शब्द 71
ओ३म् धवणा धूजै पाहण पूजै, बे फरमाई खुदाई। गुरु चेले के पाऐं लागै, देखो लोग अन्यायी।
काठी कण जो रूपा रेहण, कापड़ मांह छिपाई। नीचा पड़ पड़ ताने धोकै, धीरा रे हरि आई।
ब्राह्मण नाऊँ लादण रूड़ा, बूता नाऊँ कूता। वै अपहानै पोह बतावै, बैर जगावै सूता।
भूत परेती जाखा खांणी, यह पाखण्ड परवाणों। बल बल कूकस कांय दलीजै, जांमै कणूं न दाणूं।
तेल लियो खल चोपै जोगी, खलपण सूंघी बिकाणों।
कालर बीज न बीज पिराणी, थलसिर न कर निवाणों। नीर गऐ छीलर कांय सोधों, रीता रह्या इवाणों।
भवंता ते फिरंता फिरंता ते भवंता, मड़े मसाणें तड़े तड़गे। पड़े पखाणें ह्वाते सिद्धि न काई, निज पोह खोज पिराणी।
जे नर दावों छोड़यो मेर चुकाई, राह तेतीसां की जांणी।