनमुन मुल्ला, अकल मिसलमानी ॥6॥7हिन्दू होय कै हरि क्यूं न जंप्यो, कांय दहदिश दिल पसरायो। सोम अमावस आदितवारी, कांय काटी बन रायों। गहण गहंते बहण बहंतै, निर्जल ग्यारस मूल बहंतै। कांयरे मुरखा तैं पालंग सेज निहाल बिछाई। जा दिन तेरे होम जाप न तप न किरिया, जान कै भागी कपिला गाई। कूड़ तणों जे करतब कियो, ना तै लाव न सायों। भूला प्राणी आल बखाणी, न जंप्यो सुर रायो। छंदै का तो बहुता भावै, खरतर को पतियायो। हिव की बेला हिव न जाग्यो, शंक रह्यो कदरायो। ठाढ़ी बेला ठार न जाग्यो, ताती बेला तायो। बिम्बै बैला विष्णु न जंप्यो, ताछै का चीन्हौं कछु कमायो। अति आलस भोलावै भूला, न चीन्हों सुररायो। पार ब्रह्म की सुध न जांणी, तो नागे जोग न पायो। परशुराम के अर्थ न मूवा, ताकी निश्चै सरी न कायो ॥7॥8सुण रे काजी सुण रे मुल्ला, सुण रे बकर कसाई। किणरी थरपी छाली रोसो, किणरी गाडर गाई। सूल चुभीजै करक दुहैली, तो है है जायों जीव न घाई। थे तुरकी छुरकी भिस्ती दावों, खायबा खाज अखाजूं। चर फिर आवै सहज दुहावै, तिसका खीर हलाली। जिसके गले करद क्यूं सारो, थे पढ़ सुण रहिया खाली ॥8॥9दिल साबत हज काबो नेड़ै, क्या उलबंग पुकारो। भाई नाऊँ बलद पियारो, ताकै गलै करद क्यूं सारों। बिन चीन्है खुदाय बिबरजत, केहा मुसलमानों। काफर मुकर होकर राह गुमायो, जोय जोय गाफिल करें धिंगाणों। ज्यूं थे पश्चिम दिशा उलबंग पुकारो, भल जे यो चिन्हों रहमाणों। तो रूह चलंते पिण्ड पड़ंतै, आवै भिस्त विमाणों। चढ़ चढ़ भींते मड़ी मसीते, क्या उलबंग पुकारो। कांहे काजै गऊ विणासै, तो करीम गऊ क्यूं चारी। कांही लीयो दूधूं दहियूं, कांही लीयूं घीयूं महीयूं। कांही लीयूं हाडूं मासूं, काहीं लीयूं रक्तूं रूहियूं। सुणरे काजी सुणरे मुल्ला, यामै कोण भया मुरदारूं। जीवां ऊपर जोर करीजै, अंत काल होयसी भारूं ॥9॥10विसमिल्ला रहमान रहीम, जिहिं कै सदकै भीना भीन। तो भेटिलो रहमान रहीम, करीम काया दिल करणी। कलमा करतब कौल कुराणों, दिल खोजो दरबेश भइलो तइयां मुसलमानों। पीरां पुरूषां जमी मुसल्ला, कर्तब लेक सलामों। हम दिल लिल्ला तुम दिल लिल्ला, रहम करे रहमाणों। इतने मिसले चालो मीयां, तो पावो भिस्त इमाणों ॥10॥11दिल साबत हज काबो नैड़ै, क्या उलबंग पुकारो। सीने सरवर करो बंदगी, हक्क निवाज गुजारो। इंहि हैड़ै हर दिन की रोजी, तो इस ही रोजी सारों। आप खुदाय बंद लेखौ मांगै, रे वीन्है गुन्है जीव क्यूं मारो। थे तक जाणों तक पीड़ न जांणो, विन परचै वाद निवाज गुजारो। चर फिर आवै सहज दुहावै, जिसका खीर हलाली। तिसके गले करद क्यूं सारौ, थे पढ़ सुण रहिया खाली। थे चढ़ चढ़ भींते मड़ी मसीते, क्या उलबंग पुकारो। कारण खोटा करतब हीणा, थारी खाली पड़ी निवाजूं। किहिं ओजूं तुम धोवो आप, किहिं ओजूं तुम खण्डा पाप। किहिं ओजूं तुम धरो धियान, किहिं ओजूं चीन्हों रहमान। रे मुल्ला मन मांही मसीत नमाज गुजारिये, सुणता ना क्या खरै पुकारिये। अलख न लखियो खलक पिछाण्यो, चांम कटै क्या हुइयो। हक हलाल पिछाण्यों नांही, तो निश्चै गाफल दोरै दीयो ॥11॥12महमद महमद न कर काजी, महमद का तो विषम विचारूं। महमंद हाथ करद जो होती, लोहै घड़ी न सारूं। महमद साथ पयंबर सीधा, एक लख असी हजारूं। महमद मरद हलाली होता, तुम ही भये मुरदारूं ॥12॥13कांय रे मुरखा तै जन्म गुमायो, भुंय भारी ले भारूं। जां दिन तेरे होम नै जाप नै, तप नै किरिया। गुरु नै चीन्हौं पन्थ न पायो, अहल गई जमवारूं। ताती बेला ताव न जाग्यो, ठाढ़ी बेला ठारूं। बिंम्बै बैला विष्णु न जंप्यो, तातै बहुत भई कसवारूं। खरी न खाटी देह बिणाठी, थीर न पवना पारूं। अहनिश आव घटंती जावै, तेरे श्वांस सबी कसवारूं। जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ते नर कुबरण कालूं। जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ते नगरे कीर कहारूं। जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ते कांध सहै दुख भारूं। जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ते घण तण करै अहारूं। जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ताको लोही मांस विकारूं। जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, गावै गाडर सहरै सुवर जन्म जन्म अवतारूं। जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ओडा के घर पोहण होयसी, पीठ सहै दुःख भारूं। जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, राने वासो मोनी बैसे ढ़ूकै सूर सवारूं। जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ते अचल उठावत भारूं। जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ते न उतरिबा पारूं। जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ते नर दौरे घुप अंधारूं। तातै तंत न मंत न जड़ी न बूंटी, ऊंडी पड़ी पहारूं। विष्णु न दोष किसो रे प्राणी, तेरी करणी का उपकारूं ॥13॥14मोरा उपख्यान वेदूं कण तत भेदूं, शास्त्रे पुस्तके लिखणा न जाई। मेरा शब्द खोजो, ज्यूं शब्दे शब्द समाई। हिरणा द्रोह क्यूं हिरण हतीलूं, कृष्ण चरित बिन क्यूं बाघ बिडारत गाई। सुनही सुनहा का जाया, मुरदा बघेरी बघेरा न होयबा। कृष्ण चरित विन, सींचाण कब ही न सुजीऊ। खर का शब्द न मधुरी बाणी, कृण चरित बिन श्वान न कबही गहीरूं। मुंडी का जाया मुंडा न होयबा, कृष्ण चरित बिन रीछा कबही न सुचीलूं। बिल्ली की इन्द्री संतोष न होयबा, कृष्ण चरित बिन काफरा न होयबा लीलूं। मुरगी का जाया मोरा न होयबा, कृष्ण चरित बिन भाकला न होयबा चीरूं। दंत बिवाई जन्म न आई, कृष्ण चरित बिन लोहै पड़ै न काठ की सूलूं। नींबड़िये नारेल न होयबा, कृष्ण चरित बिन छिलरे न होयबा हीरूं। तूंबण नागर बेल न होयबा, कृष्ण चरित बिन बांवली न केली केलूं। गऊ का जाया खगा न होयबा, कृष्ण चरित बिन दया न पालत भीलूं। सूरी का जाया हस्ती न होयबा, कृष्ण चरित बिन ओछा कबही न पूरूं। कागण का जाया कोकला न होयबा, कृष्ण चरित बिन बुगली न जनिबा हंसूं। ज्ञानी कै हृदय प्रमोध आवत, अज्ञानी लागत डासूं ॥14॥15सुरमां लेणां झीणा शब्दूं, म्हे भूल न भाख्या थूलूं। सो पति बिरखा सींच प्राणी, जिहिं का मीठा मूल स मूलूं। पाते भूला मूल न खोजो, सींचो कांय कु मूलूं। विष्णु विष्णु भण अजर जरीजै, यह जीवन का मूलूं। खोज प्राणी ऐसा विनाणी, केवल ज्ञानी, ज्ञान गहीरूं, जिहिं कै गुणै न लाभत छेहूं। गुरु गेवर गरवां शीतल नीरूं, मेवा ही अति मेऊं। हिरदै मुक्ता कमल संतोषी, टेवा ही अति टेऊ। चड़कर बोहिता भवजल पार लंघावै, सो गुरु खेवट खेवा खेहूं ॥15॥16लोहे हूंता कंचन घड़ियो, घड़ियो ठाम सु ठाऊं। जाटा हूंता पात करीलूं, यह कृष्ण चरित परिवाणों। बेड़ी काठ संजोगे मिलिया, खेवट खेवा खेहूं। लोहा नीर किसी विध तरिबा, उत्तम संग सनेहूं। बिन किरिया रथ बैसैला, ज्यूं काठ संगीणी लोहा नीर तरीलूं। नांगड़ भांगड़ भूला महियल, जीव हतै मड़ खाइलो ॥16॥17मोरै सहजे सुन्दर लोतर बाणी, ऐसो भयो मन ज्ञानी। तइयां सासूं तइयां मांसूं, रक्तूं रूहीयूं, खीरूं नीरूं, ज्यूं कर देखूं। ज्ञान अंदेसूं, भूला प्राणी कहे सो करणों। अइ अमाणों तत समाणों, अइया लो म्हे पुरुष न लेणा नारी। सोदत सागर सो सुभ्यागत, भवन भवन भिखियारी। भीखी लो भिखियारी लो, जे आदि परम तत्व लाधों। जांकै बाद विराम विरासों सांसो, तानै कौन कहसी साल्हिया साधों ॥17॥18जां कुछ जां कुछ जां कुछू न जांणी, नां कुछ नां कुछ तां कुछ जांणी। ना कुछ ना कुछ अकथ कहाणी, ना कुछ ना कुछ अमृत बाणी। ज्ञानी सो तो ज्ञानी रोवत, पढ़िया रोवत गाहे। केल करंता मोरी मोरा रोवत, जोय जोय पगां दिखाही। उरध खैणी उनमन रोवत, मुरखा रोवत धाही। मरणत माघ संघारत खेती, के के अवतारी रोवत राही। जड़िया बूंटी जे जग जीवै, तो वेदा क्यूं मर जाही। खोज पिराणी ऐसा विनाणी, नुगरा खोजत नाही। जां कुछ होता ना कुछ होयसी, बल कुछ होयसी ताही ॥18॥19रूप अरूप रमूं पिण्डे ब्रह्मण्डे, घट घट अघट रहायो। अनन्त जुगां में अमर भणीजूं, ना मेरे पिता न मायो। ना मेरे माया न छाया, रूप न रेखा, बाहर भीतर अगम अलेखा। लेखा एक निरंजन लेसी, जहाँ चीन्हों तहां पायो। अड़सठ तीर्थ हिरदा भीतर, कोई कोई गुरु मुख बिरला न्हायो ॥