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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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शब्द 34 / 120

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रामों सुराणों यों कहै, सतगुरु सेती भेव।

जाप किता दिन जीव करै, हमें बतावों भेव।

शब्द 34

ओ३म् फुंरण फुंहारे कृष्णी माया, घण बरसंता सरवर नीरे। तिरी तिरन्तै तीर, जे तिस मरै तो मरियो।

अन्नों धन्नों दूधूं दहीयूं, घीयूं मेऊ टेऊ जे लाभंता। भूख मरै तो जीवन ही बिन सरियो। खेत मुक्तले कृष्णों अर्थो, जे कंध हरे तो हरियो।

विष्णु जपन्ता जीभ जु थाकै, तो जीभड़ियां बिन सरीयूं। हरि हरि करता हरकत आवै, तो ना पछतावो करियो।

भीखी लो भिखीयारी लो, जे आदि परम तत लाधों। जांकै बाद विराम विरांसो सांसो, तानै कौण कहसी साल्हिया साधों।