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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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शब्द 17 / 120

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जाट परच पाऐ लग्यो, हृदय आई शांत।

सतगुरु साहब एक है, गई हृदय की भ्रान्त।

शब्द 17

ओ३म् मोरै सहजे सुन्दर लोतर बाणी, ऐसो भयो मन ज्ञानी।

तइयां सासूं तइयां मांसूं, रक्तूं रूहीयूं, खीरूं नीरूं, ज्यूं कर देखूं। ज्ञान अंदेसूं, भूला प्राणी कहे सो करणों।

अइ अमाणों तत समाणों, अइया लो म्हे पुरुष न लेणा नारी।

सोदत सागर सो सुभ्यागत, भवन भवन भिखियारी। भीखी लो भिखियारी लो, जे आदि परम तत्व लाधों।

जांकै बाद विराम विरासों सांसो, तानै कौन कहसी साल्हिया साधों।