शब्द 110
ओ३म् मथुरा नगर की राणी होती, होती पाटम दे राणी।
तीरथ वासी जाती लूटे, अति लूटे खुरसाणी। मानक मोती हीरा लूट्या, जाय बीलूधा डाणी।
कवले चूकी वचने हारी, जिहिं औगुण ढ़ांची ढ़ोवै पाणीं। विष्णु कूं दोष किसो रे प्राणी, आपे खता कमाणी।
सतगुरु ऊभा साथरी, खिणिये जाम्भोलाव।
धमकारा धरती हुवै, गहिही सूदे घाव।