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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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शब्द 40 / 120

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शब्द सुन प्रसन्न हुआ, द्विविधा नाही कोय।

तब सो विश्नोई हुवा, मन का धोखा खोय।

शब्द 40

ओ३म् सप्त पताले तिहूं त्रिलोके, चवदा भवने गगन गहीरे। बाहर भीतर सर्व निरंतर, जहाँ चीन्हों तहां सोई।

सतगुरु मिलियों सतपंथ बतायो, भ्रान्त चुकाई, अवर न बुझबा कोई।