मुख्य सामग्री पर जाएँ
गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह
शब्द 18 / 120

छपय

जाट हरष प्रसन्न हुआ, देवजी दिया जिताय।

विश्नोई यों बोलिया, हम नहीं जाणै काय।

शब्द 18

ओ३म् जां कुछ जां कुछ जां कुछू न जांणी, नां कुछ नां कुछ तां कुछ जांणी।

ना कुछ ना कुछ अकथ कहाणी, ना कुछ ना कुछ अमृत बाणी।

ज्ञानी सो तो ज्ञानी रोवत, पढ़िया रोवत गाहे।

केल करंता मोरी मोरा रोवत, जोय जोय पगां दिखाही।

उरध खैणी उनमन रोवत, मुरखा रोवत धाही।

मरणत माघ संघारत खेती, के के अवतारी रोवत राही।

जड़िया बूंटी जे जग जीवै, तो वेदा क्यूं मर जाही।

खोज पिराणी ऐसा विनाणी, नुगरा खोजत नाही।

जां कुछ होता ना कुछ होयसी, बल कुछ होयसी ताही।