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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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शब्द 53 / 120

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सुणते ही जोगी गया, सतगुरु के सुण वाच।

दुभद्या मन की सब गई, आयो तन में साच।

शब्द 53

ओ३म् गुरु हीरा बिणजै, लेहम लेहूं, गुरु नै दोष न देणा।

पवणा पाणी, जमी मेहूं, भार अठारै परबत रेहूं। सूरज जोति परै परेरै, एति गुरु के शरणै।

केती पवली अरू जल बिम्बा, नवसै नदी निवासी नाला, सायर एति जरणां।

कोड़ निनाणवै राजा भोगी, गुरु के आखर कारण जोगी। माया राणी राज तजीलो, गुरु भेंटीलो जोग सझीलो, पिण्डा देख न झुरणां।

कर कृषाणी बेफांयत संठो, जो जो जीव पिण्डै नीसरणा। आदै पहलूं घड़ी अढ़ाई, स्वर्गे पहुंता हिरणी हिरणा। सुरां पुनां तेतीसां मेलों, जे जीवन्तां मरणों।

के के जीव कुजीव, कुधात कलोतर बाणी। बादीलो हंकारीलो, वै भार घणां ले मरणो।

मिनखा रै तैं सूतै सोयो, खूलै खोयो, जड़ पाहन संसार विगोयो। निरफल खोड़ भरांति भूला, आस किसी जा मरणों।

वेसाही अंध पड़यो गल बंध, लियो गलबंध गुरु बरजंतै। हैलै श्याम सुन्दर के टोटै, पारस दुस्तर तरणों।

निश्चै छेह पड़ेलो पालो, गोवलवास जु करणों। गोवलवास कमाय ले जिवड़ा, सो सुरगा पुर लहणा।