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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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शब्द 105 / 120

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मालदै कहै सुण देवजी, एहि कहो विचार।

आद उत्पति कुण थो, ताहि करो निरधार।

शब्द 105

ओ३म् आप अलेख उपन्ना शिंभू, निरह निरंजन धंधूं कारूं। आपै आप हुआ अपरंपर, हे राजेन्द्र लेह विचारूं।

नै तद चंदा नै तद सूरूं, पवण न पाणी धरती आकाश न थीयों। ना तद मास न वर्ष न घड़ी न पहरूं, धूप न छाया ताव न सीयों।

न त्रिलोक न तारा मंडल, मेघ न माला वर्षा थीयों। न तद जोग नक्षत्र तिथि न वारसियो, ना तद चवदस पूनों मावसियो।

नै तद समद सागर न गिरि न पर्वत, ना धौलगिर मेर थीयौं। ना तद हाट न बाट न कोट न कसबा, बिणज न बाखर लाभ थीयों।

यह छत धार बड़े सुलतानों, रावण राणा ये दिवाणा। हिन्दू मूसलमानूं, दोय पन्थ नांही जूवा जूवा।

ना तद काम न करषण जोग न दरसण, तीर्थ वासी ये मसवासी। ना तद होता जपिया तपिया, न खच्चर हींवर बाज थीयों।

ना तद शूरवीर न खड़ग न क्षत्री, रण संग्राम जूझ न थीयों। ना तद सिंह न स्यावज मिरग पंखेरूं, हंस न मोरा लेल सूवों।

रंग न रसना कापड़ चोपड़, गोहूं चावल भोग न थीयों। माय न बाप न बहण न भाई, ना तद होता पूत धीयों।

सास न शब्दूं जीव न पिण्डूं, ना तद होता पुरुष त्रियों। पाप न पुण्य न सती कुसती, ना तद होती मया न दया।

आपै आप उपन्ना शिंभू, निरह निरंजन धन्धूं कारूं। आपों आप हुआ अपरंपर, हे राजेन्द्र लेह विचारूं।