19॥20जां जां दया न मया, तां तां बिकरम कया। जां जां आव न वैसूं, तां तां सुरग न जैसूं। जां जां जीव न ज्योति, तां तां मोख न मुक्ति। जां जां दया न धर्मूं, तां तां बिकरम कर्मूं। जां जां पाले न शीलूं, तां तां कर्म कुचीलूं। जां जां खोज्या न मूलूं, तां तां प्रत्यक्ष थूलूं। जां जां भेद्या न भेदूं, तो सुरगे किसी उमेदूं। जां जां घमण्डै स घमण्डूं, ताकै ताव न छायो, सूतै सांस नशायो ॥20॥21जिहिं के सार असारूं, पार अपारूं, थाघ अथाघूं। उमग्या समाघूं, ते सरवर कित नीरूं। बाजा लो भल बाजा लो, बाजा दोय गहीरूं। एकण बाजै नीर बरसै, दूजै मही बिरोलत खीरूं। जिहिं के सार असारूं, पार अपारूं, थाघ अथाघूं। उमग्या समाघूं, गहर गंभीरूं, गगन पयाले, बाजत नादूं। माणक पायो फेर लुकायो, नहीं लखायो। दुनिया राती बाद विवादूं, बाद विवादे दाणूं खीणां ज्यूं पहुपे खीणां भंवरी भंवरा। भावै जाण म जाण पिराणी, जोलै का रिप जंवरा। भेर बाजातो एक जोजनो, अथवा तो दोय जोजनो। मेघ बाजा तो पंच जोजनो, अथवा तो दश जोजनो। सोई उतम ले रे प्राणी, जुगां जुगांणी सत कर जांणी। गुरु का शब्द ज्यूं बोलो झीणी बाणी, जिहिं का दूरा हूंतै दूर सुणीजै। सो शब्द गुणां कारूं, गुणां सारूं बले अपारूं ॥21॥22लो लो रे राजिंदर रायों, बाजै बाव सुवायो। आभै अमी झुरायो, कालर करसण कियो, नैपै कछू न कीयो। अइया उत्तम खेती, को को इमृत रायो, को को दाख दिखायो। को को ईख उपायो, को को नींब निंबोली, को को ढ़ाक ढ़कोली। को को तूषण तूंबण बेली, को को आक अकायो, को को कछू कमायो। ताका मूल कुमूलूं, डाल कुडालूं, ताका पात कुपातूं। ताका फल बीज कूबीजूं, तो नीरे दोष किसायो। क्यूं क्यूं भऐ भाग ऊणां, क्यूं क्यूं कर्म बिहूणां, को को चिड़ी चमेड़ी। को को उल्लू आयो, ताकै ज्ञान न ज्योति, मोक्ष न मुक्ति। यांके कर्म इसायो, तो नीरे दोष किसायों ॥22॥23साल्हिया हुवा मरण भय भागा, गाफिल मरणै घणा डरै। सतगुरु मिलियो सतपन्थ बतायो, भ्रान्त चुकाई, मरणे बहु उपकार करे। रतन काया सोभंति लाभै, पार गिराये जीव तिरै, पार गिराये सनेही करणी। जंपो विष्णु न दोय दिल करणी, जंपो विष्णु न निंदा करणी। मांडो कांध विष्णु के सरणै, अतरा बोल करोजे साचा तो पार गिराय गुरु की वाचा। रवणां ठवणां चवरां भवणां, ताहि परेरै रतन काया छै, लाभै किसे विचारे। जे नविये नवणी, खविये खवणी, जरिये जरणी। करिये करणी, तो सीख हुवां घर जाइये। रतन काया सांचे की ढ़ोली, गुरु प्रसादे, केवल ज्ञाने। धर्म आचारे शीले संजमें, सतगुरु तुठे पाइये ॥23॥24आसण बैसण कूड़ कपटण, कोई कोई चीन्हत वोजूं वाटे। वोजूं वाटै जे नर भया, काची काया छोड़ कैलाशै गया ॥24॥25राज न भूलीलो राजेन्द्र, दुनी न बंधै मेरूं। पवणा झोलै बिखर जैला, धुंवर तणा जै लोरूं। वोलस आभै तणा लहलोरूं, आडा डंबर केती बार बिलंबण, यो संसार अनेहूं। भूला प्राणी विष्णु न जंप्यो, मरण विसारो केहूं। म्हां देखंता देव दाणूं, सुरनर खीणां, जंबू मंझे राचि न रहिबा थेहूं। नदिये नीर न छीलर पाणी, धूंवर तणां जे मेहूं। हंस उडाणों पन्थ विलंब्यो, आसा सास निरास भईलो। ताछै होयसी रंड निरंडी देहूं, पवणा झोलै बिखर जैला गैण विलंबी खेहूं ॥25॥26घण तण जीम्या को गुण नांही, मल भरिया भण्डारूं। आगे पीछे माटी झूलै, भूला बहैज भारूं। घणा दिनां का बड़ा न कहिबा, बड़ा न लंघिबा पारूं। उत्तम कुली का उत्तम न होयबा, कारण किरिया सारूं। गोरख दीठा सिद्ध न होयबा, पोह उतरबा पारूं। कलयुग बरतै चेतो लोई, चेतो चेतण हारूं। सतगुरु मिलियो सतपन्थ बतायो, भ्रान्त चुकाई, विदगा रातै उदगा गारूं ॥26॥27पढ़ कागल वेदूं, शास्त्र शब्दूं, पढ़ सुन रहिया कछू न लहिया। नुगरा उमग्या काठ पखाणों, कागल पोथा ना कुछ थोथा, ना कुछ गाया गीयूं। किण दिश आवै किण दिश जावै, माई लखे न पीऊ। इण्डे मध्ये पिंड उपन्ना, पिंडा मध्ये बिंब उपन्ना। किण दिश पैठा जीऊं, इंडा मध्ये जीव उपन्ना। सुण रे काजी सुण रे मुल्ला, पीर ऋषिश्वर रे मसवासी। तीरथ वासी, किण घट पैठा जीऊं। कंसा शब्दे कंस लुकाई, बाहर गई न रीऊ। क्षिण आवै क्षिण बाहर जावै, रूतकर बरषत सीऊं। सोवन लंक मन्दोदर काजै, जोय जोय भेद विभिषण दीयो। तेल लियो खल चोपै जोगी, तिहिं को मोल थोड़े रो कियो। ज्ञाने ध्याने नादे वेदे जे नर लेणा, तत भी तांही लीयो। करण दधीच सिंवर बलराजा, हुई का फल लीयो। तारा दे रोहितास हरिचन्द, काया दशबन्ध दीयो। विष्णु अजंप्या जनम अकारथ, आके डोडे खींपे फलीयो, काफर विवरजत रूहीयूं। सेतूं भातूं बहु रंग लेणा, सब रंग लेणा रूहीयूं। नाना रे बहुरंग न राचै, काली ऊन कुजीऊं। पाहे लाख मजीठी राता, मोल न जिहिं का रूहीयो। कबही वो ग्रह ऊथरी आवै, शैतानी साथै लीयो। ठोठ गुरु वृषलीपति नारी, जद बंकै जद बीरूं। अमृत का फल एक मन रहिबा, मेवा मिष्ट सुभायो। अशुद्ध पुरुष वृषलीपति नारी, बिन परचै पार गिराय न जाई। देखत अन्धा सुणता बहरा, तासों कछु न बसाई ॥27॥28मच्छी मच्छ फिरै जल भीतर, तिहि का माघ न जोयबा। परम तत्व है ऐसा, आछै उरवार न ताछै पारूं। ओवड़ छोवड़ कोई न थीयों, तिहिं का अन्त लहिबा कैसा। ऐसा लो भल ऐसा लो, भल कहो न कहा गहीरूं। परम तत्व के रूप न रेखा, लीक न लेहूं खोज न खेहूं। वरण विवरजत भावै खोजो बावन बीरूं। मीन का पंथ मीन ही जाणै, नीर सुरंगम रहीयूं। सिध का पन्थ कोई साधु जाणत, बीजा बरतन बहियों ॥28॥29गुरु के शब्द असंख्य प्रबोधी, खार समंद परीलो। खार समंद परै परै रे, चौखण्ड खारूं, पहला अन्त न पारूं। अनन्त कोड़ गुरु की दावण बिलंबी, करणी साच तरीलो। सांझे जमो सवेरे थापण, गुरु की नाथ डरीलो। भगवी टोपी थलसिर आयो, हेत मिलाण करीलो। अम्बाराय बधाई बाजै, हृदय हरि सिंवरीलो। कृष्ण मया चौखण्ड कृषाणी, जम्बू दीप चरीलो। जम्बू दीप ऐसो चर आयो, इसकन्दर चेतायो। मान्यो शील हकीकत जाग्यो, हक की रोजी धायों। ऊनथ नाथ कुपह का पोहमा आण्या, पोह का धुर पहुंचाया। मोरे धरती ध्यान वनस्पति वासों, ओजूं मण्डल छायों। गीन्दूं मेर पगाणै परबत, मनसा सोड़ तुलायो। ऐ जुग चार छतीसा और छतीसां, आश्रा बहै अंधारी, म्हे तो खड़ा बिहायो। तेतीसां की बरग बहां म्हे, बारा काजै आयो। बारा थाप घणा न ठाहर मतांतो डीले डीले कोड़ रचायो, म्हे ऊंचै मण्डल का रायों। समन्द बिरोल्यो वासग नेतो, मेर मथाणी थायों। संसा अर्जुन मारयो कारज सारयो, जद म्हे रहंस दमामा वायो। फैरी सीत लई जद लंका, तद म्हे ऊथे थायो। दशसिर का दश मस्तक छेद्या, बाण भला निरतायो। म्हे खोजी थापण होजी नाही, लह लह खेलत डायों। कंसा सुर सूं जूवै रमिया, सहजै नन्द हरायो। कूंत कंवारी कर्ण समानों, तिहिं का पोह पोह पड़दा छायो। पाहे लाख मजीठी पाखों, बनफल राता पीझूं पाणी के रंग धायो। तेपण चाखन चाख्या भाख न भाख्या,जोय जोय लियो फल फल केर रसायो। थे जोग न जोग्या भोग न भोग्या, न चीन्हों सुर रायो। कण बिन कूकस कांस पीसों, निश्चै सरी न कायों। म्हे अवधूं निरपख जोगी, सहज नगर का रायों। जो ज्यूं आवै सो त्यूं थरपा, साचा सूं सत भायो। मोरै मन ही मुद्रा तन ही कंथा, जोग मारग सहडायों। सात शायर म्हे कुरलै कीयो, ना मैं पीया न रह्या तिसायों। डाकण शाकण निंद्रा खुध्या, ये म्हारै तांबै कूप छिपायों। म्हारै मन ही मुद्रा तन ही कंथा, जोग मारग सहलियो। डाकण शाकण निंद्रा खुध्या, ऐ मेरे मूल न थीयों ॥29॥