शब्द 13
ओ३म् कांय रे मुरखा तै जन्म गुमायो, भुंय भारी ले भारूं।
जां दिन तेरे होम नै जाप नै, तप नै किरिया। गुरु नै चीन्हौं पन्थ न पायो, अहल गई जमवारूं।
ताती बेला ताव न जाग्यो, ठाढ़ी बेला ठारूं। बिंम्बै बैला विष्णु न जंप्यो, तातै बहुत भई कसवारूं।
खरी न खाटी देह बिणाठी, थीर न पवना पारूं।
अहनिश आव घटंती जावै, तेरे श्वांस सबी कसवारूं।
जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ते नर कुबरण कालूं। जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ते नगरे कीर कहारूं।
जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ते कांध सहै दुख भारूं। जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ते घण तण करै अहारूं।
जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ताको लोही मांस विकारूं। जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, गावै गाडर सहरै सुवर जन्म जन्म अवतारूं।
जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ओडा के घर पोहण होयसी, पीठ सहै दुःख भारूं। जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, राने वासो मोनी बैसे ढ़ूकै सूर सवारूं।
जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ते अचल उठावत भारूं। जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ते न उतरिबा पारूं। जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ते नर दौरे घुप अंधारूं।
तातै तंत न मंत न जड़ी न बूंटी, ऊंडी पड़ी पहारूं। विष्णु न दोष किसो रे प्राणी, तेरी करणी का उपकारूं।