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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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शब्द 21 / 120

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जाट प्रच पाऐ लज्ञा, याका घर चालीस।

विश्नोई होते भये, जान लियो जगदीश।

शब्द 21

ओ३म् जिहिं के सार असारूं, पार अपारूं, थाघ अथाघूं। उमग्या समाघूं, ते सरवर कित नीरूं।

बाजा लो भल बाजा लो, बाजा दोय गहीरूं। एकण बाजै नीर बरसै, दूजै मही बिरोलत खीरूं।

जिहिं के सार असारूं, पार अपारूं, थाघ अथाघूं। उमग्या समाघूं, गहर गंभीरूं, गगन पयाले, बाजत नादूं।

माणक पायो फेर लुकायो, नहीं लखायो।

दुनिया राती बाद विवादूं, बाद विवादे दाणूं खीणां ज्यूं पहुपे खीणां भंवरी भंवरा। भावै जाण म जाण पिराणी, जोलै का रिप जंवरा।

भेर बाजातो एक जोजनो, अथवा तो दोय जोजनो। मेघ बाजा तो पंच जोजनो, अथवा तो दश जोजनो। सोई उतम ले रे प्राणी, जुगां जुगांणी सत कर जांणी।

गुरु का शब्द ज्यूं बोलो झीणी बाणी, जिहिं का दूरा हूंतै दूर सुणीजै। सो शब्द गुणां कारूं, गुणां सारूं बले अपारूं।