भजन 5
ब्याव बीनणी बिलखूं
तर्ज- ब्याव बीनणी बिलखूं...
धन-धन म्हारो भाग जागियो, सतगुरु आया आंगण में,
सगला म्हारा पाप धोय दिया, इस जुमले और जागण में । टेर।
समराथल सोने की नगरी, कण-कण हीरा मोती है,
जिण पर श्री गुरुदेव विराजे, अलख निरंजन जोती है।
आदि विष्णु जाम्भेजी रा, दर्शण पा लिया सागण मैं । 1।
भूल्यां भटक्या जीवां खातिर, जागण जमो रचायो है,
बरस एक में जमो दिराओ, ओही धरम भूलायो है ।
जमो दिराओ होम कराओ, सुख विष्णु गुण गावण में । 2।
बचपन खेलकूद में खोयो, भूल्यो रह्यो जवानी में,
गई जवानी, आयो बुढ़पो, गुरुजी री आज्ञा मानी मैं ।
भलो दिहाड़ो आज ऊगियो, बदी चवदश आई फागण में । 3।
इण जागण री महिमा भारी, मुख से वरणी ना जावे ।
हिरदे विष्णु नाम रहे, बाजोजी यूं फ रमावै ।
साधे मोमणे कमी ना राखी, साखी शब्द सुणावण में । 4।
धर्म कर्म ना भजन कियो है, जैसो तैसो हूं थारो।
दीन गरीब जान प्रभुजी बेड़ो पार करो म्हारो ।
भूली चूकी माफ करीज्यो, सेवा चाकरी राखण में । 5।
नवण प्रणाम मानज्यो म्हारी, सेवक भोलो भालो हूं,
ऊपर से उजलो दीसूं, पर मन भीतर सूं कालो हूं ।
रामकरण कहे फिर नहीं आऊं, इस आवा और जावण में । 6।