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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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शब्द 45 / 120

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लोहा पांगल यों कहै, मेरे है यह चित।

लोह झड़ै मम काछ का, तो आवै प्रतीत।

शब्द 45

ओ३म् दोय मन दोय दिल सिवी न कंथा, दोय मन दोय दिल पुली न पंथा। दोय मन दोय दिल कही न कथा, दोय मन दोय दिल सुणी न कथा।

दोय मन दोय दिल पंथ दुहेला, दोय मन दोय दिल गुरु न चेला। दोय मन दोय दिल बंधी न बेला, दोय मन दोय दिल रब्ब दुहेला।

दोय मन दोय दिल सूई न धागा, दोय मन दोय दिल भिड़े न भागा। दोय मन दोय दिल भेव न भेऊं, दोय मन दोय दिल टेव न टेऊं।

दोय मन दोय दिल केल न केला, दोय मन दोय दिल सुरग न मेला।

रावल जोगी तां तां फिरियो, अण चीन्हैं के चाह्यो। कांहै काजै दिसावर खेलो, मन हठ सीख न कायों।

थे जोग न जोग्या भोग न भोग्या, गुरु न चीन्हों रायों। कण विन कूकस कांये पीसों, निश्चय सरी न कायों।

बिण पायचियें पग दुख पावै, अबधूं लोहै दुखी सकायों। पार ब्रह्म की सुद्ध न जांणी, तो नागे जोग न पायो।