शब्द 96
ओ३म् सुण गुणवंता सुण बुधवंता, मेरी उत्पति आदि लुहारूं।
भाठी अन्दर लोह तपीलो, तंतक सोनों घड़ै कसारूं। मेरी मनसा अहरण नाद हथोड़ो, शशीयर सूर तपीलों, पवन अधारी खालूं।
जे थे गुरु का शब्द मानीलो, लंघिबा भव जल पारूं। आसण छोड़ी सुखासण बैठो, जुग जुग जीवै जम्भ लुहारूं।