मुख्य सामग्री पर जाएँ
गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह
शब्द 101 / 120

छपय

शुभ दिन देख विचार कै, नीकै करिये दान।

तब ब्राह्मण ऐसे कह्यो, पुन तीर्थ अमावस जान।

शब्द 101

ओ३म् नितही मावस नित संकराति, नित ही नवग्रह वैसें पांति। नितही गंग हिलोले जाय, सतगुरु चीन्हैं सहजै न्हाय।

निरमल पाणी निरमल घाट, निरमल धोबी मांड्यो पाट। जे यो धोबी जाणै धोय, घर में मैला वस्त्र रहै न कोय।

एक मन एक चित साबण लावै, पहरंतो गाहक अति सुख पावै।

ऊंचै नीचे करै पसारा, नही दूजै का संचारा। तिल में तेल पहुंप में वास, पाँच तंत में लियो प्रकाश।

बिजली कै चमकै आवै जाय, सहज शून्य मैं रहै समाय। नै यो गावै न यो गवावै, सुरगै जाते बार न लावै।

सतगुरु ऐसा तत्व बतावै, जुग जुग जीवै बहुर न आवै।