30आयो हंकारो जीवड़ो बुलायो, कह जीवड़ा के करण कमायो। थर हर कंपै जीवड़ो डोलै, उत माई पीव न कोई बोलै। सुकरत साथ सगाई चालै, स्वामी पवणा पाणी नवण करंतो। चंदे सूरे शीस निवंतो, विष्णु सूरां पोह पूछ लहन्तो। इहिं खोटे जनमन्तर स्वामी, अहनिश तेरो नाम जपंतो। निगम कमाई मांगी मांग, सुरपति साथ सुरासूं रंग। सुरपति साथ सुरां सूं मेलो, निज पोह खोज ध्याइये। भोम भली कृषाण भी भला, बूठो है जहाँ बाहिये। करषण करो सनेही खेती, तिसियां साख निपाइये। लुण चुण लीयो मुरातब कीयो, कण काजै खड़ गाहिये। कण तुस झेड़ो होय नवेड़ो, गुरु मुख पवन उड़ाइये। पवणां डोलै तुस उड़ेला, कण ले अर्थ लगाइये। यूं क्यूं भलो जे आप न फरिये, अवरां अफर फराइये। यूं क्यूं भलो जे आप न डरिये, अवरां अडर डराइये। यूं क्यूं भलो जे आप न जरिये, अवरां अजर जराइये। यूं क्यूं भलो जे आप न मरिये, अवरां मारण धाइये। पहलै किरिया आप कमाइये, तो औरां न फरमाइये। जो कुछ कीजै मरणै पहले, मत भल कहि मर जाइयै। शौच स्नान करो क्यूं नाही, जिवड़ा काजै न्हाइये। शौच स्नान कियो जिन नाही, होय भैंतूला बहाइये। शील विवरजित जीव दुहेलो, यमपुरी ये सताइये। रतन काया मुख सुवर बरगो, अबखल झंखे पाइये। सवामण सोनो करणै पाखो, किण पर वाह चलाइये। एक गऊ ग्वाला ऋषि मांगी, करण पखों किण सुरह सुबच्छ दुहाइये। करण पखों किन कंचन दीन्हों, राजा कवन कहाइये। रिण ऋद्धे स्वामी करण पाखों, कुण हीरा डसन पुलाइये। किहिं निस धर्म हुवै धुर पुरो, सुर की सभा समाइये। जे नविये नवणी, खविये खवणी, जरिये जरणी। करिये करणी, तो सीख हुयां घर जाइये। अहनिश धर्म हुवै धुर पूरौ, सुर की सभा समाइये। किहिं गुण विदरों पार पहुंतो, करणै फेर बसाइये। मन मुख दान जु दीन्हों करणै, आवागवण जु आइयै। गुरु मुख दान जु दीन्हों बिदुरै, सुर की सभा समाइये। निज पोह पाखों पार असी पुर, जाणी गीत विवाहे गाइयै। भरमी भूला वाद विवाद, आचार विचार न जाणत स्वाद। कीरत के रंग राता मुरखा मन हट मरे, ते पार गिराये कित उतरै ॥30॥31भल मूल सींचो रे प्राणी, ज्यूं का भल बुद्धि पावै। जामण मरण भव काल जु चूकै, तो आवागवण न आवै। भल मूल सींचो रे प्राणी, ज्यूं तरवर मेल्हत डालूं। हरि परि हरि की आंण न मानी, झंख्या झूल्या आलूं। देवां सेवां टेव न जांणी, न बंच्या जम कालूं। भूलै प्राणी विष्णु न जंप्यो, मूल न खोज्यो, फिर फिर जोया डालूं। बिन रैणायर हीरे नीरे नग न सीपै, तके न खोला नालूं। चलन चलंते वास वसंतै, जीव जीवंते सास फुरंतै। काया निवंती कांयरे प्राणी विष्णु न घाती भालूं। घड़ी घटन्तर पहर पटन्तर रात दिनंतर, मास पखंतर, क्षिण ओल्हरबा कालूं। मीठा झूठा मोह बिटंबण, मकर समाया जालूं। कबही को बांइदो बाजत लोई, घड़िया मस्तक तालूं। जीवां जूणी पड़ै परासा, ज्यूं झींवर मच्छी मच्छा जालूं। पहले जीवड़ो चेत्यो नांही, अब ऊंडी पड़ी पहारूं। जीव' र पिंड बिछोड़ो होयसी, ता दिन थाक रहे सिर मारूं ॥31॥32कोड़ गऊ जे तीरथ दानों, पंच लाख तुरंगम दानों। कण कंचन पाट पटंबर दानों, गज गेंवर हस्ती अति बल दानों। करण दधीच सिंवर बल राजा, श्री राम ज्यूं बहुत करै आचारूं। जां जां बाद विवादी अति अहंकारी, लबद सवादी। कृष्ण चरित बिन, नाहि उतरिबा पारूं ॥32॥33कवण न हुवा कवण न होयसी, किण न सह्या दुख भारूं। कवण न गइयां कवण न जासी, कवण रह्या संसारूं। अनेक अनेक चलंता दीठा, कलि का माणस कौन विचारूं। जो चित होता सो चित नाही, भल खोटा संसारूं। किसकी माई किसका भाई, किसका पख परवारूं। भूली दुनिया मर मर जावै, न चीन्हों करतारूं। विष्णु विष्णु तूँ भण रे प्राणी, बल बल बारम्बारूं। कसणी कसबा भूल न बहबा, भाग परापति सारूं। गीता नाद कविता नाऊँ, रंग फटारस टारूं ॥33॥34फुंरण फुंहारे कृष्णी माया, घण बरसंता सरवर नीरे। तिरी तिरन्तै तीर, जे तिस मरै तो मरियो। अन्नों धन्नों दूधूं दहीयूं, घीयूं मेऊ टेऊ जे लाभंता। भूख मरै तो जीवन ही बिन सरियो। खेत मुक्तले कृष्णों अर्थो, जे कंध हरे तो हरियो। विष्णु जपन्ता जीभ जु थाकै, तो जीभड़ियां बिन सरीयूं। हरि हरि करता हरकत आवै, तो ना पछतावो करियो। भीखी लो भिखीयारी लो, जे आदि परम तत लाधों। जांकै बाद विराम विरांसो सांसो, तानै कौण कहसी साल्हिया साधों ॥34॥35बल बल भणत व्यासूं, नाना अगम न आसूं, नाना उदक उदासूं। बल बल भई निरासूं, गल में पड़ी परासूं, जां जां गुरु न चीन्हों। तइया सींच्या न मूलूं, कोई कोई बोलत थूलूं ॥35॥36काजी कथै कुराणों, न चीन्हों फरमांणों, काफर थूल भयाणों। जइया गुरु न चीन्हों, तइया सींच्या न मूलूं, कोई कोई बोलत थूलूं ॥36॥37लोहा लंग लुहारूं, ठाठा घड़ै ठठारूं, उत्तम कर्म कुम्हारूं। जइयां गुरु न चीन्हों, तइयां सींच्या न मूलूं, कोई कोई बोलत थूलूं ॥37॥38रे रे पिण्ड स पिण्डूं, निरघन जीव क्यूं खंडूं, ताछै खंड बिहंडूं। घड़िये से घमण्डूं, अइयां पन्थ कु पन्थूं, जइयां गुरु न चीन्हों। तइयां सींच्या न मूलूं, कोई कोई बोलत थूलूं ॥38॥39उत्तम संग सूं संगूं, उत्तम रंग सूं रंगूं, उत्तम लंग सूं लंगूं। उत्तम ढ़ंग सूं ढ़ंगूं, उत्तम जंग सूं जंगूं, तातै सहज सुलीलूं। सहज सुं पंथूं, मरतक मोक्ष दवारूं ॥39॥40सप्त पताले तिहूं त्रिलोके, चवदा भवने गगन गहीरे। बाहर भीतर सर्व निरंतर, जहाँ चीन्हों तहां सोई। सतगुरु मिलियों सतपंथ बतायो, भ्रान्त चुकाई, अवर न बुझबा कोई ॥40॥41सुण राजेन्द्र, सुण जोगेन्द्र, सुण शेषिन्द्र, सुण सोफिन्द्र। सुण काफिन्द्र, सुण चाचिन्द्र, सिद्धक साध कहाणी। झूठी काया उपजत विणसत, जां जां नुगरे थिती न जांणी ॥41॥42आयसां काहे काजै खेह भकरूड़ो, सेवो भूत मसाणी। घड़ै ऊंधै बरसत बहु मेहा, तिहिमां कृष्ण चरित बिन पड़यो न पड़सी पाणी। योगी जंगम नाथ दिगंबर, सन्यासी ब्राह्मण ब्रह्मचारी। मनहट पढ़िया पण्डित, काजी मुल्ला खेलै आपदवारी। निश्चै कायों वायों होयसी, जै गुरु विना खेल पसारी ॥42॥43ज्यूं राज गये राजिन्दर झूरै, खोज गऐ न खोजी। लाछ मुई गिरहायत झूरै, अरथ बिहूणां लोगी। मोर झड़ै कृषाण भी झूरै, बिंद गये न जोगी। जोगी जंगम जपिया तपिया, जती तपी तक पीरूं। जिहिं तुल भूला पाहण तोलै, तिहि तुल तोलत हीरूं। जोगी सो तो जुग जुग जोगी, अब भी जोगी सोई। थे कान चिरावों, चिरघट पहरो, आयसां यह पाखण्ड तो जोग न कोई। जटा बधारों जीव सिंघारो, आयसां इहि पाखण्ड तो जोग न होई ॥43॥44खरतर झोली खरतर कंथा, कांध सहै दुख भारूं। जोग तणी थे खबर नहीं पाई, कांय तज्या घर बारूं। ले सूई धागा सीवण लागा, करड़ कसीदी मेखलियों। जड़ जटा धारी लंघै न पारी, बाद विवाद बे करणों। थे वीर जपो बेताल धियावो, कांय न खोजो तत कणों। आयसां डंडत डंडूं मुंडत मूंडूं, मुंडत माया मोह किसो। भरमी वादी वादे भूला, कांय न पाली जीव दयों ॥44॥45दोय मन दोय दिल सिवी न कंथा, दोय मन दोय दिल पुली न पंथा। दोय मन दोय दिल कही न कथा, दोय मन दोय दिल सुणी न कथा। दोय मन दोय दिल पंथ दुहेला, दोय मन दोय दिल गुरु न चेला। दोय मन दोय दिल बंधी न बेला, दोय मन दोय दिल रब्ब दुहेला। दोय मन दोय दिल सूई न धागा, दोय मन दोय दिल भिड़े न भागा। दोय मन दोय दिल भेव न भेऊं, दोय मन दोय दिल टेव न टेऊं। दोय मन दोय दिल केल न केला, दोय मन दोय दिल सुरग न मेला। रावल जोगी तां तां फिरियो, अण चीन्हैं के चाह्यो। कांहै काजै दिसावर खेलो, मन हठ सीख न कायों। थे जोग न जोग्या भोग न भोग्या, गुरु न चीन्हों रायों। कण विन कूकस कांये पीसों, निश्चय सरी न कायों। बिण पायचियें पग दुख पावै, अबधूं लोहै दुखी सकायों। पार ब्रह्म की सुद्ध न जांणी, तो नागे जोग न पायो ॥45॥46जिहिं जोगी के मन ही मुद्रा, तन ही कंथा पिण्डे अगन थंभायो। जिहिं जोगी की सेवा कीजै, तूठों भव जल पार लंघावै। नाथ कहावै मर मर जावै, से क्यों नाथ कहावै। नान्ही मोटी जीवां जूणी, निरजत सिरजत फिर फिर पूठा आवै। हम ही रावल हम ही जोगी, हम राजा के रायों। जो ज्यूं आवै सो त्यूं थरपां, सांचा सूं सत भायों। पाप न छिपां पुण्य न हारा, करां न करतब लावां बारूं। जीव तड़े को रिजक न मेटूं, मूवां परहथ सारूं। दौरे भिस्त बिचालै ऊभा, मिलिया काम सवारूं ॥46॥47काया कंथा मन जो गूंटो, सीगी सास उसासूं। मन मृग राखले कर कृषाणी, यूं म्हे भया उदासूं। हम ही जोगी हम ही जती, हम ही सती, हम ही राखबा चीतूं। पंच पटण नव थानक साधले, आद नाथ के भक्तूं ॥47॥48लक्ष्मण लक्ष्मण न कर आयसां, म्हारे साधां पड़ै बिराऊं। लक्ष्मण सो जिन लंका लीवी, रावण मार्यो ऐसो कियो संग्रामूं। लक्ष्मण तीन भवन का राजा, तेरे एक न गाऊं। लक्ष्मण के तो लख चौरासी जीया जूणी, तेरे एक न जीऊं। लक्ष्मण तो गुणवंतो जोगी, तेरे बाद विराऊं। लक्ष्मण का तो लक्षण नांही, शीस किसी विध नाऊँ ॥