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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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शब्द 2 / 120

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एक समय सम्भराथल के स्वामी, बैठेहु तेसु अन्तरयामी।

नृपरी वर्ग जो धाड़ै लाया, जम्भेश्वर के निकट ही आया।

शब्द 2

ओ३म् मोरे छाया न माया लोही न मासूं, रक्तूं न धातूं मोरे माय न बापूं।

आपण आपूं रोही न रापूं, कोपूं न कलापूं, दुख न सरापूं।

लोई अलोई त्यूंह तृलोई ऐसा न कोई जंपा भी सोई, जिहिं जंपे आवागवण न होई।

मोरी आद न जाणत, महीयल धूंवा बखाणत, उरध ढ़ाकले तृसूलूं।

आद अनाद तो हम रचिलो, हमें सिरजीलो से कौण।

म्हे जोगी के भोगी कै अल्प अहारी, ज्ञानी कै ध्यानी कै निज कर्मधारी।

सोखी के पोखी, कै जल बिंबधारी, दया धर्म थापले निज बाला ब्रह्मचारी।