शब्द 47
ओ३म् काया कंथा मन जो गूंटो, सीगी सास उसासूं। मन मृग राखले कर कृषाणी, यूं म्हे भया उदासूं।
हम ही जोगी हम ही जती, हम ही सती, हम ही राखबा चीतूं। पंच पटण नव थानक साधले, आद नाथ के भक्तूं।
लोहा पांगल यूं कहै, जाम्भेजी सूं भेव।
जोग कछोटी हम लई, सुणिये पूर्ण देव।