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गुरु जम्भेश्वर भगवान
संग्रह6 / 94

दूसरा अध्याय · कथा 6

अवतार के निमित्त कारण

हे शिष्य! वैसे तो अवतार के कई अर्थ हो सकते हैं, किन्तु मुख्यतया प्रकट होना है। देवता का भूमि पर पदार्पण, नया दर्शन, विकास इत्यादि। भगवान् विष्णु के 10 अवतार प्रसिद्ध हैं। मच्छ,कच्छ,वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम-कृष्ण, बुद्ध एवं दसवाँ कल्कि होगा। इसी बात को स्वयं जाम्भोजी ने शब्द वाणी में भी कहा है- नव अवतार नमो नारायण, तेपण रूप हमारा थीयूं। जब-जब धर्म की हानि होती है और पाप बढ़ जाता हैं, तब-तब भगवान् विष्णु जन्म लेते हैं। उसे ही अवतार कहा जाता है। यहाँ पृथ्वी पर पुनः धर्म की स्थापना करते हैं। साधु (सज्जन) पुरुषों की रक्षा एवं दुष्टों का विनाश करते हैं। यह कार्य युगों-युगों, में जब कभी भी ऐसी परिस्थिति आती है, तभी अवतार लेते हैं।

द्वापर में भगवान् कृष्ण ने अलौकिक कार्य किए। कलयुग के आगमन से पूर्व ही अपनी लीला समेट ली। कृष्ण के पश्चात् सदा से उपेक्षित मरुभूमि में कोई ऐसी क्रान्ति न हो सकी, जिससे धर्म का उत्थान हो सके। यहाँ के निवासी सदा ही उपेक्षित रहे। अन्य अवतार, महापुरुष कहीं-कहीं अन्य देशों में ही प्रचार करते रहे। इस समय धर्म का प्रचार करके लोगों को सचेत करने की महत्ती आवश्यकता थी।

लोग धर्म, कर्म, पवित्रता, शौच, स्नान, सत्य, प्रिय-भाषण इत्यादि नहीं जानते थे। अज्ञानान्धकार में डूबे हुए थे। नित्य लड़ाई-झगड़ा, व्यर्थ का वाद-विवाद, चोरी-निन्दा, झूठ आदि का कुछ भी ध्यान नहीं था। वैदिक धर्म लुप्त हो गया था। किन्तु कल्पित देवी देवताओं की भरमार थी। देवताओं के नाम से पूजा-पाठ में जीव हिंसा से भी परहेज नहीं था। जीवों पर दया नहीं थी। खाद्य-अखाद्य भोजन का निर्णय नहीं था। जीवन को बर्बाद करने वाले नशे अत्यधिक प्रचलित थे। जीवन जीने की कला नहीं जानते थे। जीवन में मायूसी छाई हुई थी। जीने का कुछ भी लाभ मालूम नहीं पड़ता था। ऐसी अवस्था उस समय पन्द्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी में लोगों की हो चुकी थी।

इस प्रकार के अज्ञानान्धकार में लिप्त लोगों को कौन उबारे? अन्य संत महापुरुष तो इस कंटीले, कंकरीले, कठोर देश से दूर ही रहना पसन्द करते थे। जहाँ पीने के लिए जल भी सुलभ न हो। ऐसे देश से भला कौन प्रीति करेगा? भगवान् नृसिंह ने प्रह्लाद को वचन दिया था कि मैं तुम्हारे बिछड़े हुए जीवों का उद्धार करूँगा। पाँच करोड़ सतयुग में पार हो चुके, सात करोड़ त्रेतायुग में, नव करोड़ द्वापरयुग में पार उतर गये। किन्तु बारह करोड़ तो अवशिष्ट थे। उन्हें कौन पार करेगा? भगवान् विष्णु स्वयं ही जाम्भोजी के रूप में अवतार लेकर आये। यही मुख्य निमित्त कारण होगा।

भगवान् को अपने भक्त प्रिय होते हैं। उन्हें उबारने के लिए, धर्मरूपी नौका लेकर संसार में उतर आते हैँ। जहाँ कहीं पर भी छुपे हुए हैं, वहीं खोज कर लेते हैं। म्हे खोजी थापण होजी नाहीं, खोज लहां धुर खोजूं। जीव चाहे कितने ही नये-नये शरीर धारण कर ले, किन्तु वह स्वयं ज्यों का त्यों रहता है। जीव में कुछ भी अन्तर नहीं आता है। नये-नये शरीरों में अन्तर अवश्य ही आता है। इसलिए जाम्भोजी महाराज ने उन जीवों को पहचाना था। उनमें जो प्रह्लाद पंथी थे, उन्हें पार किया। भगवान् के अवतार होने का यह भी कारण होगा।

भगवान् कृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ था। जन्म के तुरंत बाद पिता वसुदेव ने देवकी की आज्ञा से ही अंधेरी रात्रि में यमुनाजी के पार गोकुल गाँव में पहुँचा दिया था।

