शब्द 106
ओ३म् सुण रे काजी सुण रे मुल्ला, सुणियो लोग लुगाई। नर निरहारी एक लवाई, जिन यो राह फुरमाई।
जोर जरब करद जे छाड़ो, तो कलमा नाम खुदाई। जिनके साच सिदक इमान सलामत, जिण यो भिस्त उपाई।
सब प्रचे साबत मिले, समझे काजी खान।
सतगुरु शब्द सुणाइये, जब आवै इमान।