48॥49अबधू अजरा जारले, अमरा राखले, राखले बिन्द की धारणा। पताल का पानी आकाश को चढ़ायले, भेंट ले गुरु का दरशणा ॥49॥50तइयां सासूं तइया मासूं, तइया देह दमोई। उत्तम मध्यम क्यूं जाणिजै, बिबरस देखो लोई। जाकै बाद विराम बिरासों, सरसा भेला चालै, ताकै भीतर छोत लकोई। जाकै बाद विराम बिरासों सांसो, सरसा भोलो भागो, ताकै मूले छोत न होई। दिल दिल आप खुदायबन्द जाग्यो, सब दिल जाग्यो सोई। जो जिंदो हज काबै जाग्यो, थल सिर जाग्यो सोई। नाम विष्णु के मुसकल घातै, ते काफर सैतानी। हिन्दू होय कर तीरथ धोकै, पिण्ड भरावै तेपण रह्या इवाणी। जोगी होय के मूंड मुंडावै, कान चिरावै, गोरख हटड़ी धोकै। तेपण रह्या इवाणी, तुरकी होय हज काबो धोकै, भूला मुसलमानों। के के पुरुष अवर जागैला, थल जाग्यो निज बाणी। जिहिं के नादे वेदे शीले शब्दे, लक्षणें अन्त न पारूं। अंजन मांही निरंजन आछै, सो गुरु लक्ष्मण कंवारूं ॥50॥51सप्त पताले भुंय अंतर अंतर राखिलो, म्हे अटला अटलूं। अलाह अलेख अडाल अजूनी शिंभू, पवन अधारी पिंड जलूं। काया भीतर माया आछै, माया भीतर दया आछै। दया भीतर छाया जिहिं कै, छाया भीतर बिंब फलूं। पूरक पूर पूर ले पोंण, भूख नहीं अन्न जीमत कोंण ॥51॥52मोह मण्डप थाप थापले, राख राखले, अधरा धरूं। आदेश वेसूं ते नरेसूं, ते नरा अपरंपारूं। रण मध्ये से नर रहियों, ते नरा अडरा डरूं। ज्ञान खड़गूं जथा हाथे, कौण होयसी हमारा रिपूं ॥52॥53गुरु हीरा बिणजै, लेहम लेहूं, गुरु नै दोष न देणा। पवणा पाणी, जमी मेहूं, भार अठारै परबत रेहूं। सूरज जोति परै परेरै, एति गुरु के शरणै। केती पवली अरू जल बिम्बा, नवसै नदी निवासी नाला, सायर एति जरणां। कोड़ निनाणवै राजा भोगी, गुरु के आखर कारण जोगी। माया राणी राज तजीलो, गुरु भेंटीलो जोग सझीलो, पिण्डा देख न झुरणां। कर कृषाणी बेफांयत संठो, जो जो जीव पिण्डै नीसरणा। आदै पहलूं घड़ी अढ़ाई, स्वर्गे पहुंता हिरणी हिरणा। सुरां पुनां तेतीसां मेलों, जे जीवन्तां मरणों। के के जीव कुजीव, कुधात कलोतर बाणी। बादीलो हंकारीलो, वै भार घणां ले मरणो। मिनखा रै तैं सूतै सोयो, खूलै खोयो, जड़ पाहन संसार विगोयो। निरफल खोड़ भरांति भूला, आस किसी जा मरणों। वेसाही अंध पड़यो गल बंध, लियो गलबंध गुरु बरजंतै। हैलै श्याम सुन्दर के टोटै, पारस दुस्तर तरणों। निश्चै छेह पड़ेलो पालो, गोवलवास जु करणों। गोवलवास कमाय ले जिवड़ा, सो सुरगा पुर लहणा ॥53॥54अरण विवाणे रै रिव भांणे, देव दिवाणें, विष्णु पुराणें। बिंबा बांणे सूर उगाणें, विष्णु विवाणे कृष्ण पुराणे। कांय झंख्यो तै आल पिराणी, सुर नर तणों सबेरूं। इंडो फूटो बेला बरती, ताछै हुई बेर अबेरूं। मेरे परे सो जोयण बिंबा लोयण, पुरुष भलो निज बाणी। बांकी म्हारी एका जोती, मनसा सास विवांणी। को आचारी आचारे लेणा, संजमें शीले सहज पतीना। तिहि आचारी नै चीन्हत कौण, जांकी सहजै चूकै आवागौण ॥54॥55रणघटिये कै खोज फिरन्ता, सुण सेवन्ता, खोज हस्ती को पायो। लूंकड़िये को खोज फिरंता, सुण सेवन्ता, खोज सुरह को पायो। मोथड़िये के गूंढ़ खणंन्ता सुण सेवन्ता, लाधों थान सुथानों। रांघड़ियों को घाट घड़न्ता, सुण सेवन्ता कंचन सोनो डायो। हस्ती चड़न्ता गेवर गुड़न्ता, सुणही सुणहा भूंकत कायों ॥55॥56कुपात्र कूं दान जु दीयो, जाणै रैण अंधेरी चोर जु लीयो। चोर जु लेकर भाखर चढ़ियो, कह जिवड़ा तै कैने दीयो। दान सुपाते बीज सुखेते, अमृत फूल फलीजै। काया कसोटी मन जो गूंटो, जरणा ढ़ाकण दीजै। थोड़े मांहि थोड़ेरो दीजै, होते नाह न कीजै। जोय जोय नाम विष्णु को बीजै, अनन्त गुणां लिख लीजै ॥56॥57अति बल दानों सब स्नानों, गऊ कोट जे तीरथ दानों, बहुत करै आचारूं। ते पण जोय जोय पार नहीं पायो, भाग परापति सारूं। घट ऊंधे बरषत बहु मेहा, नीर थयो पण ठालूं। को होयसी राजा दुर्योधन सो, विष्णु सभा महलाणो। तिण ही तो जोय जोय पार नहीं पायो, अधविच रहीयो ठालूं। जपिया तपिया पोह बिन खपिया, खप खप गया इवाणी। तेऊ पार पहुंता नाही, ताकी धोती रही अस्मानी ॥57॥58तउवा माण दुर्योधन माण्या, अवर भी माणत माणों। तउवा दान जूं कृष्णी माया, अवर भी फूलत दानों। तउवा जाण जो सहस्र झूझ्या, अवर भी झूझत जाणों। तउवा बाण जो सीता कारण लक्ष्मण खेंच्या, अवर भी खेंचत बाणों। जपी तपी तकपीर ऋषीश्वर, तोल रह्या शैतानों। तिण किण खैंच न सके, शिंभु तणी कमाणूं। तेऊ पार पहुंता नांहि, ते कीयों आपो भाणों। तेऊ पार पहूंता नांही, ताकी धोती रही अस्माणों। बारां काजै हरकत आई, अध बिच मांड्यो थाणों। नारसिंह नर नराज नरवों, सुराज सुरवों, नरां नरपति सुरां सुरपति। ज्ञान न रिंदो बहुगुण चिंदो, पहलूं प्रहलादा आप पतलीयों। दूजा काजै काम बिटलीयो, खेत मुक्त ले पंच करोड़ी। सो प्रहलादा गुरु की वाचा बहियो, ताका शिखर अपारूं। ताको तो वैकुण्ठे वासो, रतन काया दे सौंप्या छलत भण्डारूं। तेऊ तो उरवारे थाणों, अई अमाणों, तत समाणों, बहु परमाणों पार पहुंचण हारा। लंका के नर शूर संग्रामें घणा विरामें, काले काने भला तिकंट। पहले झूझ्या बाबर झंट, पड़े ताल समंदा पारी, तेऊ रहिया लंक दवारी। खेत मुक्तले सात करोड़ी, परशुराम के हुकम जे मूवा। से तो कृष्ण पियारा, ताको तो वैकुण्ठे वासो। रतन काया दे सौंप्या छलत भण्डारूं, तेऊ तो उरवारे थाणों। अई अमाणों, पार पहुंचन हारा। काफर खानों बुद्धि भराड़ो, खेत मुक्तले नव करोड़ी। राव युधिष्ठिर से तो कृष्ण पियारा, ताको तो वैकुण्ठे वासो। रतन काया दे सौंप्या छलत भण्डारूं, तेऊ तो उरवारे थाणों। अई अमाणों बहु परमाणों, पार पहुंचन हारा। बारा काजै हरकत आई, तातै बहुत भई कसवारूं ॥58॥59पढ़ कागल वेदूं शास्त्र शब्दूं, भूला भूले झंख्या आलूं। अहनिश आव घटंती जावै, तेरा सास सबी कसवारूं। कइया चंदा कइया सूरूं, कइया काल बजावत तूरूं। उर्द्धक चन्दा निरधक सूरूं, सुन घट काल बजावत तूरूं। रक्तस बिन्दू परहस निंदू, आप सहै तेपण बूझे नहीं गवारूं ॥59॥60एक दुख लक्ष्मण बंधू हइयों, एक दुख बूढ़े घर तरणी अइयो। एक दुख बालक की मां मुइयों, एक दुख औछे को जमवारूं। एक दुख तूठे से व्यवहारूं, तेरे लक्षणें अन्त न पारूं, सहैं न शक्ति भारूं। कै तै परशुराम का धनुष जे पइयों, कै तैं दाव कुदाव न जाण्यों भइयूं। लक्ष्मण बाण जे दहशिर हइयों, ऐतो झूझ हमें नहीं जाण्यो। जे कोई जाणें हमारा नाऊँ, तो लक्ष्मण ले वैकुण्ठै जाऊँ। तो विन ऊभा पह प्रधानों, तो विन सूना त्रिभुवन थानों। कहाँ हुओ जे सीता अइयों, कहा करूँ गुणवंता भइयों ॥60॥61कै तै कारण किरिया चुक्यौ, कै तै सूरज सामों थूक्यों। कै तै उभै कांसा मांज्या, कै तै छान तिणूका खैंच्या। कै तै ब्राह्मण निवत बहोड़या, कै तै आवा कोरंभ चोर्या। कै तै बाड़ी का वन फल तोड़या, कै तै जोगी का खप्पर फोड़या। कै तै ब्राह्मण का तागा तोड़या, कै तै बैर विरोध धन लोड़या। कै तै सूवा गाय का बच्छ बिछोड़या, कै तैं चरती पिवती गऊ बिडारी। कै तैं हरी पराई नारी, कै तै सगा सहोदर मार्या। कै तै तिरिया शिर खड़ग उभार्या, कै तै फिरतै दांतण कीयो। कै तै रण में जाय दों दीयो, कै तै बाट कूट धन लीयो। किसे सरापे लक्ष्मण हुइयूं ॥61॥62ना मैं कारण किरिया चूक्यौ, ना मैं सूरज साम्हों थूक्यों। ना मैं ऊभै कांसा मांज्या, ना मैं छान तिणूका खैंच्या। ना मैं ब्राह्मण निवत बहोड़या, ना मैं आवा कोरंभ चोर्या। ना मैं बाड़ी का वन फल तोड़या, ना मैं जोगी का खप्पर फोड़्या। ना मैं ब्राह्मण का तागा तोड़या, ना मैं वेर विरोध धन लोड़या। ना मैं सूवा गाय का बच्छ बिछोड़या, ना मैं चरती पिवती गऊ बिडारी। ना मैं हरी पराई नारी, ना मैं सगा सहोदर मार्या। ना मैं तिरिया सिर खड़ग उभार्या, ना मैं फिरतै दांतण कियो। ना मैं रण में जाय दों दीयो, ना मैं बाट कूट धन लीयो। एक जूं ओगण रामै कीयो, अणहुंतो मिरघो मारण गइयो। दूजो ओगण रामै कीयो, एको दोष अदोषां दीयो ॥62॥