गोकुल में नन्दजी पिता कहलाये तथा यशोदा माता बनी। सम्पूर्ण बाल्यावस्था गोकुल में ही यशोदा की गोद में खेलते हुए व्यतीत कर दी। कृष्ण-बलराम जब बड़े हुए तब उन्हें बुलाने के लिए कंस राजा का भेजा हुआ अक्रूर आ गया। अक्रूर ने ब्रजवासियों को संदेश सुनाते हुए कहा- आप लोग सालाना कर कंस को चुकता करने चलो। कृष्ण-बलराम को भी उनके मामा ने धनुष यज्ञ देखने को बुलाया है। प्रातःकाल ही चलना है।

कंस का सन्देशा सुनकर ब्रजवासी जन नन्द आदि गोप अपने अपने छकड़ों में सामान भरकर मथुरा को रवाना हुए। अक्रूर ने कृष्ण बलराम को कंस के रथ पर बिठाया और गोप ग्वाल, यशोदा के देखते ही देखते रथ को मथुरा की तरफ चला दिया। आगे-आगे अक्रूर कृष्ण-बलराम को लिए हुए जा रहे थे। पीछे-पीछे ग्वाल-बाल नन्द आदि जा रहे थे। धनुष यज्ञ का तो बहाना था। कृष्ण बलराम को माम्मा कंस किसी उपाय से मरवाना चाहता था। कुवलियापीड हाथी द्वारा या शल, तोशल, मुष्टिक, चाणूर आदि पहलवानों द्वारा मरवाने की योजना थी। किन्तु भगवान् की माया से सभी कार्य उलट-पुलट हो गए। स्वयं कृष्ण बलराम ने उस हाथी और उन पहलवानों को मारकर अपने मामा कंस को भी मारने में देर नहीं की।

दुष्ट राजा कंस को मारकर भगवान् ने देव-दानव एवं मानवों का भला ही किया। देवताओं ने जय- जयकार की। आकाश से पुष्प बरसाये। कंस को मारकर सर्वप्रथम कृष्ण अपने माता पिता देवकी-वसुदेव के पास बन्दीगृह में पहुँचे। उनके बन्धन छुड़ाये और हाथ जोड़कर प्रणाम किया। किन्तु आश्चर्यचकित वे दोनों भगवान् को सामने देखकर कुछ भी नहीं बोल सके।

ये तो भगवान् हैं, हमारा बेटा कहाँ है? पुत्र सुख से हम वंचित रहे हैं। इतने बड़े भगवान् को कैसे लाड़ प्यार करें? कैसे गोदी में बिठायें? हमारा तो जीवन ही व्यर्थ हो गया। ऐसा कहते हुए एक दृष्टि से देखते ही रह गये। पलकें झपकने का क्रम ही भूल गयी। भगवान् कृष्ण ने देखा कि माता-पिता मुझसे प्रेम नहीं कर रहे हैं। इन्हें ज्ञान हो गया है। मोह से निवृत्त हो गये हैं। बालक सुख से वंचित हो रहे हैं। क्यों न इन्हें अपनी माया से मोहित करूँ, जिससे मुझे भगवान् न मानकर साधारण बालक मानकर मुझे लाड-प्यार दें।

ऐसा मानकर भगवान् ने उन ज्ञानी माता-पिता के भी माया का पर्दा डाल दिया, जिससे उन्हें वहीं भगवान् छोटे नन्हें बच्चे दिखाई देने लगे। माँ का प्यार उमड़ पड़ा। स्तनों में दूध की धारा बहने लगी। गद्गद् वाणी से माता अपने बच्चे को दुलारने लगी।

कृष्ण ने कहा-हे मात! आपने मेरी वजह से बहुत ही दुःख उठाया है। कितने वर्षों तक आपको जेल में रहना पड़ा। मैं भी परवश था। आपके पास आ नहीं सका। असली जन्म दाता तो आप ही हैं। मैं भी अपनी जननी से दूर रहा, कुछ भी सेवा नहीं कर सका। मेरा यह दुर्भाग्य ही है। जो मुझे दुलार-प्यार, दूध-मक्खन आदि माँ के हाथ से मिलना चाहिये था उससे मैं वंचित रहा हूँ। असली माँ की तो बात ही कुछ और है।

अब तक जो कुछ भी हुआ है। हे मेरे जनक! आप भूल जाइये। आगे के लिए फिर कभी आपको इस प्रकार से अकेले छोड़कर नहीं जाऊँगा। सदा ही आपकी सेवा में तत्पर रहूँगा। अब मुझे आप क्षमा कर दीजिये। मैं आपका ही बेटा हूँ। आपके ही पास रहूँगा। निश्चित हो जाइये। भगवान् के ऐसा कहने पर वसुदेव-देवकी ने बिछड़े हुए अपने लाला को गले से लगा लिया। आँखों में आँसुओं की झड़ी लग गयी।

