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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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शब्द 31 / 120

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जम्भगुरु असौ कह्यौ, जमात सुणौं चित लाय।

करणी कर सुरगै जहै, विन करणी नरके जाय।

शब्द 31

ओ३म् भल मूल सींचो रे प्राणी, ज्यूं का भल बुद्धि पावै। जामण मरण भव काल जु चूकै, तो आवागवण न आवै। भल मूल सींचो रे प्राणी, ज्यूं तरवर मेल्हत डालूं।

हरि परि हरि की आंण न मानी, झंख्या झूल्या आलूं। देवां सेवां टेव न जांणी, न बंच्या जम कालूं।

भूलै प्राणी विष्णु न जंप्यो, मूल न खोज्यो, फिर फिर जोया डालूं। बिन रैणायर हीरे नीरे नग न सीपै, तके न खोला नालूं।

चलन चलंते वास वसंतै, जीव जीवंते सास फुरंतै। काया निवंती कांयरे प्राणी विष्णु न घाती भालूं।

घड़ी घटन्तर पहर पटन्तर रात दिनंतर, मास पखंतर, क्षिण ओल्हरबा कालूं। मीठा झूठा मोह बिटंबण, मकर समाया जालूं।

कबही को बांइदो बाजत लोई, घड़िया मस्तक तालूं। जीवां जूणी पड़ै परासा, ज्यूं झींवर मच्छी मच्छा जालूं।

पहले जीवड़ो चेत्यो नांही, अब ऊंडी पड़ी पहारूं। जीव' र पिंड बिछोड़ो होयसी, ता दिन थाक रहे सिर मारूं।