मुख्य सामग्री पर जाएँ
गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह
शब्द 86 / 120

छपय

साथरियां पूछै महाराज सूं, सतगुरु बोड़े भेद।

ज्ञान चक्षु परगट जहाँ, ज्यों छूटै भव खेद।

शब्द 86

ओ३म् जुग जागो जुग जाग पिराणी, कांय जागंता सोवो।

भल के बीर बिगोवो होयसी, दुसमन कांय लकोवो। ले कूंची दरबान बुलावो, दिल ताला दिल खोवो।

प्रयोजन।

जंपो रे जिण जंप्यो जणीयर, जपसी सो जिण हारी। लह लह दांव पड़न्ता खेलो, सुर तेतीसां सारी।

पवन बंधान काया गढ़ काची, नीर छलै ज्यूं पारी। पारी बिनसै नीर ढ़ुलैलो, ओ पिण्ड कामन कारी।

काची काया दृढ़ कर सींचो, ज्यूं माली सींचै बाड़ी। ले काया बासन्दर होमो, ज्यूं इन्धन की भारी।

शील स्नाने संजमें चालो, पाणी देह पखाली। गुरु के वचने निंव खिंव चालो, हाथ जपो जप माली।

वस्तु पियारी खरचों क्यूं नांही, किहिं गुण राखो टाली। खरचे लाहो राखे टोटो, बिबरस जोय निहाली।

घर आगी इत गोवल वासो, कूड़ी आधो चारी।

आज मूवा कल दूसर दिन है, जो कुछ सरै तो सारी। पीछे कलियर कागा रोलो, रहसी कूक पुकारी।

ताण थकै क्यूं हार्यो नाही, मुरखा अवसर जोला हारी।