देवकी ने कहा-बेटा! मैंने तो तुम्हें जन्म लेते ही त्याग दिया था। मैं क्या करती? मैं लाचार थी। तुम्हारे नाम मात्र के मामा कंस से भयभीत थी। तुम्हारे जन्म से पूर्व तुम्हारे भाइयों को कंस ने मेरी आँखों के सामने पटक-पटक कर मार दिये थे। तुम हमारी अंतिम आठवीं संतान हो। मैंने तो तुम्हारी भलाई सोची थी कि कहीं इस सुन्दर सलोने कृष्णवर्ण के बालक को दुष्ट कंस वही गति न कर दे, जो पहले की थी। इसलिए हे कृष्ण! मैंने तुझे रातों-रात गोकुल गाँव में नंद-यशोदा के यहाँ पहुँचा दिया। इसी का फल आज तुम प्राप्त हुए हो। अन्यथा माँ अपने नवजात शिशु को कहीं भी अपने से अलग नहीं होने देती। बेटा! इस बात का तुम बुरा मत मानना। कहीं ऐसा न हो कि अपने जन्म की बात सुनकर तू हमें छोड़कर चला जाये। अब तक तो तुम्हारी प्रतीक्षा में समय व्यतीत कर दिया कि बेटा एक दिन अवश्य ही आयेगा। कंस को मारेगा और आकर हमें माताजी-पिताजी कहकर पुकारेगा। इसी प्रतीक्षा में हमने इतने दिन कारावास में व्यतीत कर दिए। किन्तु अब आगे तुम्हारे बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकते। इस प्रकार से माया का पर्दा छा जाने से माँ-बाप अपनी संतान को प्राप्त करके प्रसन्नचित हो गए।

माता-पिता को मुक्त करके कृष्ण बाग में गये, जहाँ नन्दजी तथा अन्य साथी रुके हुए थे। कृष्ण की प्रतीक्षा कर रहे थे। अब कृष्ण आयेगा, तभी साथ में लेकर ब्रज में जायेंगे। कँस को मारने का समाचार ब्रजवासियों को सुनायेंगे। खुशियाँ मनायेंगे, ऐसी वार्ता चल रही थी कि कृष्ण तो पहुँच ही गये।

सभी कहने लगे देखोः वह हमारा प्यारा कन्हैया आ गया है। कल तो इसने धनुष यज्ञ में चमत्कार ही कर दिया। भरी सभा के देखते ही देखते पलक झपकने के साथ ही उस बलवान राजा कंस को राजसिंहासन से नीचे घसीट लिया और मार गिराया।

सभी एक स्वर में कहने लगे- कन्हैया अतिशीघ्रता करो वापिस भी तो चलना है। यह प्रिय समाचार अपने प्रियजनों को भी तो सुनाना है। खुशियाँ मनानी हैं। भगवान् बोले-हे मेरे प्रिय बन्धुओ! तथा मेरे पूज्य पिताश्री! अब मैं इस समय वापिस ब्रजभूमि में नहीं जाऊँगा, किन्तु मैं वचन देता हूँ कि फिर कभी आऊँगा। मैं अवश्य ही आऊँगा, किन्तु कब आऊँगा, यह अभी नहीं कह सकता। यहाँ कार्य अधिक है। समय थोड़ा है। हो सकता है, यह जन्म ही व्यतीत हो जाये।

मेरे पूज्य पिताजी एवं माता यशोदा का शरीर ही न रहे। इस शरीर को तो जाना निश्चित ही है। आप लोग बड़े-बूढ़े भी यहाँ से प्रयाण कर जायें तो मैं फिर किसके पास आऊँगा। फिर भी मैं वचन देता हूँ, आऊँगा जरूर। यदि यह जीवन न रहे तो भी घबराने की आवश्यकता नहीं है। दूसरा जन्म भी तो मिल जायेगा। तुम्हारी मुझसे मिलने की आशा, तुम्हें दूसरा जन्म देगी। उस जन्म में नहीं आ सकूँ गा, तो दूसरे जन्म में अवश्य ही आऊँगा।

हे पिताजी! आपकी तथा यशोदा की आयु बहुत ही कम रह गयी है। आप स्वर्ग में प्रस्थान करोगे, तब तक मुझे यहाँ कार्य की फुर्सत ही नहीं है। अब आगे मुझे जरासंध, शिशुपाल, दन्तवक्त्र आदि कितने ही राक्षस और माद्भने हैं। इस धरती का भार उतारने के लिए ही मेरा यहाँ आगमन हुआ है। इसलिए जब तुम्हारा दूसरा जन्म होगा, तभी मैं तुम्हारा पुत्र बनकर आऊँगा, क्योंकि पुत्र के प्रेमवश आप रहेंगे। आपका शरीर इसी भावना से छूटेगा, तब तो आपका जन्म होना अवश्यभावी है।

मैं भी आपको वचन देता हूँ, तो मुझे भी आपका पुत्र बनकर आना आवश्यक है। पीपासर व्रज भूमि है। उसी व्रजभूमि में आगामी युग में आप स्वयं नन्द ही लोहटजी के नाम से जन्म लोगे और यशोदा स्वयं उनकी पत्नी हांसादेवी के नाम से प्रसिद्ध होगी। मैं स्वयं आपके जन्म लेकर आऊँगा। आपकी इच्छा पूरी करूँगा। आप लोग अभी जाइये। ब्रजवासी आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।

