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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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शब्द 9 / 120

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काजी कहै सुण जम्भ जी, किया कर्म न होय।

नमाज पढ़त है दीन की, सगरा मेल दे धोय।

शब्द 9

ओ३म् दिल साबत हज काबो नेड़ै, क्या उलबंग पुकारो।

भाई नाऊँ बलद पियारो, ताकै गलै करद क्यूं सारों।

बिन चीन्है खुदाय बिबरजत, केहा मुसलमानों।

काफर मुकर होकर राह गुमायो, जोय जोय गाफिल करें धिंगाणों।

ज्यूं थे पश्चिम दिशा उलबंग पुकारो, भल जे यो चिन्हों रहमाणों।

तो रूह चलंते पिण्ड पड़ंतै, आवै भिस्त विमाणों।

चढ़ चढ़ भींते मड़ी मसीते, क्या उलबंग पुकारो।

कांहे काजै गऊ विणासै, तो करीम गऊ क्यूं चारी।

कांही लीयो दूधूं दहियूं, कांही लीयूं घीयूं महीयूं। कांही लीयूं हाडूं मासूं, काहीं लीयूं रक्तूं रूहियूं।

सुणरे काजी सुणरे मुल्ला, यामै कोण भया मुरदारूं।

जीवां ऊपर जोर करीजै, अंत काल होयसी भारूं।