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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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शब्द 14 / 120

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फेर जाट यों बोलियो, जाम्भेजी सूं भेव।

वेद तंणां भेद बताय द्यो, ज्यों मिटै सर्व ही खेद।

शब्द 14

ओ३म् मोरा उपख्यान वेदूं कण तत भेदूं, शास्त्रे पुस्तके लिखणा न जाई। मेरा शब्द खोजो, ज्यूं शब्दे शब्द समाई।

हिरणा द्रोह क्यूं हिरण हतीलूं, कृष्ण चरित बिन क्यूं बाघ बिडारत गाई।

सुनही सुनहा का जाया, मुरदा बघेरी बघेरा न होयबा। कृष्ण चरित विन, सींचाण कब ही न सुजीऊ।

खर का शब्द न मधुरी बाणी, कृण चरित बिन श्वान न कबही गहीरूं।

मुंडी का जाया मुंडा न होयबा, कृष्ण चरित बिन रीछा कबही न सुचीलूं।

बिल्ली की इन्द्री संतोष न होयबा, कृष्ण चरित बिन काफरा न होयबा लीलूं।

मुरगी का जाया मोरा न होयबा, कृष्ण चरित बिन भाकला न होयबा चीरूं।

दंत बिवाई जन्म न आई, कृष्ण चरित बिन लोहै पड़ै न काठ की सूलूं।

नींबड़िये नारेल न होयबा, कृष्ण चरित बिन छिलरे न होयबा हीरूं।

तूंबण नागर बेल न होयबा, कृष्ण चरित बिन बांवली न केली केलूं।

गऊ का जाया खगा न होयबा, कृष्ण चरित बिन दया न पालत भीलूं।

सूरी का जाया हस्ती न होयबा, कृष्ण चरित बिन ओछा कबही न पूरूं।

कागण का जाया कोकला न होयबा, कृष्ण चरित बिन बुगली न जनिबा हंसूं।

ज्ञानी कै हृदय प्रमोध आवत, अज्ञानी लागत डासूं।