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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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शब्द 44 / 120

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जटा राख जोगी हुवा, टोपी डोरी भेख।

कंथा पहरी गले में, सतगुरु नेत्रां देख।

शब्द 44

ओ३म् खरतर झोली खरतर कंथा, कांध सहै दुख भारूं। जोग तणी थे खबर नहीं पाई, कांय तज्या घर बारूं।

ले सूई धागा सीवण लागा, करड़ कसीदी मेखलियों। जड़ जटा धारी लंघै न पारी, बाद विवाद बे करणों।

थे वीर जपो बेताल धियावो, कांय न खोजो तत कणों।

आयसां डंडत डंडूं मुंडत मूंडूं, मुंडत माया मोह किसो। भरमी वादी वादे भूला, कांय न पाली जीव दयों।