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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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शब्द 72 / 120

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वेद पुराणे जो लिख्या, पाप पुण्य बहु देव।

मही देव ऐसे कही, कहै जम्भगुरु भेव।

शब्द 72

ओ३म् वेद कुराण कुमाया जालूं, भूला जीव कुजीव कु जाणी। वसंदर नही नख हीरूं, धर्म पुरुष सिरजीवै पुरूं।

कलि का माया जाल फिटा कर प्राणी, गुरु की कलम कुराण पिछाणी। दीन गुमान करीलो ठाली, ज्यूं कण घातै घुण हांणी।

साच सिदक शैतान चुकावों, ज्यूं तिस चुकावै पाणी। मैं नर पूरा सरविण जो हीरा, लेसी जांकै हृदय लोयण, अन्धा रह्या इंवाणी।

निरख लहो नर निरहारी, जिन चोखंड भीतर खेल पसारी। जंपो रे जिण जंपै लाभै, रतन काया एह कहाणी।

काही मारू काही तारूं, किरिया बिहूणा पर हथ सारूं। शील दहूं उबारूं ऊन्हें, एकल एह कहाणी।

केवल ज्ञानी थलसिर आयो, परगट खेल पसारी। कोड़ तेतीसों पोंह रचावण हारी, ज्यूं छक आयी सारी।