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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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शब्द 95 / 120

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देव तणै दरबार में, ब्राह्मण आयो एक।

समझन को बहु दिवस है, अब का भयो अलेख।

शब्द 95

ओ३म् वाद-विवाद फिटाकर प्राणी, छोड़ो मन हट मन का भाणों।

कांही के मन भयो अंधेरो, कांही सूर उगाणों। नुगरा कै मन भयो अन्धेरो, सुगरा सूर उगाणों।

चरणभि रहीया लोयण झुरीया, पिंजर पड़्यो पुराणों। बेटा बेटी बहन रू भाई, सबसै भयो अभाणों।

तेल लियो खल चोपै जोगी, रीता रहीयो घाणों। हंस उडाणों पंथ विलंब्यो, कीयो दूर पयाणों।

आगै सुरपति लेखो मांगै, कह जीवड़ा के करण कमाणों। जीवड़ा नै पाछो सुझण लागो, सुकरत ने पछताणें।