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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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शब्द 68 / 120

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लूणकरण को पुत्र जु, घोड़ो फेरत जोर।

साथरियां सब कहत है, देखहुं अस नही और।

शब्द 68

ओ३म् वै कंवराई अनंत बधाई, वै कंवराई सुरग बधाई। यह कंवराई खेह रलाई, दुनिया रोलै कंवर किसों।

कण विण कूकस रस विण बाकस, विन किरिया परिवार किसो। अरथूं गरथूं साहण थाटूं, धूंवें का लहलोर जिसो।

सो सारंगधर जप रे प्राणी, जिहिं जपिये हुवै धरम इसों। चलण चलंतै वास बसंतै, जीव जीवंतै काया निवंती। सास फुरंतै किवी न कमाई, तातै जंवर विन डसी रे भाई।

सुर नर ब्रह्मा कोउ न गाई, माय न बाप न बहण न भाई। इंत मिंत न लोक जणों, जंवर तंणा जमदूत दहैला। लेखो लेसी एक जंणों।