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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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शब्द 33 / 120

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रामों कहै सुण देवजी, आवागवण विचार।

जीव के जन्मे न मरै, ताका करो निरधार।

शब्द 33

ओ३म् कवण न हुवा कवण न होयसी, किण न सह्या दुख भारूं।

कवण न गइयां कवण न जासी, कवण रह्या संसारूं। अनेक अनेक चलंता दीठा, कलि का माणस कौन विचारूं।

जो चित होता सो चित नाही, भल खोटा संसारूं। किसकी माई किसका भाई, किसका पख परवारूं।

भूली दुनिया मर मर जावै, न चीन्हों करतारूं। विष्णु विष्णु तूँ भण रे प्राणी, बल बल बारम्बारूं।

कसणी कसबा भूल न बहबा, भाग परापति सारूं। गीता नाद कविता नाऊँ, रंग फटारस टारूं।