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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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शब्द 85 / 120

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जोगी जाट प्रसन भया, दुभद्या गई नशाय।

कहै सकल जन स्याम सै, तुम दीन्हों भेद बताय।

शब्द 85

ओ३म् भोम भली कृषाण भी भला, खेवट करो कमाई। गुरु प्रसाद काया गढ़ खोजो, दिल भीतर चोर न जाई।

थलिये आय सतगुरु प्रकास्यो, जोलै पड़ी लोकाई। एक खिण मांहि तीन भवन म्हें पोखां, जीवां जूण सवाई।

करण समों दातार न हुवो, जिन कंचन बाहू उठाई। सोई कवीसा कवल नवेड़ी, जिण सुरह सुबछ दुहाई।

मेर समों कोई केर न देख्यों, सायर जिसी तलाई। लंक सरीखो कोट न देख्यो, समंद सरीखी खाई।

दशरथ सो कोई पिता न देख्यो, देवल देसी माई। सीत सरीखी तिरिया न देखी, गरब न करीयों काई।

हनुमत सो कोई पायक न देख्यो, भीम जैसी सबलाई। रावण सो कोई राव न देख्यो, जिण चोहचक आण फिराई।

एक तिरिया के राहा बेधी, लंका फेर बसाई। संखा मोहरा सेतम सेतूं, ताक्यूं विलगै काई।

ब्राह्मण था ते वेदे भूला, काजी कलम गुमाई। जोग बिहूणा जोगी भूला, मुंडिया अकल न काई।

इहिं कलयुग में दोय जन भूला, एक पिता एक माई। बाप जाणै मेरे हलियो टोरै, कोहर सींचण जाई। माय जाणै मेरे बहुटल आवै, बाजै बिरध बधाई।

म्हे शिम्भू का फरमाया आया, बैठा तखत रचाई। दो भुज डंडे परबत तोला, फेरा आपण राई।

एक पलक में सर्व संतोषा, जीया जूण सवाई। जुगां जुगां को जोगी आयो, बैठो आसन धारी।

हाली पूछै पाली पूछै, यह कलि पूछण हारी। थली फिरंतो खिलेरी पूछै, मेरी गुमाई छाली।

बांण चहोड़ पारधियों पूछै, किहिं अवगुण चूकै चोट हमारी। रहो रे मूर्खा मुग्ध गंवारा, करो मजूरी पेट भराई। है है जायो जीव न घाई।

मैड़ी बैठो राजेन्द्र पूछै, स्वामी जी कति एक आयु हमारी। चाकर पूछे ठाकर पूछै और पूछै कीर कहारी।

सोक दुहागण तेपण पूछै, ले ले हाथ सुपारी। बांझ तिरिया बहुतेरी पूछै, किसी प्राप्ति म्हारी।

त्रेता युग में हीरा विणज्या, द्वापर गऊ चराई। वृन्दावन में बंसी बजाई, कलयुग चारी छाली।

नव खेड़ी म्हे आगे खेड़ी दशवें कालंके की बारी। उतम देश पसारो मांडयो, रमण बैठो जुवारी। एक खण्ड बैठा नव खण्ड जीता, को ऐसो लहो जुवारी।