63आतर पातर राही रूक्मण, मेल्हा मन्दिर भोयों। गढ़ सोवनां तेपण मेल्हा, रहा छड़ा सी जोयो। रात पड़न्ता पाला भी जाग्या, दिवस तपंता सूरूं। उन्हां ठंडा पवना भी जाग्या, घन बरषंता नीरूं। दुनी तंणा औचाट भी जाग्या, के के नुगरा देता गाल गहीरूं। जिहिं तन ऊंना ओढ़ण ओढ़ा, तिहिं ओढ़ंता चीरूं। जां हाथे जप माली जपां, तहां जपंता हीरूं। बारा काजै पड़यो बिछोहो, संभल संभल झूरूं। राघों सीता हनवत पाखो, कौन बंधावत धीरूं। मागर मणिया काच कथिरूं, हीरस हीरा हीरूं। विखा पड़ता पड़ता आया, पूरस पूरा पूरूं। जे रिण राहे सूर गहीजै, तो सूरस सूरां सूरूं। दुखियां है जे सुखियां होयसै, करसै राज गहीरूं। महा अंगीठी बिरखा ओल्हो, जेठ न ठंडा नीरूं। पलंग न पोढ़ण सेज न सोवण, कंठ रूलंता हीरूं। इतना मोह न मानै शिम्भू, तही तही सूसीरूं। घोड़ा चोली बाल गुदाई, श्री राम का भाई, गुरु की वाचा बहियों। राघो सीता हनवंत पाखो दुख सुख कासूं कहियों ॥63॥64मैं कर भूला मांड पिराणी, काचै कन्ध अगाजूं। काचा कंध गले गल जायसैं, बीखर जैला राजूं। गड़बड़ गाजा कांय बिबाजा, कण विन कूकस कांय लेणा। कांय बोलो मुख ताजो। भरमी वादी अति अहंकारी, लावत यारी, पशुवां पड़े भिरांति। जीव विणासै लाहै कारणै, लोभ सवारथ खायबा खाज अखाजूं। जो अति काले ले जम काले तेपण खीणा, जिहिं का लंक गढ़ था राजों। बिन हस्ती पाखर विन गज गुड़ियों, बिन ढ़ोला डूमा लाकड़ियो। जाकै परसण बाजा बाजै, सो अपरंपर काय न जंपो। हिन्दू मूसलमानों, डर डर जीव के काजै। रावां रंका राजा रावां रावत राजा, खाना खोजा, मीरा मुलकां घंघ फकीरां। घंघा गुरवां सुर नर देवा, तिमर जु लंगा, आयसा जोयसा, साह पुरोहितां। मिश्र ही व्यासां रूंखां बिरखां आव घटंती, अतरा माहे कूण विशेषों। मरणत एको माघों। पशु मकेरूं लहै न फेरूं, कहे ज मेरूं सब जग केरूं। साचै से हर करै घणैरूं। रिण छाणै ज्यूं बिखर जैला, तातै मेरू न तेरूं। बिसर गया ते माघूं, रक्तूं नातूं, सेतूं धातूं कुमलावै ज्यूं शागूं। जीव र पिंण्ड बिछोवा होयसी, ता दिन दाम दुगाणी। आड न पैको रती विसोवो सीझै नाही, ओ पिण्ड काम न काजूं। आवत काया ले आयो थो, जातै सूकौ जागो। आवत खिण एक लाई थी, पर जातै खिण न लागो। भाग परापति कर्मा रेखा, दरगै जबला जबला माघों। बिरखे पान झड़े झड़ जायला, तेपण तई न लागूं। सेतूं दगधूं कवलज कलियो, कुमलावै ज्यूं शागूं। ऋतु बसंती आई और भलेरा शागूं। भूला तेण गया रे प्राणी, तिहिं का खोज न माघूं। विष्णु विष्णु भण लई न साई, सुर नर ब्रह्मा को न गाई। तातै जंवर बिन डसीरे भाई, बास बसंते कीवी न कमाई। जंवर तणां जमदूत दहैला, तातै तेरी कहा न बसाई ॥64॥65तउवा जाग जु गोरख जाग्या, निरह निरंजन निरह निरालंब। जुग छतीसों एकै आसन बैठा बरत्या, अवर भी अवधूं जागत जागूं। तउवा त्यागज ब्रह्मा त्यागा, अवर भी त्यागत त्यागूं। तउवा भाग जो ईश्वर मस्तक, अवर भी मस्तक भागूं। तउवा सीर जो ईश्वर गौरी, अवर भी कहियत सीरूं। तउवा वीर जो राम लक्ष्मण, अवर भी कहियत बीरूं। तउवा पाग जो दश सिर बाँधी, अवर भी बांधत पागूं। तउवा लाज जो सीता लाजी, अवर भी लाजत लाजूं। तउवा बाजा राम बजाया, अवर बजावत बाजूं। तउवा पाज जो सीता कारण लक्ष्मण बाँधी, अवर भी बांधत पाजूं। तउवा काज जो हनुमत सारा, अवर भी सारत काजूं। तउवा खागज जो कुम्भकरण महरावण खाज्या, अवर भी खावत खागूं। तउवा राज दुर्योधन माण्या, अवर भी माणत राजूं। तउवा राग ज कन्हड़ बांणी, अवर भी कहिये रागूं। तउवा माघ तुरंगम तेजी, टटू तणां भी माघूं। तउवा बागज हंसा टोली, बगुला टोली भी बागूं। तउवा नाग उद्यावल कहिये, गरूड़ सीया भी नागूं। तउवा सागज नागर बेली, कूकर बगरा भी सागूं। जां जां शैतानी करै उफारूं, तां तां महंत ज फलियो। जुरा जम राक्षस जुरा जुरिन्द्र, कंश केशी चंडरूं। मधु कीचक हिरणाक्ष, हीरणाकुश। चक्रधर बलदेऊं, पावत वासुदेवों। मंडलिक कांय न जोयबा, इहिं धर उपर रती न रहीबा राजूं ॥65॥66ऊमाज गुमाज पंज गंज यारी, रहिया कुपहिया शैतान की यारी। शैतान लो भल शैतान लो, शैतान बहो जुग छायों। शैतान की कुबध्या न खेती, ज्यूं काल मध्ये कुचीलूं। वे राही वै किरियावन्त कुमती दौरे जायसी, शैतानी लोड़त रलियों। जां जां शैतानी करै उफारूं, तां तां महंत न फलियो। नीले मध्ये कूचील करबा, साध संगीणी थूलूं। पोहप मध्ये परमला जोति, यूं सुरग मध्ये लीलूं। संसार में उपकार ऐसा, ज्यूं घण बरषंता नीरूं। संसार में उपकार ऐसा, ज्यूं रूही मध्ये खीरूं ॥66॥67श्री गढ़ आल मोत पुर पाटण भुंय नागोरी, म्हे ऊंडे नीरे अवतार लीयो। अठगां ठंगण अदगां दागण, अगजा गंजण, ऊनथ नाथन, अनू निवावण। कांहि को मैं खैंकाल कीयों, कांही सुरग मुरादे देसां, कांही दौरे दीयूं। होम करीलो दिन ठाविलो, सहस रचीलो, छापर नीबी दूणपूरूं। गाँव सुंदरियो छीलै बालदियो, छन्दे मन्दे बाल दीयों। अजम्हे होता नागो बाड़ै, रैण थंभै गढ़ गागरणों। कुं कुं कंचन सोरठ मरहठ, तिलंग दीप गढ़ गागरणों। गढ़ दिल्ली कंचन अर दुणायर, फिर फिर दुनिया परखे लीयो। थटे भवणिया अरू गुजरात, आछो जांई सवा लाख मालवै। पर्वत मांडू मांही ज्ञान कथूं। खुरासाण गढ़ लंका भीतर, गूगल खेऊं पैर ठयो। ईडर कोट उजैणी नगरी, काहिंदा सिंध पुरी विश्राम लीयो। कांय रे सायरा गाजै बाजै, घुरै घुर हरै करै इवांणी आप बलूं। किहिं गुण सायरा मीठा होता, किहिं अवगुण हुआ खार खरूं। जद वासग नेतो मेर मथाणी, समंद बिरोल्यो ढ़ोय उरू। रैणायर डोहण पाणी पोहण, असुरां बेधी करण छलूं। दहशिर ने जद वाचा दीन्ही, तद म्हे मेल्ही अनंत छलूं। दहशिर का दश मस्तक छेद्या, ताणूं बाणूं लड़ूं कलूं। सोखा बाणूं एक बखाणूं, जाका बहु परमाणूं, निश्चय राखी तास बलूं। राय विष्णु से वाद न कीजै, कांय बधारो दैत्य कुलूं। म्हे पण म्हेई थे पण थेई, सा पुरूषा की लच्छूं कुलूं। गाजै गुड़कै से क्यूं वीहै, जेझल जाकी संहस फणूं। मेरे माय न बाप न बहण न भाई, साख न सैण न लोक जणों। वैकुण्ठे विश्वास विलंबण, पार गिराये मात खिणूं। विष्णु विष्णु तूँ भण रे प्राणी, विष्णु भणन्ता अनन्त गुणूं। सहंसे नावें, सहंसै ठावै, सहंसै गावै, गाजे बाजे हीरे नीरे। गगन गहीरे चवदा भवणें, तिहूं तृलोके, जम्बू दीपे, सप्त पताले। अई अमाणों तत समाणों, गुरु फरमाणों, बहु परमाणों। अइयां उइयां निरजत सिरजत। नान्ही मोटी जीया जूणीं, एति सास फुरंतै सारूं। कृष्णी माया घन बरषंता, म्हे अगिणि गिणूं फूहारूं। कुण जाणै म्है देव कुदेवों, कुण जाणै म्है अलख अभेवों। कुण जाणें म्है सुरनर देवों, कुण जाणै म्हारा पहला भेवों। कुण जाणै म्हे ग्यानी के ध्यानी, कुण जाणै म्हे केवल ज्ञानी। कुण जाणे म्हे ब्रह्म ज्ञानी, कुण जाणें म्है ब्रह्माचारी। कुण जाणै म्हे अल्प अहारी, कुण जाणै म्हे पुरुष क नारी। कुण जाणै म्हे बाद विवादी, कुण जाणै म्हे लुब्ध सवादी। कुण जाणै म्हे जोगी के भोगी, कुण जाणै म्हे आप संयोगी। कुण जाणै म्हे भावत भोगी, कुण जाणै म्है लील पती। कुण जाणें म्हे सूम क दाता, कुण जाणें म्हे सती कुसती। आपही सूम र आप ही दाता, आप कुसती आप सती। नव दाणूं निरवंश गुमाया, कैरव किया फती फती। राम रूप कर राक्षस हड़िया, बाण के आगे वनचर जुड़िया। तद म्हे राखी कमल पती, दया रूप म्हे आप बखाणां। संहार रूप म्हे आप हती। सोलै सहंस नवरंग गोपी, भोलम भालम टोलम टालम। छोलम छालम, सहजै राखीलों, म्हे कन्हड़ बालो आप जती। छोलवियां म्हे तपी तपेश्वर, छोलब कीया फती फती। राखण मतां तो पड़दै राखां, ज्यूं दाहै पांन बणास पति ॥67॥68वै कंवराई अनंत बधाई, वै कंवराई सुरग बधाई। यह कंवराई खेह रलाई, दुनिया रोलै कंवर किसों। कण विण कूकस रस विण बाकस, विन किरिया परिवार किसो। अरथूं गरथूं साहण थाटूं, धूंवें का लहलोर जिसो। सो सारंगधर जप रे प्राणी, जिहिं जपिये हुवै धरम इसों। चलण चलंतै वास बसंतै, जीव जीवंतै काया निवंती। सास फुरंतै किवी न कमाई, तातै जंवर विन डसी रे भाई। सुर नर ब्रह्मा कोउ न गाई, माय न बाप न बहण न भाई। इंत मिंत न लोक जणों, जंवर तंणा जमदूत दहैला। लेखो लेसी एक जंणों ॥68॥