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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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शब्द 43 / 120

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जोगी कहै देवजी, हमारा जोग अपार।

जोग निधी हमने लई, यांका सुणों विचार।

शब्द 43

ओ३म् ज्यूं राज गये राजिन्दर झूरै, खोज गऐ न खोजी। लाछ मुई गिरहायत झूरै, अरथ बिहूणां लोगी। मोर झड़ै कृषाण भी झूरै, बिंद गये न जोगी।

जोगी जंगम जपिया तपिया, जती तपी तक पीरूं। जिहिं तुल भूला पाहण तोलै, तिहि तुल तोलत हीरूं।

जोगी सो तो जुग जुग जोगी, अब भी जोगी सोई।

थे कान चिरावों, चिरघट पहरो, आयसां यह पाखण्ड तो जोग न कोई। जटा बधारों जीव सिंघारो, आयसां इहि पाखण्ड तो जोग न होई।