शब्द 46
ओ३म् जिहिं जोगी के मन ही मुद्रा, तन ही कंथा पिण्डे अगन थंभायो। जिहिं जोगी की सेवा कीजै, तूठों भव जल पार लंघावै।
नाथ कहावै मर मर जावै, से क्यों नाथ कहावै। नान्ही मोटी जीवां जूणी, निरजत सिरजत फिर फिर पूठा आवै।
हम ही रावल हम ही जोगी, हम राजा के रायों। जो ज्यूं आवै सो त्यूं थरपां, सांचा सूं सत भायों।
पाप न छिपां पुण्य न हारा, करां न करतब लावां बारूं। जीव तड़े को रिजक न मेटूं, मूवां परहथ सारूं।
दौरे भिस्त बिचालै ऊभा, मिलिया काम सवारूं।