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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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शब्द 57 / 120

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सैसों सतगुरु सूं कहै, सुणिये सतगुरु भेव।

सामों बोहता म्हे कियो, सुरगा तणों ज देव।

शब्द 57

ओ३म् अति बल दानों सब स्नानों, गऊ कोट जे तीरथ दानों, बहुत करै आचारूं।

ते पण जोय जोय पार नहीं पायो, भाग परापति सारूं। घट ऊंधे बरषत बहु मेहा, नीर थयो पण ठालूं।

को होयसी राजा दुर्योधन सो, विष्णु सभा महलाणो। तिण ही तो जोय जोय पार नहीं पायो, अधविच रहीयो ठालूं।

जपिया तपिया पोह बिन खपिया, खप खप गया इवाणी। तेऊ पार पहुंता नाही, ताकी धोती रही अस्मानी।