हे पिताश्री! आप जाकर माता यशोदा को मेरा सन्देशा कह देना कि आऊँगा जरूर, किन्तु कब के बारे में मत पूछें। प्रतीक्षा का फल मीठा होता है। भगवान् का स्मरण बना रहे। अन्त मति सो गति। अन्त काले च मामैव स्मरणमुक्तवा कलेवरंम्। अन्त समय में जिसका भी स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग करेगा, वही गति यानि जन्म होगा। तुम्हारा यह जन्म तथा दूसरा जन्म भी सफल हो जाएगा। स्वयं श्रीकृष्ण ही जाम्भोजी के रूप में अवतार लेकर आये थे। यह भी एक निमित्त कारण था। नन्दजी स्वयं हंस रूप में है। किन्तु लोहट के रूप में जन्म हुआ। एक ही आशा घर कर गयी कि स्वयं भगवान् ही पुत्र के रूप में आ जाये। इसी आशा में लोहटजी को कोई सन्तान नहीं हुई थी। अन्य जीव का तो जन्म ही नहीं होगा, क्योंकि आशा भगवान् की लगी है। भगवान् आयेंगे, किन्तु तपस्या करनी पड़ेगी तथा प्रतीक्षा भी करनी पड़ेगी।

इसी ऊ हा-पोह में लोहट एवं हांसा की आयु ने वृद्धावस्था को प्राप्त कर लिया। दिल में तो सदा भावना बनी रही कि कुछ न कुछ होगा अवश्य ही, किन्तु आयु को देखते हुए आशा निराशा में बदलती जाती। इस प्रकार से लोहट-हांसा पीपासर में रहते। गाँव में सामान्य ठाकुर, पंवार वश में उत्पन्न हुए थे। कृषि तथा गो- पालन करना अपना कर्त्तव्य समझते थे। सदा नियमों का पालन करते हुए सुख से जीवन व्यतीत कर रहे थे। घर में अन्न, धन, लक्ष्मी सभी कुछ था, किन्तु एक कमी थी कि वंश परम्परा को आगे बढ़ाने वाला कोई नहीं था। हांसा की गोद खाली थी। सभी सुख होते हुए भी महिला बिना संतान के अपना जन्म व्यर्थ ही मानती है। स्त्री-पुरुष किसके लिए जिएँ यदि संतान नहीं हो तो।

सभी ग्रामवासियों के दिन अच्छी तरह व्यतीत हो रहे थे। गायें आदि जंगल से चर करके आती थी। अमृत तुल्य दूध देती थी। घरों में घी, दूध, दही आदि के भण्डार भरे रहते थे। कोई भी पशु-पक्षी आदि भूखा नहीं था। सभी आनन्द मंगल में थे। समय पर वर्षा हो जाती थी। सुखी जीवन के लिए बस यही चाहिये था। इससे ज्यादा माँग भी नहीं थी। जो भी परमात्मा प्रसन्न होकर दे देता, उसमें ही संतोष सुख का अनुभव करना उनका जीवन हो गया था। अधिक लोभ ही काम, क्रोध को बढ़ावा देता है। काम से क्रोध और क्रोध ही विनाश का कारण बनता है। ऐसी परिस्थिति उस गाँव की नहीं थी। जिस गाँव पीपासर के ग्रामपति ठाकुर लोहट थे। वे स्वयं ही संतोषी, भगवान् के प्रिय भक्त थे। यथा राजा तथा प्रजा, जैसा राजा वैसी प्रजा।

समय सदा एक रस नहीं रहता। सुख के पीछे दुःख भी आता है तथा दुःख के पीछे सुख भी आता है। दुखिया है जो सुखिया होयसी, करसी राज गहीरूं। बिना दुत्नख के सुख का पता नहीं चलता। सुख के लिए दुःख का आना भी जरूरी है। यही पीपासर वासियों के लिए एक दुःख का हल्का झटका लगा।

विक्रम सम्वत् 1507 में पीपासर ग्राम के आसपास अकाल पड़ा। क्योंकि वर्षा नहीं हुई। अन्न की तो कमी नहीं थी, क्योंकि लोग प्रायः दो तीन साल के लिए अन्न कोठियों में भरकर रख लेते। कुछ पता नहीं आगे क्या होगा? अन्न तो हम हमारे खेतों का ही जीमेंगे, जल अपने ही कुवें का पीयेंगे। वायु तथा सूर्य तो सदा हमारे देश का ही उपलब्ध है। अन्न-जल ही हमारे संस्कारों का जनक है। इसलिए घर-घर अन्न के कोठार भरे थे, किन्तु गायों के लिए घास की कमी पीपासर के आसपास आ गयी थी।

हम सभी पूर्ण भोजन करके सोयेंगे। हमारे प्राणों से भी प्रिय, हमारे जीवन के आधार पशु आदि भूखे रहेंगे, तो हमें नींद कैसे आयेगी? ऐसा विचार करके ग्रामीण लोग ग्रामपति ठाकुर लोहटजी के पास गये और अपना दुःख सुनाने लगे। लोगों ने कहा-हे ठाकुर! हम आपके पास आये हैं, यह केवल गाँव की ही बात नहीं है, आपकी गायों की स्थिति अच्छी नहीं है। आजकल खेत-जंगलों में गायों के चरने के लिए कुछ भी नहीं है। हमारी गायें जंगल से भूखी आती हैं। ये हमारे पशुधन हमारी तरफ अश्रुपूर्ण नेत्रों से देखते हैं। हमसे यह सहन नहीं होता। जैसा भी हो इन मूक पशुओं के लिए कुछ तो करना ही पड़ेगा। अब तक तो जैसे-तैसे वन में ही उन गायों ने गुजारा किया है। किन्तु अब आगे गुजारा होना असम्भव है। वर्षा का समय तो अभी काफी दूर है, पूरी सर्दी तथा गर्मी पार करनी है। लोहटजी ने कहा-आप लोग ही बतलाइये कि मैं क्या करूँ? यथाशक्ति मैं आपके साथ चलने को तैयार हूँ। भाइयो! आप लोगों में यह भूल है। हम लोग अपने भोजन के लिए अन्न एकत्रित कर लेते हैं, किन्तु उन निरीह प्राणियों के लिए घास तृण आदि एकत्रित नहीं करते। वर्षा का क्या पता है? आगे से ऐसी भूल नहीं करेंगे। घास इकट्ठा करके रखेंगे, ताकि विपत्ति में काम आये।

