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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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शब्द 13 / 120

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जम्भेश्वर बैठे सही, संत सभा के मांय।

जाट आय ऐसे कही, सतगुरु कहो समझाय।

शब्द 13

ओ३म् कांय रे मुरखा तै जन्म गुमायो, भुंय भारी ले भारूं।

जां दिन तेरे होम नै जाप नै, तप नै किरिया। गुरु नै चीन्हौं पन्थ न पायो, अहल गई जमवारूं।

ताती बेला ताव न जाग्यो, ठाढ़ी बेला ठारूं। बिंम्बै बैला विष्णु न जंप्यो, तातै बहुत भई कसवारूं।

खरी न खाटी देह बिणाठी, थीर न पवना पारूं।

अहनिश आव घटंती जावै, तेरे श्वांस सबी कसवारूं।

जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ते नर कुबरण कालूं। जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ते नगरे कीर कहारूं।

जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ते कांध सहै दुख भारूं। जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ते घण तण करै अहारूं।

जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ताको लोही मांस विकारूं। जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, गावै गाडर सहरै सुवर जन्म जन्म अवतारूं।

जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ओडा के घर पोहण होयसी, पीठ सहै दुःख भारूं। जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, राने वासो मोनी बैसे ढ़ूकै सूर सवारूं।

जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ते अचल उठावत भारूं। जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ते न उतरिबा पारूं। जा जन मन्त्र विष्णु न जंप्यो, ते नर दौरे घुप अंधारूं।

तातै तंत न मंत न जड़ी न बूंटी, ऊंडी पड़ी पहारूं। विष्णु न दोष किसो रे प्राणी, तेरी करणी का उपकारूं।