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गुरु जम्भेश्वर भगवान
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शब्द 98 / 120

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एक समय इलोल देव कूं आवियो।

हाथ सूं झाल्यो पावड़ो, जमात पूछावियो।

शब्द 98

ओ३म् जिहिं गुरु कै खिण ही ताऊं, खिण ही सीऊं। खिण ही पवणा खिण ही पाणी, खिण ही मेघ मंडाणों।

कृष्ण करंता बार न होई, थलसिर नीर नीवाणों।

भूला प्राणी विष्णु जंपो रे, ज्यूं मौत टले जिरवाणों। भीगा है पण भेद्या नांही, पाणी मांह पखाणों।

जीवत मरो रे जीवत मरो, जिन जीवन की विध जांणी। जे कोई आवै हो हो कर, आप जै हुइये पांणी।

जाकै बहुती नवणी बहुती खवणी, बहुती क्रिया समाणी। जांकी तो निज निर्मल काया, जोय जोय देखो ले चढ़ियो अस्मानी।

यह मढ़ देवल मूल न जोयबा, निज कर जंपो पिराणी। अनन्त रूप जोवो अभ्यागत, जिहिं का खोज लहो सुरवाणी।

सेतम सेतूं जेरज जेरूं, इंडस इंडूं, अइयालो उरध जे खैणी।