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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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शब्द 29 / 120

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शेख मनोहर परचियों, मन में आयो सांच।

देव तणैं पाऐं लग्यो, निरमल गुरु की वाच।

शब्द 29

ओ३म् गुरु के शब्द असंख्य प्रबोधी, खार समंद परीलो। खार समंद परै परै रे, चौखण्ड खारूं, पहला अन्त न पारूं।

अनन्त कोड़ गुरु की दावण बिलंबी, करणी साच तरीलो। सांझे जमो सवेरे थापण, गुरु की नाथ डरीलो।

भगवी टोपी थलसिर आयो, हेत मिलाण करीलो। अम्बाराय बधाई बाजै, हृदय हरि सिंवरीलो।

कृष्ण मया चौखण्ड कृषाणी, जम्बू दीप चरीलो। जम्बू दीप ऐसो चर आयो, इसकन्दर चेतायो। मान्यो शील हकीकत जाग्यो, हक की रोजी धायों।

ऊनथ नाथ कुपह का पोहमा आण्या, पोह का धुर पहुंचाया।

मोरे धरती ध्यान वनस्पति वासों, ओजूं मण्डल छायों। गीन्दूं मेर पगाणै परबत, मनसा सोड़ तुलायो।

ऐ जुग चार छतीसा और छतीसां, आश्रा बहै अंधारी, म्हे तो खड़ा बिहायो।

तेतीसां की बरग बहां म्हे, बारा काजै आयो। बारा थाप घणा न ठाहर मतांतो डीले डीले कोड़ रचायो, म्हे ऊंचै मण्डल का रायों।।

समन्द बिरोल्यो वासग नेतो, मेर मथाणी थायों। संसा अर्जुन मारयो कारज सारयो, जद म्हे रहंस दमामा वायो।

फैरी सीत लई जद लंका, तद म्हे ऊथे थायो। दशसिर का दश मस्तक छेद्या, बाण भला निरतायो।

म्हे खोजी थापण होजी नाही, लह लह खेलत डायों।

कंसा सुर सूं जूवै रमिया, सहजै नन्द हरायो।

कूंत कंवारी कर्ण समानों, तिहिं का पोह पोह पड़दा छायो।

पाहे लाख मजीठी पाखों, बनफल राता पीझूं पाणी के रंग धायो। तेपण चाखन चाख्या भाख न भाख्या,जोय जोय लियो फल फल केर रसायो।

थे जोग न जोग्या भोग न भोग्या, न चीन्हों सुर रायो। कण बिन कूकस कांस पीसों, निश्चै सरी न कायों।

म्हे अवधूं निरपख जोगी, सहज नगर का रायों। जो ज्यूं आवै सो त्यूं थरपा, साचा सूं सत भायो।

मोरै मन ही मुद्रा तन ही कंथा, जोग मारग सहडायों। सात शायर म्हे कुरलै कीयो, ना मैं पीया न रह्या तिसायों।

डाकण शाकण निंद्रा खुध्या, ये म्हारै तांबै कूप छिपायों।

म्हारै मन ही मुद्रा तन ही कंथा, जोग मारग सहलियो। डाकण शाकण निंद्रा खुध्या, ऐ मेरे मूल न थीयों।