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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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शब्द 107 / 120

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एक वैरागी आय कै, हरि सूं पूछी बात।

आसण बिछाणों क्यूं नहीं, हमें बतावो तात।

शब्द 107

ओ३म् सहजे शीले सहज बिछायो, उनमन रह्या उदासूं।

जुगे जुगन्तर भवे भवन्तर, कहो कहाणी कासूं। रवि ऊगा जब उल्लू अन्धा, दुनिया भया उजासूं।

सतगुरु मिलियो सत पंथ बतायो भ्रान्त चुकाई, सुगरा भयो विश्वासूं। जां जां जांण्यो तहां प्रवाण्यों, सहज समाणों, जिहिं के मन की पूगी आसूं।

जहाँ गुरु न चीन्हों पन्थ न पायो, तहां गल पड़ी परासूं।