शब्द 83
ओ३म् जो नर घोड़े चढ़े पाघ न बांधै, ताकि करणी कौन विचारूं।
शुचियारा होयसी आय मिलसी, करड़ा दो जग खारूं।
जीव तड़ै को रिजक न मेटूं, मूवा परहथ सारूं।
हाथ न धोवै पग न पखालै, नहीं सुधी बुधि गिंवारूं।
जुग अनन्त अनन्त बरत्या, म्हे सुनि मण्डल का राजूं।
देव तणे दरबार, जमाती आय कै।
जाट जोगी संग, ज्ञान पूछ्यो समै पाय कै।