शब्द 60
ओ३म् एक दुख लक्ष्मण बंधू हइयों, एक दुख बूढ़े घर तरणी अइयो। एक दुख बालक की मां मुइयों, एक दुख औछे को जमवारूं।
एक दुख तूठे से व्यवहारूं, तेरे लक्षणें अन्त न पारूं, सहैं न शक्ति भारूं।
कै तै परशुराम का धनुष जे पइयों, कै तैं दाव कुदाव न जाण्यों भइयूं।
लक्ष्मण बाण जे दहशिर हइयों, ऐतो झूझ हमें नहीं जाण्यो।
जे कोई जाणें हमारा नाऊँ, तो लक्ष्मण ले वैकुण्ठै जाऊँ।
तो विन ऊभा पह प्रधानों, तो विन सूना त्रिभुवन थानों।
कहाँ हुओ जे लंका लइयों, कहाँ हुओ जे रावण हइयों।
कहाँ हुओ जे सीता अइयों, कहा करूँ गुणवंता भइयों। खल के साटै हीरा गइयों।