ग्रामीण लोग कहने लगे-हे ठाकुरजी! ये बातें तो आगे की हैं। वर्तमान में हमें क्या करना चाहिए? जिससे हमारा पशुधन भूख मरकर समाप्त न हो जाय। क्या करें और क्या न करें, कुछ समझ में नहीं आ रहा है। इस प्रकार से विचार में डूबे हुए लोगों को सांत्वना देने के लिए एक बटाऊ-पथिक उसी समय ही आकर सभा में बैठा। उसे पथिक जानकर आदर सत्कार किया, अन्न-जल की मनुहार की तथा पथिक से पूछा कि हे पथिक! आप इस समय कहाँ से आ रहे हैं? क्या कहीं मार्ग में तुमने गायों को घास चरते हुए देखा है? कहीं घास की अधिकता है? यदि कहीं देखा है, तो बतलाने की कृपा करें।

तुमने यहाँ पीपासर में तो देखा ही होगा कि यहाँ आस-पास कहीं घास नहीं है। हमारी गायों की हालत खराब है, हम सभी ग्रामवासी यहाँ से गोवळवास हेतु प्रस्थान करना चाहते हैं। कुछ दिनों तक गोवळवास में रहेंगे। विपत्ति का समय बितायेंगे। जब अच्छी वर्षा होगी, तो वापिस लौट आयेंगे। वैसे तो स्वकीय जन्म भूमि छूटना अच्छा नहीं लगता है। कहा भी हैयद्यपि

लंका स्वर्णमयी, तदपति लक्ष्मण मे न रोचते,

जननी जन्मभूमिश्च, स्वर्गादपि गरीयसी।

बटाऊ ने कहा- आप लोग मेरी बात ध्यानपूर्वक सुनो! मैं आप लोगों के लिए हित की बात कहता हूँ। अभी-अभी मैं द्रोणपुर, छापर आदि स्थानों को देखता हुआ आया हूँ। मैं भी उसी देश का रहने वाला हूँ। हमारे यहाँ तो इस वर्ष अच्छी वर्षा हुई थी। लोगों ने खेतों से अन्न उठा लिया है तथा घास भी बहुत है। ये तुम्हारे गाँव की कितनी सी गाये हैं। सारे संसार की गायें आ जाये तो भी घास समाप्त होने वाली नहीं है। पीने के लिए तालाब जल से भरे हुए हैं। जल कभी कम नहीं होगा। आप लोग विपत्ति के समय यहाँ से चलिए, अपनी गायों को लेकर पहुँच जाइये। इसमें ही आपका हित है।

ऐसा कहते हुए वह बटाऊ सभी से आज्ञा लेकर वहाँ से रवाना हुआ। लोहटजी ने उस बटाऊ की बात का समर्थन किया और कहा- ऐसा ही करो। आप लोग किसी प्रकार की चिन्ता न करें। वहाँ तो हमारे छोटे भाई पूल्होजी रहते हैं। उनके यहाँ पर भी अपना ही है और दूसेरे लोग छापर द्रोणपुर में अपने ही भाई-बन्धु रहते हैं। किसी प्रकार की कोई कठिनाई नहीं होगी। मैं भी तुम्हारे साथ चलूँगा तथा साथ ही रहूँगा। मुझे तुम लोग इतना आदर देते हो, तो मेरा भी आपकी सेवा तथा सुख-दुःख में साथ निभाने का कर्त्तव्य बनता है। अभी शीघ्र ही चलो। देरी न करो। अपने-अपने छकड़ों पर आवश्यक सामान भर लो तथा गायों को आगे करके कल प्रातःकाल ही चलना है। बड़े-बूढ़ों को तथा बच्चों को गाँव में ही रहने दो। बाकी सभी चलते हैं गोवळवास को।

हे भाइयो! यह संसार भी गोवळवास ही है। इसे सत्य मानकर सदा-सदा के लिए रहने की कोशिश मत करो। एक दिन तो आज की भाँति यहाँ से भी रवाना होना ही पड़ेगा। यह तो छोटा प्रयाण है। कल महाप्रयाण होगा। सदा सुखी वही रहता है, जो हमेशा जाने के लिए तैयार रहता है।

