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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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शब्द 69 / 120

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जमात कहै सुण देवजी, यह बतावो भेव।

मृत्यु जरा सब से जबर, कोई बंच है कि नहीं देव।

शब्द 69

ओ३म् जबरा रै तै जग डांडीलो, देह न जीती जाणों। माया जालै ले जम काले, लेणा कोण समाणों।

काचै पिण्डे किसी बड़ाई, भोलै भूल अयाणों। म्हां देखंता देव दाणु सुरनर खीणां, बीच गया बेराणों।

कुम्भकरण महारावण होता, अबली जोध अयाणों। कोट लंका गढ़ विषमा होता, कांयदा बस गया रावण राणो।

नौ ग्रह रावण पाऐ बन्ध्या, तिस बिह सुर नर शंक भयाणों। ले जम काले अति बुधवंतो, सीता काज लुभाणों।

भरमी बादी अति अहंकारी, करता गरब गुमानों। तेऊ तो जम काले खीणां, थीर न लाधों थाणों।

काचै पिण्ड अकाज अफारूं, किसी पिराणी मांणों। साबण लाख मजीठ बिगूता, थोथा बाजर घाणों।

दुनिया राचै गाजै बाजै, तामैं कणूं न दाणूं। दुनिया के रंग सब कोई राचै, दीन रचै सो जाणों।

लोही मांस विकारों होयसी, मूर्ख फिरै अयाणों। मागर मणिया काच कथिर न राचों, कुड़ा दुनी डफाणों।

चलन चलंतै, जीव जीवन्तै, काया निवंती, सास फुरंतै। कांयरे प्राणी विष्णु नं जंप्यो, कीयो कंधे को ताणों।

तिंहि ऊपर आवैला जंवर तणां दल, तास किसो सहनाणों। ताकै शीश न ओढ़ण, पाय न पहरण, नैवा झूल झयाणों।

धणक न बाण न टोप न अंगा, टाटर चुगल चयाणों। साल सुचंगी घृत सुबासों, पीवण न ठंडा पाणी।

सेज न सोवण, पलंग न पोढ़ण, छातन मैड़ी मांणों। न वां दइयां न वां मइयां, नागड़ दूत भयाणों।

काचा तोड़ निकुचा भाषे, अघट घटे मल माणों। धरती अरू असमान अगोचर, जातै जीव न तेही जाणों।

आवत जावत दीसै नाही, साचर जाय अयाणों। जंवर तंणा जमदूत दहैला, मल बैसेला माणों।

तातै कलीयर कागा रोलों, सूना रह्या अयाणों। आयसां जोयसां भणता गुणतां, वार महूर्तां पोथा थोथा। पुस्तक पढ़िया वेद पुराणों।

भूत परेती कांय जपीजै, यह पाखण्ड परवाणों। कान्ह दिशावर जेकर चालो, रतन काया ले पार पहुंचो। रहसी आवा जाणों।

तांह परेरै पार गिराये, तत के निश्चल थाणों। सो अपरंपर कांय नं जंपो, तत खिण लहो इमाणों।

भल मूल सींचो रे प्राणी, ज्यूं तरवर मेलत डालूं। जइयां मूल न सींच्यो, तो जामण मरण बिगोवो।

अहनिश करणी थीर न रहिबा, न बंच्या जम कालूं। कोई कोई भल मूल सींचीलो, भल तंत बूझीलो।

जीव तड़ा कुछ लाहो होयसी, मूवा न आवत हाणी।