69जबरा रै तै जग डांडीलो, देह न जीती जाणों। माया जालै ले जम काले, लेणा कोण समाणों। काचै पिण्डे किसी बड़ाई, भोलै भूल अयाणों। म्हां देखंता देव दाणु सुरनर खीणां, बीच गया बेराणों। कुम्भकरण महारावण होता, अबली जोध अयाणों। कोट लंका गढ़ विषमा होता, कांयदा बस गया रावण राणो। नौ ग्रह रावण पाऐ बन्ध्या, तिस बिह सुर नर शंक भयाणों। ले जम काले अति बुधवंतो, सीता काज लुभाणों। भरमी बादी अति अहंकारी, करता गरब गुमानों। तेऊ तो जम काले खीणां, थीर न लाधों थाणों। काचै पिण्ड अकाज अफारूं, किसी पिराणी मांणों। साबण लाख मजीठ बिगूता, थोथा बाजर घाणों। दुनिया राचै गाजै बाजै, तामैं कणूं न दाणूं। दुनिया के रंग सब कोई राचै, दीन रचै सो जाणों। लोही मांस विकारों होयसी, मूर्ख फिरै अयाणों। मागर मणिया काच कथिर न राचों, कुड़ा दुनी डफाणों। चलन चलंतै, जीव जीवन्तै, काया निवंती, सास फुरंतै। कांयरे प्राणी विष्णु नं जंप्यो, कीयो कंधे को ताणों। तिंहि ऊपर आवैला जंवर तणां दल, तास किसो सहनाणों। ताकै शीश न ओढ़ण, पाय न पहरण, नैवा झूल झयाणों। धणक न बाण न टोप न अंगा, टाटर चुगल चयाणों। साल सुचंगी घृत सुबासों, पीवण न ठंडा पाणी। सेज न सोवण, पलंग न पोढ़ण, छातन मैड़ी मांणों। न वां दइयां न वां मइयां, नागड़ दूत भयाणों। काचा तोड़ निकुचा भाषे, अघट घटे मल माणों। धरती अरू असमान अगोचर, जातै जीव न तेही जाणों। आवत जावत दीसै नाही, साचर जाय अयाणों। जंवर तंणा जमदूत दहैला, मल बैसेला माणों। तातै कलीयर कागा रोलों, सूना रह्या अयाणों। आयसां जोयसां भणता गुणतां, वार महूर्तां पोथा थोथा। पुस्तक पढ़िया वेद पुराणों। भूत परेती कांय जपीजै, यह पाखण्ड परवाणों। कान्ह दिशावर जेकर चालो, रतन काया ले पार पहुंचो। रहसी आवा जाणों। तांह परेरै पार गिराये, तत के निश्चल थाणों। सो अपरंपर कांय नं जंपो, तत खिण लहो इमाणों। भल मूल सींचो रे प्राणी, ज्यूं तरवर मेलत डालूं। जइयां मूल न सींच्यो, तो जामण मरण बिगोवो। अहनिश करणी थीर न रहिबा, न बंच्या जम कालूं। कोई कोई भल मूल सींचीलो, भल तंत बूझीलो। जीव तड़ा कुछ लाहो होयसी, मूवा न आवत हाणी ॥69॥70हक हलालूं हक साच कृष्णों, सुकृत अहल्यो न जाई। भल बाहिलो भल बीजीलो, पवणा बाड़ बलाई। जीव के काजै खड़ो जे खेती, तामै ले रखवालो रे भाई। दैतानी शैतानी फिरैला, तेरी मत मोरा चर जाई। उनमन मनवां जीव जतन कर, मन राखिलों ठाई। जीव के काजै खड़ो ज खेती, वाय दवाय न जाई। न तहां हिरणी न तहां हिरणा, न चीन्हों हरि आई। न तहां मोरा न तहां मोरी, न ऊंदर चर जाई। कोई गुरु कर ज्ञानी तोड़त मोहा, तेरो मन रखवालो रे भाई। जो आराध्यो राव युधिष्ठिर, सो आराधों रे भाई ॥70॥71धवणा धूजै पाहण पूजै, बे फरमाई खुदाई। गुरु चेले के पाऐं लागै, देखो लोग अन्यायी। काठी कण जो रूपा रेहण, कापड़ मांह छिपाई। नीचा पड़ पड़ ताने धोकै, धीरा रे हरि आई। ब्राह्मण नाऊँ लादण रूड़ा, बूता नाऊँ कूता। वै अपहानै पोह बतावै, बैर जगावै सूता। भूत परेती जाखा खांणी, यह पाखण्ड परवाणों। बल बल कूकस कांय दलीजै, जांमै कणूं न दाणूं। तेल लियो खल चोपै जोगी, खलपण सूंघी बिकाणों। कालर बीज न बीज पिराणी, थलसिर न कर निवाणों। नीर गऐ छीलर कांय सोधों, रीता रह्या इवाणों। भवंता ते फिरंता फिरंता ते भवंता, मड़े मसाणें तड़े तड़गे। पड़े पखाणें ह्वाते सिद्धि न काई, निज पोह खोज पिराणी। जे नर दावों छोड़यो मेर चुकाई, राह तेतीसां की जांणी ॥71॥72वेद कुराण कुमाया जालूं, भूला जीव कुजीव कु जाणी। वसंदर नही नख हीरूं, धर्म पुरुष सिरजीवै पुरूं। कलि का माया जाल फिटा कर प्राणी, गुरु की कलम कुराण पिछाणी। दीन गुमान करीलो ठाली, ज्यूं कण घातै घुण हांणी। साच सिदक शैतान चुकावों, ज्यूं तिस चुकावै पाणी। मैं नर पूरा सरविण जो हीरा, लेसी जांकै हृदय लोयण, अन्धा रह्या इंवाणी। निरख लहो नर निरहारी, जिन चोखंड भीतर खेल पसारी। जंपो रे जिण जंपै लाभै, रतन काया एह कहाणी। काही मारू काही तारूं, किरिया बिहूणा पर हथ सारूं। शील दहूं उबारूं ऊन्हें, एकल एह कहाणी। केवल ज्ञानी थलसिर आयो, परगट खेल पसारी। कोड़ तेतीसों पोंह रचावण हारी, ज्यूं छक आयी सारी ॥72॥73हरी कंकेहड़ी मंडप मैड़ी, जहाँ हमारा वासा। चार चक नव दीप थर हरे, जो आपो परकासूं। गुणियां म्हारा सुगणां चेला, म्हे सुगणां का दासूं। सुगणां होयसी सुरगे जास्ये, नुगरा रह्या निरासूं। जाका थान सुहाया घर बैकुण्ठे, जाय संदेशो लायों। अमियां ठमियां अमृत भोजन, मनसा पालंग सेज निहाल बिछायो। जागो जोवो जोत न खोवो, छल जासी संसारूं। भणी न भणबा, सुणी न सुणबा, कही न कहबा, खड़ी न खड़बा। रे! भल कृषाणी, ताकै करण न घातो हेलो। कलीकाल जुग बरते जैलो, तातै नहीं सुरां सों मेलों ॥73॥74कड़वा मीठा भोजन भख ले, भखकर देखत खीरूं। धर आखरड़ी साथर सोवण, ओढ़ण ऊंना चीरूं। सहजे सोवण पोह का जागण, जे मन रहिबा थीरूं। सुरग पहेली सांभल जीवड़ा, पोह उतरिबा तीरूं ॥74॥75जोगी रे तूँ जुगत पिछाणी, काजी रे तूँ कलम कुराणी। गऊ विणासों काहैं तानी, राम रजा क्यूं दीन्हीं दानी। कान्ह चराई रनवे बानी, निरगुन रूप हमें पतियानी। थल सिर रह्या अगोचर बानी, ध्याय रे मुडियां पर दानी। फीटा रे अण होता तानी, अलख लेखो लेसी जानी ॥75॥76तन मन धोइये संजम होइये, हरख न खोइये। ज्यूं ज्यूं दुनिया करै खुंवारी, त्यूं त्यूं किरिया पूरी। मुग्धां सेती यूं टल चालो, ज्यूं खड़के पासि धंनूरी ॥76॥77भूला लो भल भूला लो, भूला भूल न भूलूं। जिहिं ठूंठड़िये पान न होता, ते क्यूं चाहत फूलूं। को को कपूर घूंटीलो, बिन घूंटी नहीं जाणी। सतगुरु होयबा सहजै चीन्हबा, जाचंध आल बखाणी। ओछी किरिया आवै फिरिया, भ्रान्ति सुरग न जाई। अन्त निरंजन लेखो लेसी, पर चीन्हैं नहीं लोकाई। कण बिन कूकस रस बिन बाकस, बिन किरिया परिवारूं। हरि विन देह रै जांण न पावै, अम्बाराय दवारूं ॥77॥78नवै पोल नवै दरवाजा, अहूंठ कोड़रू राय जड़ी। कांय रे सींचो वन माली, इहिं बाड़ी तो भेल पड़सी। सुवचन बोल सदा सुहलाली, नाम विष्णु को हरे सुणों। घण तण गड़ बड़ कायों वायों, निज मारग तो विरला कायों। निज पोह पाखो पार असी पर, जाण म गाहि म गायो गूणों। श्री राम में मति थोड़ी, जोय जोय कण विण कूकस कांयों लेणों ॥78॥79बारा पोल नवै दरसाजी, राय अथरगढ़ थीरूं। इस गढ़ कोई थीर न रहिबा, निश्चै चाल गया गुरु पीरूं ॥79॥80जे म्हां सूता रैण विहावै, तो बरतै बिम्बा बारूं। चन्द भी लाजै सूर भी लाजै, लाजै धर गैणारूं। पवणा पाणी ये पण लाजै, लाजै बणी अठारा भारूं। सप्त पाताल फूणींन्दा लाजै, लाजै सागर खारूं। जम्बू दीप का लोइयां लाजै, लाजै धवली धारूं। सिध अरू साधक मुनिजन लाजै, लाजै सिरजन हारूं। सत्तर लाख असी पर जंपा, भले न आवै तारूं ॥80॥81भल पाखण्डी पाखण्ड मंडा, पहला पाप पराछत खंडा। जां पाखण्डी के नादे वेदे, शीले शब्दे बाजत पौण। तां पाखण्डी ने चीन्हत कौण, जाकी सहजै चूकै आवा गौण ॥81॥82अलख अलख तूँ अलख न लखणा, तेरा अनन्त इलोलूं। कौण सी तेरी करणी पूजै, कौण सै तिहिं रूप स तूलूं ॥82॥83जो नर घोड़े चढ़े पाघ न बांधै, ताकि करणी कौन विचारूं। शुचियारा होयसी आय मिलसी, करड़ा दो जग खारूं। जीव तड़ै को रिजक न मेटूं, मूवा परहथ सारूं। हाथ न धोवै पग न पखालै, नहीं सुधी बुधि गिंवारूं। जुग अनन्त अनन्त बरत्या, म्हे सुनि मण्डल का राजूं ॥83॥84मूंड मुंडायो मन न मुंडायो, मूंहि अबखल दिल लोभी। अन्दर दया नहीं सुरकाने, निंदरा हड़ै कसोभी। गुरु गति छूटी टोट पड़ैला, उनकी आवा पख सातों। वैं करणी हूंता खूंधा, असी सहस नव लाख भवैला कुंभी दौरे ऊंधा ॥84॥