प्रातःकाल की शुभ वेला में गायों का समूह ऐसे चला, जिस प्रकार से गंगा-यमुना की धारा बह रही हो। साँझ के समय दस कोस का मार्ग तय करके दुगोली पहुँचे। वहाँ पर गऊओं को जल पिलाया। प्रातःकाल वहाँ से चलकर भरनावां होते हुए सायं समय लाडनूं पहुँचे। वहाँ पर पूल्होजी पंवार रहते थे उनसे मिलन हुआ। तीसरी मंजिल शाम को छापर पहुँचे। रात्रि में छापर निवास किया और प्रातःकाल द्रोणपुर में जाकर डेरा लगाया। वहाँ के ठाकुर को यह पता चला कि पीपासर के ग्रामपति ठाकुर लोहटजी पंवार आये हैं। तो उन्हें ससम्मान गाँव की सीमा में बसाया। गायों को चरने के लिए एक तरफ की सींव बतला दी। जल पीने के लिए एक तालाब सौंप दिया। लोहटजी के साथ सभी ग्रामवासी अति आनन्दित हुए।

नित्य प्रति लोहटजी अपने साथियों के साथ गऊओं को चराने के लिए जाते थे। इस प्रकार से सर्दी का मौसम चला गया तथा गर्मी का मौसम प्रारम्भ हो गया था। गायें रात्रि में चरने के लिए जाती थी। ग्वाले रात्रि में भी गायों के साथ होते। कही ऐसा न हो कि वन्यजीव भेड़िया आदि हिंसक जानवर गायों को नुकसान पहुँचा दे और अपना भोजन बना ले। कहीं ऐसा न हो कि कोई पशु खो जाये। उनको संभालकर साथ में रखना होता है। चोरी-डकैती का भय भी सदा बना रहता है। सभी ग्वाले तो रोज एक साथ तो नहीं जाते थे, किन्तु बारी-बारी से दो-चार ग्वाले गायें चराने जाते थे। कभी-कभी लोहटजी की भी बारी आती थी, उन्हें गोपाल बनकर वन में जाना पड़ता था। बड़े हुए तो क्या हुआ, मर्यादा का पालन पहले तो बड़े को ही करना होता है। यदि बड़े ही नियम का उल्लंघन करेंगे तो छोटे लोग तो उन्हीं का अनुसरण करेंगे, नियम को तोड़ा करेंगे।

यद्यदाचरति श्रेष्ठः, तत्तदेवेतरो जनः।। गीता 3ः21।।

स यत् प्रमाणं कुरुते, लोकस्तदनुवर्तते

प्रथम वर्षा तो चैत्र में हो गयी थी, जिससे हरियाली हो गयी थी। तालाबों में जल भर गया था। गायें हरी- हरी घास चरकर आनन्दित हो रही थी। दूसरी वर्षा भी समय पर अक्षय तृतीया को हुई थी, जो खेत जोतने का उपयुक्त समय था। नववर्ष प्रारम्भ हो गया था। इस वर्ष भगवान् बड़े ही प्रसन्न थे। लगातार समय पर वर्षा हो गयी थी। किसान हर्ष से फूले न समाते थे। अपने-अपने हल, ऊँट तथा बैलों को लेकर खेत जोतने को जा रहे थे।

लोहटजी भी गायें चराते हुए सबकी खुशी में अपनी खुशी प्रकट कर रहे थे। इसी प्रकार एक दिन वर्षा हुई। उस दिन गऊओं को चराने की बारी लोहटजी की थी। रात्रि में अंधेरा था। अमावस्या के आसपास के दिन थे। लोहटजी अंधेरी रात को पार करके ब्रह्ममुहूर्त में गायें जंगल से लेकर वापिस अपने स्थान की ओर आ रहे थे।

स्नान-संध्या की वेला है। अतिशीघ्र वापिस पहुँचना है। नियम का पालन करना है। कहीं सूर्योदय हो जायेगा, तो नियम भंग हो जायेगा। स्नान सूर्योदय से पूर्व हो जाये, तो संध्या सूर्योदय के साथ की जा सकती है।

गायें भी शीघ्रता के साथ अपने-अपने बछड़ों के पास पहुँच जाना चाहती हैं। रात्रि में भरपेट घास खाया है तथा दूध स्तनों में उतर आया है। अपने बछड़ों को दूध पिलाना चाहती हैं। लोहटजी गायों के साथ ही द्रोणपुर के निकट पहुँच चुके हैं। शीघ्र ही अपने स्थान को पहुँच जायेंगे।

द्रोणपुर का जोधा जाट भी जल्दी में था। रात्रि में ही छकड़े पर बीज हल आदि खेती का सामान लादकर खड़ा कर दिया था, क्योंकि सुबह जल्दी ही घर से रवाना हो जाना था। तब तक सभी लोग सोते रहेंगे। पशु पक्षी,मानव,दानव आदि कोई सामने मिलेगा नहीं। तब तक अपने खेत में जाकर हल जोड़ दूँगा। यदि देर हो जायेगी, तो कोई अपशकुन हो जाएगा। अपशकुन हो जाने पर खेती करना व्यर्थ हो जायेगा। एक भी दाना नहीं होगा। भयंकर दुष्काल पड़ेगा, ऐसा विचार करते हुए जोधा अपने घर से बाहर निकला ही था कि सामने पीपासर के ग्रामपति ठाकुर लोहटजी पंवार मिल गये। उन्हें देखते ही जोधा दुमना हो गया। आगे जाऊँ या पीछे? ऐसा विचार करते हुए वहीं खड़ा हो गया। न आगे जा सका और न ही पीछे मुड़ सका। कहा भी हैगाड़ी

