शब्द 87भावार्थ देखेंओ३म् जिहिं का उमग्या समाघूं, तिहिं पन्थ के बिरला लागूं।बीजा चाकर बीरूं, रिण शंख धीरूं, कबही झूझत रायूं। पासै भाजत भायूं।