शब्द 84
ओ३म् मूंड मुंडायो मन न मुंडायो, मूंहि अबखल दिल लोभी। अन्दर दया नहीं सुरकाने, निंदरा हड़ै कसोभी।
गुरु गति छूटी टोट पड़ैला, उनकी आवा पख सातों। वैं करणी हूंता खूंधा, असी सहस नव लाख भवैला कुंभी दौरे ऊंधा।
जोगी ने तब यूं कह्यो, म्हारै डोफ डाफ कछु नांहि।
मूंछ दाढ़ी राखा नहीं, मूंड मूंडाया सतगुरु पाहि।