जोड़ी गाँव सूँ, सुणे सुगन निरधार।

निकसतई सामा मिल्यां, लोहटजी पंवार।

देखत ही दुमनो भयो, बोल्यो बचन करुर।

दाणो एक न होयसी, पड़सी काल जरूर।।

लोहटजी ने सम्बोधित करते हुए कहा-भाई! क्या बात है? रुक क्यों गये? आगे बढ़ो। तुम्हारे खेतों में अच्छी वर्षा हुई है। बाजरी बोने का समय अनुकूल है। जोधा कहने लगा-मैं क्या कहूँ, किसे दोष दूँ? जिन अपशकुनों से बचना चाहता था, वही हुआ, जो मैं नहीं चाहता था। तुम्हारे जैसे संतानहीन का दर्शन आज मुझे इस पवित्रवेला में हुआ है। तुम यह मानों कि आज मेरे घर तो बिजली ही गिर गयी। ऐसा कहते हुए जोधा वापिस अपने घर की ओर मुड़ गया। लोहटजी को एक झटका लगा। सोये हुए थे, जग गये। मेरा मुँह देखने से अकाल पड़ जाता है। अन्न,धन, धान्य नहीं होता, सभी जीव मेरी वजह से दुःखी होंगे। ऐसा यह जोधा कह रहा है। यदि ऐसी ही बात है, तो मेरा जीना किस काम का? यह जीवन जीकर भी मुझे क्या मिलेगा? केवल अपयश, अपमान के अतिरिक्त जिन्दगी में क्या रखा है? मैं तो विष की घूँट पी जाऊँगा, किन्तु मेरी वजह से अकाल पड़े और अन्नादि न हो तो सभी जीव दुःखी होवें, यह मैं कदापि नहीं चाहता। इसलिए अब एक क्षण भी मुझे जीने का अधिकार नहीं है।

ऐसा विचार करते हुए लोहटजी भी वापिस मुड़ गये। अब तो वापिस लौटकर गोवळवास में जाना नहीं है। ऐसा विचार करते हुए जंगल की तरफ चल पड़े। बालक-ग्वाल मिल गये। उन्हें समझाते हुए कहने लगे-हे साथियो! अब मैं तो वापिस जंगल की राह पकड़ रहा हूँ। आप लोग वापिस अपने-अपने निवास स्थानों पर जाइये। हमारे पशुधन को भी मैं आज से आप के ही सुपुर्द करता हूँ। सभी को राजी-खुशी का समाचार देना। तुम्हारा-मेरा साथ बस यहीं तक का था। अब आगे तुम्हारा और मेरा भगवान् ही मालिक है। देहं या पातयामि, कार्यं या साधयामि। या तो कार्य ही पूरा करूँगा या शरीर ही छोड़ दूँगा। तीसरा कोई विकल्प नहीं है।

गर्मी का मौसम था। लोहटजी भंयकर गहरे वन में जाकर ध्यानावस्थित हो गये। परमात्मा भगवान् विष्णु जगत के पालन-पोषणकर्त्ता हैं। वही बचायेंगे या मारेंगे। तो दोनों हाथों में लंÂ हैं। बचायेंगे तो इच्छा पूरी करेंगे, अन्यथा अपने ही पास बुलायेंगे। वह भी स्वीकार है। बिना अन्न-जल के मानव रहित वन में लोहटजी ने तपस्या प्रारम्भ की। मन प्राणों को जीत करके एकटक दृष्टि से भगवान् में ध्यान लगाकर बैठै हुए मूर्तिमान स्वयं शिव ही मालूम पड़ते थे। बिना अन्न-जल के प्राणों को कैसे धारण करेंगे? ये कोई शिव सदृश योगी तो हैं नहीं। एक साधारण किसान ही तो हैं। इन्होंने कोई योग साधना का अभ्यास तो किया नहीं है, किन्तु श्रद्धाभाव बलवान है। इसी के सहारे तपस्या में संलग्न हुए हैं।

गोवळवास में हांसादेवी अपने पति के आने की प्रतीक्षा कर रही है। नित्यप्रति की भांति स्नान संध्या का समय हो चुका है। अब तक लौटकर नहीं आये हैं। गउएँ तो अपने-अपने बछड़ों को दूध पिलाने के लिए आ गयद्ध हैं। आज मेरे प्राणप्रिय पतिदेव नहीं आये। बाहर जाकर देखूँ तो शायद अतिशीघ्र ही आते होंगे। लोहट तो आते दिखाई नहीं दिये, किन्तु एक बालक ने आकर धीरे से कहा-हे दादी! आज हमारे दादाजी तो वन में तपस्या करने चले गये हैं। हम लोग भी पीछे-पीछे जा रहे थे, किन्तु हमें वापिस लौटा दिया। वे आज नहीं आयेंगे।

दादीजी! ये बछड़े एवं गायें आपकी तरफ एकटक दृष्टि से देख रहे हैं। उनकी आँखों में झाँककर देखो? सभी कुछ शून्य (उदासीनता) दिखाई दे रही है। केवल तुम्हारे ही स्वामी तुम्हें छोड़कर नहीं गये हैं। वे तो हमारे सभी ग्रामवासियों के छोटे-बड़ों के मित्र थे। हमें तथा इन गायों को भी दुःख हो रहा है। ये बेचारे मूक प्राणी स्पष्ट शब्दों में तो बोलकर कुछ कह नहीं सकते, किन्तु रम्भा-रम्भा कर कुछ जरूर कह रहे हैं।