85भोम भली कृषाण भी भला, खेवट करो कमाई। गुरु प्रसाद काया गढ़ खोजो, दिल भीतर चोर न जाई। थलिये आय सतगुरु प्रकास्यो, जोलै पड़ी लोकाई। एक खिण मांहि तीन भवन म्हें पोखां, जीवां जूण सवाई। करण समों दातार न हुवो, जिन कंचन बाहू उठाई। सोई कवीसा कवल नवेड़ी, जिण सुरह सुबछ दुहाई। मेर समों कोई केर न देख्यों, सायर जिसी तलाई। लंक सरीखो कोट न देख्यो, समंद सरीखी खाई। दशरथ सो कोई पिता न देख्यो, देवल देसी माई। सीत सरीखी तिरिया न देखी, गरब न करीयों काई। हनुमत सो कोई पायक न देख्यो, भीम जैसी सबलाई। रावण सो कोई राव न देख्यो, जिण चोहचक आण फिराई। एक तिरिया के राहा बेधी, लंका फेर बसाई। संखा मोहरा सेतम सेतूं, ताक्यूं विलगै काई। ब्राह्मण था ते वेदे भूला, काजी कलम गुमाई। जोग बिहूणा जोगी भूला, मुंडिया अकल न काई। इहिं कलयुग में दोय जन भूला, एक पिता एक माई। बाप जाणै मेरे हलियो टोरै, कोहर सींचण जाई। माय जाणै मेरे बहुटल आवै, बाजै बिरध बधाई। म्हे शिम्भू का फरमाया आया, बैठा तखत रचाई। दो भुज डंडे परबत तोला, फेरा आपण राई। एक पलक में सर्व संतोषा, जीया जूण सवाई। जुगां जुगां को जोगी आयो, बैठो आसन धारी। हाली पूछै पाली पूछै, यह कलि पूछण हारी। थली फिरंतो खिलेरी पूछै, मेरी गुमाई छाली। बांण चहोड़ पारधियों पूछै, किहिं अवगुण चूकै चोट हमारी। रहो रे मूर्खा मुग्ध गंवारा, करो मजूरी पेट भराई। है है जायो जीव न घाई। मैड़ी बैठो राजेन्द्र पूछै, स्वामी जी कति एक आयु हमारी। चाकर पूछे ठाकर पूछै और पूछै कीर कहारी। सोक दुहागण तेपण पूछै, ले ले हाथ सुपारी। बांझ तिरिया बहुतेरी पूछै, किसी प्राप्ति म्हारी। त्रेता युग में हीरा विणज्या, द्वापर गऊ चराई। वृन्दावन में बंसी बजाई, कलयुग चारी छाली। नव खेड़ी म्हे आगे खेड़ी दशवें कालंके की बारी। उतम देश पसारो मांडयो, रमण बैठो जुवारी। एक खण्ड बैठा नव खण्ड जीता, को ऐसो लहो जुवारी ॥85॥86जुग जागो जुग जाग पिराणी, कांय जागंता सोवो। भल के बीर बिगोवो होयसी, दुसमन कांय लकोवो। ले कूंची दरबान बुलावो, दिल ताला दिल खोवो। प्रयोजन। जंपो रे जिण जंप्यो जणीयर, जपसी सो जिण हारी। लह लह दांव पड़न्ता खेलो, सुर तेतीसां सारी। पवन बंधान काया गढ़ काची, नीर छलै ज्यूं पारी। पारी बिनसै नीर ढ़ुलैलो, ओ पिण्ड कामन कारी। काची काया दृढ़ कर सींचो, ज्यूं माली सींचै बाड़ी। ले काया बासन्दर होमो, ज्यूं इन्धन की भारी। शील स्नाने संजमें चालो, पाणी देह पखाली। गुरु के वचने निंव खिंव चालो, हाथ जपो जप माली। वस्तु पियारी खरचों क्यूं नांही, किहिं गुण राखो टाली। खरचे लाहो राखे टोटो, बिबरस जोय निहाली। घर आगी इत गोवल वासो, कूड़ी आधो चारी। आज मूवा कल दूसर दिन है, जो कुछ सरै तो सारी। पीछे कलियर कागा रोलो, रहसी कूक पुकारी। ताण थकै क्यूं हार्यो नाही, मुरखा अवसर जोला हारी ॥86॥87जिहिं का उमग्या समाघूं, तिहिं पन्थ के बिरला लागूं। बीजा चाकर बीरूं, रिण शंख धीरूं, कबही झूझत रायूं। पासै भाजत भायूं ॥87॥88गोरख लो गोपाल लो, लाल ग्वाल लो, लाल लिलंग देवो। नव खंड पृथिवी प्रगटियो, कोई विरला जाणत म्हारी आद मूल का भेवों ॥88॥89उरधक चन्दा निरधक सूरूं, नवलख तारा नेड़ा न दूरूं। नव लख चंदा नव लख सूरूं, नव लख धंधु कारूं। तांह परेरै तेपण होता, तिंहका करूँ विचारूं ॥89॥90चोइस चेड़ा कालिंग केड़ा, अधिक कलावंत आयसै। वैफेर आसन मुकर होय बैसेला, नुगरा थान रचायसै। जाणत भूला महा पापी, बहू दुनियां भोलायसै। दिल का कूड़ा कुड़ियारा, उपंग बात चलायसै। गुरु गहणां जो लेवे नांही, दश बंध घर बोसायसै। आप थापी महा पापी, दग्धी परलै जायसै। सतगुरु के बेड़े न चढ़ै, गुरु स्वामी नै भायसै। मंत्र बेलूं ऋद्ध सिद्ध करसै, दे दे कार चलायसै। काठ का घोड़ा निरजीवता, सरजीव करसै, तानै दाल चरायसै। अधर आसन मांड बैसेला, मुवा मड़ा हंसायसै। जां जां पवन आसण पाणी आसण, चंद आसण सूर आसण। गुरु आसण सम्भराथले, कहै सतगुरु भूल मत जाइयों। पड़ोला अभै दोजखै ॥90॥91छन्दे मन्दे बालक बुद्धे, कूड़े कपटे ऋद्ध न सिद्धे। मेरे गुरु जो दीन्ही शिक्षा, सर्व अलिंगण फेरी दीक्षा। जाण अजाण बहिया जब जब, सर्व अलिंगण मेटे तब तब। ममता हस्ती बांध्या काल, काल पर काले पसरत डाल। ध्यान न डोले मन न टले, अहनिश ब्रह्म ज्ञान उचरै। काया पत नगरी मन पत राजा, पंच आत्मा परिवारूं। है कोई आछै मही मण्डल शूरा, मनराय सूं झूझ रचायले। अथगा थगाय ले अबसा बसायले, अनवे माघ पाल ले। सत सत भाषत गुरु रायों, जरा मरण भो भागूं ॥91॥92काया कोट पवन कुटवाली, कुकर्म कुलफ बणायो। माया जाल भरम का संकल, बहु जुग रहीयो छायो। पढ़ वेद कुराण कुमाया जालों, दंत कथा जुग छायो। सिध साधक को एक मतो, जिन जीवत मुक्त दृढ़ायो। जुगां जुगां को जोगी आयो, सतगुरु सिद्ध बतायो। सहज स्नानी केवल ज्ञानी, ब्रह्मज्ञानी, सुकृत अहल्यो न जाई। क्यूं क्यूं भणता क्यूं क्यूं सुणता, समझ विना कुछ सिद्धि न पाई ॥92॥93आद शब्द अनाहद वाणी, चवदै भवन रह्या छल पाणी। जिहिं पाणी से इण्ड उपना, उपना ब्रह्मा इन्द्र मुरारी ॥93॥94सहंस्र नांम सांई भल शिंम्भू, म्हे उपना आदि मुरारी। जद म्हे रह्यों निरालंभ होकर, उतपति धंधूकारी। ना मेरे मायन ना मेरे बापन, मैं अपनी काया आप संवारी। जुग छतीसों शून्य ही वरत्या, सतयुग मांही सिरजी सारी। ब्रह्मा इन्द्र सकल जग थरप्या, दीन्ही करामात केती बारी। चन्द सूर दोय साक्षी थरप्या, पवन पवने वर पवन अधारी। तद म्हे रूप कियो मैनावतीयो, सत्यव्रत को ज्ञानी उचारी। तद म्हे रूप रच्यो कामठियो, तेतीसां की कोड़ हंकारी। जब मैं रूप धर्यो बाराही, पृथवी दाढ़ चढ़ाई सारी। नरसिंघ रूप धर हिरण्यकश्यप मार्यो, प्रहलादों रहियों शरण हमारी। बावन होय बलिराज चितायो, तीन पैण्ड कीवी धर सारी। परशुराम होय क्षत्रियपन साध्यों, गर्भ न छूटी नारी। श्री राम शिर मुकुट बंधायो, सीता के अहंकारी। कन्हड़ होय कर बंसी बजाई, गऊ चराई। धरती छेदी काली नाथ्यो, असुर मार किया क्षय कारी। बुद्ध रूप गयासुर मारयो, काफर मार किया बैगारी। पन्थ चलायो राह दिखायो, नौ बर विजय हुई हमारी। शेष जम्भराय आप अपरंपर, अवल दिन से कहिये। जाम्भा गोरख गुरु अपारा, काजी मुल्ला पढ़िया पण्डित, निंदा करै गिंवारा। दोजख छोड़ भिस्त जे चाहो, तो कहिया करो हमारा। इन्द्र पुरी वैकुण्ठे वासो, तो पावो मोक्ष द्वारा ॥94॥95वाद-विवाद फिटाकर प्राणी, छोड़ो मन हट मन का भाणों। कांही के मन भयो अंधेरो, कांही सूर उगाणों। नुगरा कै मन भयो अन्धेरो, सुगरा सूर उगाणों। चरणभि रहीया लोयण झुरीया, पिंजर पड़्यो पुराणों। बेटा बेटी बहन रू भाई, सबसै भयो अभाणों। तेल लियो खल चोपै जोगी, रीता रहीयो घाणों। हंस उडाणों पंथ विलंब्यो, कीयो दूर पयाणों। आगै सुरपति लेखो मांगै, कह जीवड़ा के करण कमाणों। जीवड़ा नै पाछो सुझण लागो, सुकरत ने पछताणें ॥95॥96सुण गुणवंता सुण बुधवंता, मेरी उत्पति आदि लुहारूं। भाठी अन्दर लोह तपीलो, तंतक सोनों घड़ै कसारूं। मेरी मनसा अहरण नाद हथोड़ो, शशीयर सूर तपीलों, पवन अधारी खालूं। जे थे गुरु का शब्द मानीलो, लंघिबा भव जल पारूं। आसण छोड़ी सुखासण बैठो, जुग जुग जीवै जम्भ लुहारूं ॥96॥97विष्णु विष्णु तूँ भण रे प्राणी, जो मन मांनै रे भाई। दिन का भूला रात न चेता, कांय पड़ा सूता आस किसी मन थाई। तेरी कुड़काची लगवाड़ घणों छै, कुशल किसी मन भाई। हिरदै नाम विष्णु को जंपो, हाथे करो टवाई। हर पर हरि की आंण न मानी, भूला भूल जपी महमाई। पाहन प्रीत फिटाकर प्राणी, गुरु बिन मुक्त न जाई। पंच करोड़ी ले प्रहलाद उतरियो, जिन खरतर करी कमाई। सात करोड़ी ले राजा हरिचंद उतरियो,तारा दे रोहिताश हरिचंद हाटो हाट बिकाई। नव क्रोड़ी राव युधिष्ठिर ले उतरियो, धन धन कुंती माई। बारा क्रोड़ समाहन आयो, प्रहलादा सूं वाचा कवल जु थाई। किसकी नारी वस्त पियारी, किसका बहन रू भाई। भूली दुनिया मर मर जावै, ना चीन्हों सुरराई। पाहण नाऊँ लोहा सक्ता, नुगरा चीन्हत कांई ॥97॥98जिहिं गुरु कै खिण ही ताऊं, खिण ही सीऊं। खिण ही पवणा खिण ही पाणी, खिण ही मेघ मंडाणों। कृष्ण करंता बार न होई, थलसिर नीर नीवाणों। भूला प्राणी विष्णु जंपो रे, ज्यूं मौत टले जिरवाणों। भीगा है पण भेद्या नांही, पाणी मांह पखाणों। जीवत मरो रे जीवत मरो, जिन जीवन की विध जांणी। जे कोई आवै हो हो कर, आप जै हुइये पांणी। जाकै बहुती नवणी बहुती खवणी, बहुती क्रिया समाणी। जांकी तो निज निर्मल काया, जोय जोय देखो ले चढ़ियो अस्मानी। यह मढ़ देवल मूल न जोयबा, निज कर जंपो पिराणी। अनन्त रूप जोवो अभ्यागत, जिहिं का खोज लहो सुरवाणी। सेतम सेतूं जेरज जेरूं, इंडस इंडूं, अइयालो उरध जे खैणी ॥98॥