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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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शब्द 54 / 120

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अज्ञानी हम अन्ध भये, नहिं जानत दिन रैण।

कृपा करो यदि पूर्ण गुरु, खुल जाये दिव्य नैण।

शब्द 54

ओ३म् अरण विवाणे रै रिव भांणे, देव दिवाणें, विष्णु पुराणें। बिंबा बांणे सूर उगाणें, विष्णु विवाणे कृष्ण पुराणे।

कांय झंख्यो तै आल पिराणी, सुर नर तणों सबेरूं। इंडो फूटो बेला बरती, ताछै हुई बेर अबेरूं।

मेरे परे सो जोयण बिंबा लोयण, पुरुष भलो निज बाणी। बांकी म्हारी एका जोती, मनसा सास विवांणी।

को आचारी आचारे लेणा, संजमें शीले सहज पतीना। तिहि आचारी नै चीन्हत कौण, जांकी सहजै चूकै आवागौण।