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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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शब्द 4 / 120

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उधरण कान्हावत बूझियों, जम्भगुरु से भेव।

आपरी उमर थोड़ी दीसै, किता दिनां रा देव।

शब्द 4

ओ३म् जद पवन न होता पाणी न होता, न होता धर गैणारूं।

चन्द न होता सूर न होता, न होता गिंगदर तारूं।

गऊ न गोरू माया जाल न होता, न होता हेत पियारूं।

माय न बाप न बहण न भाई, साख न सैण न होता पख परवारूं।

लख चौरासी जीया जूणी न होती, न होती बणी अठारा भारूं।

सप्त पाताल फूंणीद न होता, न होता सागर खारूं।

अजिया सजिया जीया जूणी न होती, न होती कुड़ी भरतारूं।

अर्थ न गर्थ न गर्व न होता, न होता तेजी तुरंग तुखारूं।

हाट पटण बाजार न होता, न होता राज दवारूं।

चाव न चहन न कोह का बाण न होता, तद होता एक निरंजन शिम्भू।

कै होता धंधूकारूं बात कदो की पूछै लोई, जुग छतीस विचारूं।

तांह परैरे अवर छतीसूं, पहला अन्त न पारूं।

म्हे तदपण होता अब पण आछै, बल बल होयसा कह कद कद का करूँ विचारूं।