99साच सही म्हे कूड़ न कहिबा, नेड़ा था पण दूर न रहीबा। सदा संतोषी सत उपकरणां, म्हे तजिया मान अभिमानूं। बसकर पवना बस कर पाणी, बस कर हाट पटण दरवाजो। दशे दवारे ताला जड़ीया, जो ऐसा उस ताजों। दशे दवारे ताला कूंची, भीतर पोल बणाई। जो आराध्यों राव युधिष्ठिर, सो आराधो रे भाई। जिहिं गुरु कै झुरैन झुरबा, खिरै न खिरणा, बंक तृबंकै। नाल पै नालै, नैणे नीर न झुरबा, बिन पुल बंध्या बांणों। तज्या अलिंगण तोड़ी माया, तन लोचन गुण बाणों। हालीलो भल पालीलो सिध पालीलो, खेड़त सूना राणों ॥99॥100अर्थूं गर्थूं साहण थाटूं, कूड़ा दीठा ना थाटों। कूड़ी माया जाल न भूलीरे राजेन्द्र, अगली रही ओजूं की बाटों। नव लख दांताला बार करीलो, बार करे कर बंद करीलो। बंद करै कर दान करीलो, दान करै कर मन फूलीलौ। तंत मंत बीर बेताल करीलो, खायबा खाज अखाजूं। निरह निरंजन नर निरहारी, तऊ न मिलबा झंझा भाग अभागूं ॥100॥101नितही मावस नित संकराति, नित ही नवग्रह वैसें पांति। नितही गंग हिलोले जाय, सतगुरु चीन्हैं सहजै न्हाय। निरमल पाणी निरमल घाट, निरमल धोबी मांड्यो पाट। जे यो धोबी जाणै धोय, घर में मैला वस्त्र रहै न कोय। एक मन एक चित साबण लावै, पहरंतो गाहक अति सुख पावै। ऊंचै नीचे करै पसारा, नही दूजै का संचारा। तिल में तेल पहुंप में वास, पाँच तंत में लियो प्रकाश। बिजली कै चमकै आवै जाय, सहज शून्य मैं रहै समाय। नै यो गावै न यो गवावै, सुरगै जाते बार न लावै। सतगुरु ऐसा तत्व बतावै, जुग जुग जीवै बहुर न आवै ॥101॥102विष्णु विष्णु भण अजर जरीजै, धर्म हुवै पापां छूटीजै। हरि पर हरि को नाम जपीजै, हरियालो हरि आण हरूं, हरिनारायण देव नरूं। आशा सास निरास भइलों, पाइलों मोक्ष द्वार खिणूं ॥102॥103देख्या अदेख्या सुण्या असुण्या, क्षिमा रूप तप कीजै। थोड़े मांहि थोड़ेरो दीजै, होते नांहि न कीजै। कृष्ण मया तिहूं लोका साक्षी, अमृत फूल फलीजै। जोय जोय नांव विष्णु के दीजै, अनन्त गुणा लिख लीजै ॥103॥104कंचन दानों कछु न मानूं, कापड़ दानूं कछु न मानूं। चोपड़ दानूं कछु न मानूं, पाट पटंबर दानूं कछु न मानूं। पंच लाख तुरंगम दानूं कछु न मानूं, हस्ती दानूं कछु न मानूं। तिरिया दानूं कछु न मानूं, मानूं एक सुचील सिनानूं ॥104॥105आप अलेख उपन्ना शिंभू, निरह निरंजन धंधूं कारूं। आपै आप हुआ अपरंपर, हे राजेन्द्र लेह विचारूं। नै तद चंदा नै तद सूरूं, पवण न पाणी धरती आकाश न थीयों। ना तद मास न वर्ष न घड़ी न पहरूं, धूप न छाया ताव न सीयों। न त्रिलोक न तारा मंडल, मेघ न माला वर्षा थीयों। न तद जोग नक्षत्र तिथि न वारसियो, ना तद चवदस पूनों मावसियो। नै तद समद सागर न गिरि न पर्वत, ना धौलगिर मेर थीयौं। ना तद हाट न बाट न कोट न कसबा, बिणज न बाखर लाभ थीयों। यह छत धार बड़े सुलतानों, रावण राणा ये दिवाणा। हिन्दू मूसलमानूं, दोय पन्थ नांही जूवा जूवा। ना तद काम न करषण जोग न दरसण, तीर्थ वासी ये मसवासी। ना तद होता जपिया तपिया, न खच्चर हींवर बाज थीयों। ना तद शूरवीर न खड़ग न क्षत्री, रण संग्राम जूझ न थीयों। ना तद सिंह न स्यावज मिरग पंखेरूं, हंस न मोरा लेल सूवों। रंग न रसना कापड़ चोपड़, गोहूं चावल भोग न थीयों। माय न बाप न बहण न भाई, ना तद होता पूत धीयों। सास न शब्दूं जीव न पिण्डूं, ना तद होता पुरुष त्रियों। पाप न पुण्य न सती कुसती, ना तद होती मया न दया। आपै आप उपन्ना शिंभू, निरह निरंजन धन्धूं कारूं। आपों आप हुआ अपरंपर, हे राजेन्द्र लेह विचारूं ॥105॥106सुण रे काजी सुण रे मुल्ला, सुणियो लोग लुगाई। नर निरहारी एक लवाई, जिन यो राह फुरमाई। जोर जरब करद जे छाड़ो, तो कलमा नाम खुदाई। जिनके साच सिदक इमान सलामत, जिण यो भिस्त उपाई ॥106॥107सहजे शीले सहज बिछायो, उनमन रह्या उदासूं। जुगे जुगन्तर भवे भवन्तर, कहो कहाणी कासूं। रवि ऊगा जब उल्लू अन्धा, दुनिया भया उजासूं। सतगुरु मिलियो सत पंथ बतायो भ्रान्त चुकाई, सुगरा भयो विश्वासूं। जां जां जांण्यो तहां प्रवाण्यों, सहज समाणों, जिहिं के मन की पूगी आसूं। जहाँ गुरु न चीन्हों पन्थ न पायो, तहां गल पड़ी परासूं ॥107॥108हालीलो भल पालीलो, सिध पालीलो खेड़त सूना राणों। चन्द सूर दोय बैल रचीलो, गंग जमन दोय रासी। सत संतोष दोय बीज बीजीलो, खेती खड़ी आकाशी। चेतन रावल पहरै बैठै, मृगा खेती चर नहीं जाई। गुरु प्रसादे, केवल ज्ञाने, सहज स्नाने, यह घर रिद्ध सिद्ध पाई ॥108॥109देखत भूली को मनमानै, सेवै बिलोवै बाझ सनाने। देखत भूली को मन चैवै, भीतर कोरा बाहर भैवै। देखत भूली को मन मांनै, हरि पर हर मिलियो शैताने। देखत भूली को मन चेवै, आक बखाणै थंदे मेवै। भूला लो भल भूला लो, भूला भूल न भूलूं। जिहिं ठुंठड़िये पान न होता, ते क्यूं चाहत फूलूं ॥109॥110मथुरा नगर की राणी होती, होती पाटम दे राणी। तीरथ वासी जाती लूटे, अति लूटे खुरसाणी। मानक मोती हीरा लूट्या, जाय बीलूधा डाणी। कवले चूकी वचने हारी, जिहिं औगुण ढ़ांची ढ़ोवै पाणीं। विष्णु कूं दोष किसो रे प्राणी, आपे खता कमाणी ॥110॥111खरड़ ओढ़ीजै, तूंबा जीमीजै, सुरहै दुहीजै। त खेत की सींव म लीजै, पीजै ऊंडा नीरूं। सुर नर देवा बंदी खाने, तित उतरिया तीरूं। भोलब भालब टोलम टालम, ज्यूं जाणों त्यूं आणों। मैं वाचा दई प्रहलादा सूं, सुचेलो गुरु लाजै। कोड़ तेतीसूं बाड़े दीन्ही, तिनकी जात पिछाणों ॥111॥112जंके पंथ का भाजणा, गुरु का नींदणा, स्वामी का दुस्मणा। कुफर ते काफरा, कुमली कुपातूं, कुचीला कु धातूं। हड़ हड़ा भड़ भड़ा, दाणवै दूतबा, दाणवै भूतबा। राकसा बोकसा, जाका जन्म नहीं पर कर्म चंडालूं। और कूं जिभै कर आप कूं पोखणा, जिहि की रूवां ले दीजैसी। दौरै घूंप अंधारौ, तानबे तानबा, छानबे छानबा। तोड़बै तोड़बा, कूकबै पूकारबा, जाकी कोई न करबा सारूं ॥112॥113ईमा मोमण चीमा गोयम, महंमद फुरमानी। उरका फुरका निवाज फरीजा, खासा खबर विनाणी। इला रास्ती ईमा मोमन, मारफत मुल्लाणी ॥113॥114सुर नर तंणो सन्देशो आयो, सांभलियो रे जाटों। चांदणै थकै अंधेरे क्यों चालो, भूल गया गुरु वाटो। नीर थकै घट थूल क्यूं राखो, सबल बिगोवो खाटो। मागर मणिया क्यूं हाथ बिसाहो, कांय हीरा हाथ उसाटो। सुर नर तंणो संदेशो आयो, सांभलियो रे जाटों ॥114॥115म्हे आप गरीबी तन गूदड़ियो, मेरा कारण किरिया देखो। बिन्दो ब्योहरो व्योर विचारो, भूलस नाही लेखो। नदिये नीरूं सागर हीरूं, पवणां रूप फिरै परमेश्वर। बिंबै बैला निश्चल थाघ अथाघूं, ते सरवर कित नीरूं, गहर गंभीरूं। खिण एक सिद्ध पुरी विश्राम लियो, अब जूं मण्डल भई अवाजूं। म्हे शून्य मण्डल का राजूं ॥115॥116आयसां मृगछाला पावोड़ी कांय फिरावों,मतूंत आयसां ऊगंतो भांण थंभाऊं। दोनों परबत मेर उजागर, मतूंत अध बिच आन भिड़ाऊं। तीन भवन की राही रूक्मण, मतूंत थलसिर आंण बसाऊं। नवसै नदी निवासी नाला, मतूंत थलसिर आन बहाऊं। सीत बहोड़ी लंका तोड़ी, ऐसो कियो संग्रामूं। जां बाणै म्हें रावण मार्यो, मतूंत कोवड सोखा हाथे सांह। आयसां! मृगछाला पावोड़ी कांय फिरावो, मतूंतो उगंतो भाण थंभाऊं ॥116॥117टूका पाया मगर मचाया, ज्यूं हंडियाया कुता। जोग जुगत की सार न जांणी, मूंड मुंडाय बिगूता। चेला गुरु अपरचै खीणां, मरते मोक्ष न पायो ॥117॥118सुरगां हूंते शिम्भूं आयो, कहो कुणां के काजै। नर निरहारी एक लवाई, परगट जोत विराजै। प्रहलादा सूं वाचा कीवी, आयो बारां काजै। बारां मैं सूं एक घटै तो, सू चेलो गुरु लाजै ॥118॥119विष्णु विष्णु तूँ भण रे प्राणी, पैंकै लाख उपाजूं। रतन काया वैकुण्ठै वासों, तेरा जरा मरण भय भाजूं ॥119॥120विष्णु विष्णु तूँ भण रे प्राणी, इस जीवन कै हावै। क्षण क्षण आव घटंती जावै, मरण दिनों दिन आवै। पालटीयों गढ़ कांय न चेत्यो, घाती रोल भनावै। गुरुमुख मुरखा चढ़ै न पोहण, मनमुख भार उठावै। ज्यूं ज्यूं लाज दुनी की लाजै, त्यूं त्यूं दाव्यो दावै। भलियो होय सो भली बुध आवै, बुरियो बूरी कमावै ॥120॥

सबदवाणी (जम्भवाणी) गुरु जम्भेश्वर भगवान की अमर वाणी है — 120 पावन शब्द जो पर्यावरण संरक्षण, जीव-दया, नैतिकता और आध्यात्मिक मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं। बिश्नोई समाज इन्हें पांचवें वेद के समान मानता है।