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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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शब्द 55 / 120

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खड़ बाढ़ण भेला हुआ, सहजे मांग्यो नीर।

जोगी चिंत्या मति करो, म्हांसूं राखो सीर।

शब्द 55

ओ३म् रणघटिये कै खोज फिरन्ता, सुण सेवन्ता, खोज हस्ती को पायो। लूंकड़िये को खोज फिरंता, सुण सेवन्ता, खोज सुरह को पायो।

मोथड़िये के गूंढ़ खणंन्ता सुण सेवन्ता, लाधों थान सुथानों। रांघड़ियों को घाट घड़न्ता, सुण सेवन्ता कंचन सोनो डायो।

हस्ती चड़न्ता गेवर गुड़न्ता, सुणही सुणहा भूंकत कायों।