मुख्य सामग्री पर जाएँ
गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह
शब्द 108 / 120

छपय

तब वैष्णव ऐसे कही, जोग कहो महाराज।

अन्तःकरण इन्द्रिय सभी, शुद्ध होने के काज।

शब्द 108

ओ३म् हालीलो भल पालीलो, सिध पालीलो खेड़त सूना राणों।

चन्द सूर दोय बैल रचीलो, गंग जमन दोय रासी। सत संतोष दोय बीज बीजीलो, खेती खड़ी आकाशी।

चेतन रावल पहरै बैठै, मृगा खेती चर नहीं जाई। गुरु प्रसादे, केवल ज्ञाने, ब्रह्मज्ञाने, सहज स्नाने, यह घर रिद्ध सिद्ध पाई।