हे दादीजी! आप चिंता न करें। अतिशीघ्र ही परमात्मा विष्णु के दर्शन करके वापिस लौट आयेंगे। ऐसा हमें पूर्ण विश्वास है। हांसा ने पूछा। हे बालकों! उन्हें क्या हुआ? क्यों वन में चले गये? कहीं ऐसा न हो कि मैं अपने पीहर-मायके में रह रही हूँ। किसी ने गाँव का दामाद मानकर के कुछ कटुवचन या हंसी-ठिठोली तो न कर दी है। जिससे रूठकर वन में चले गये। यह गाँव ही छोड़ दिया। कहीं ऐसा तो न हुआ हो कि आप लोगों ने ही अपने वृद्ध दादा का कोई वचन अस्वीकार कर दिया हो? तुम लोगों से रूठ गये हों, अथवा मैं आलसी ठहरी उनकी सेवा में कुछ कमी आ गयी हो। पति को परमेश्वर मानना चाहिए किन्तु मैंने यहाँ पीहर में बैठकर कुछ लापरवाही कर दी है। ऐसा क्या कुछ हुआ, सो बतलाओ।

ग्वाल बालों ने कहा- हे ठकुरानी! न तो हमने कोई दोष दिया है और न ही आपने ही कुछ कहा है। इस गाँव का जोधा जाट प्रथम बार खेत में हलोतिया करने जा रहा था। कुदरती कुछ ऐसा संयोग हुआ। जो होनहार हो, उसे टाला नहीं जा सकता। लोहटजी उनको सामने मिल गये। जोधा शकुनों पर विचार रखता था। लोहटजी एक तो गाँव के ठाकुर, दूसरे दामाद और तीसरे निपुत्र, ये सभी योग-सुयोग एक साथ मिल गये। जोधा इसे अपशकुन मानकर वापिस घर लौट गया और हमारे दादाजी भी यहाँ पर न आकर वन में वापिस लौट गये। अब न जाने कहाँ गये हैं? अपनी धुन के पक्के हैं। हमारे दादाजी कार्य पूर्ण होने से पहले लौटकर नहीं आयेंगे।

दादीजी! आप भी भगवान् को ही याद करो। अब तो वही इस संकट से उबारेंगे। लोहटजी तपस्या में तल्लीन हो गये। लेकिन अन्न-जल के बिना प्राण ज्यादा दिन तो नहीं टिक सकते, किन्तु लोहटजी पर तो भगवान् की अपार कृपा है। उन्हें जीवित रखना है। प्राण ही तो भोजन करते हैं। प्राणों की 3ति अवरुद्ध हो जाये तो भोजन कौन करे? अब तो प्राण बाह्य वस्तु को छोड़कर अन्तर का अम्मृत रस पान करने लगे हैं। उसी के प्रभाव से योगी लोग युगों-युगों तक जीते हैं। लोहटजी भी बिना अन्न-जल के जीना सीख गये हैं।

प्राकृतिक प्रकोप भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता। जिनका प्राण, मन, आत्मस्थ हो जाये। सूक्ष्म रूप से भगवान् स्वयं लोहटजी में प्रवेश कर गये। उनके अंग-अंग से ज्योति बाहर छिटकने लगी। अब तो स्वयं तेजस्वी-तपस्वी बन गये थे। क्यों न होगा। जिनके पुत्र रूप में स्वयं भगवान् विष्णु स्वयं आने के लिए राजी हैं। लोहटजी ने बहुत से दिन समाधिस्थ होकर व्यतीत किए। उन्हें समय का कुछ भी ज्ञान नहीं रहा। न ही सुख-दुःख का अनुभव हुआ।

देवताओं को यज्ञ की आहुति मिलती रहे तो देवता प्रसन्न होते हैं। देवताओं के लिए मृत्युलोक से आने वाली यज्ञाहुति बन्द हो गयी थी। पुनः प्रारम्भ करवाने हेतु एकत्रित होकर भगवान् शिव, ब्रह्मा के पास पंहुचे और विनती करने लगे- हे प्रजापति! इस समय लोहट जो स्वयं तपस्या करने बैठे हैं। आर्त भक्त है। इनके दुःख की तरफ ध्यान दीजिये?

शिव ब्रह्मा ने कहा-हे देवताओ! आप हम सभी मिलकर हमारे ही देवाधिदेव पालन-पोषण कर्त्ता भगवान् विष्णु के पास चलते हैं। ब्रह्माजी ने कहा-उनकी तपस्या का समाधान पुत्र की प्राप्ति ही है। वह मेरे पास सामर्थ्य नहीं है। मैं उन्हें कुछ दे सकूँ तथा तपस्या से निवृत्त कर सकूँ।

अब हम सभी लोग भगवान् विष्णु के पास ही चलते हैं। हमारी समस्या एवं लोहट की तपस्या का समाधान एक ही है। ऐसा कहते हुए सभी देवता भगवान् विष्णु के पास पहुँचे और विनती करते हुए इस प्रकार से कहा-हे देवाधिदेव! लोहटजी पंवार द्रोणपुर में पुत्र प्राप्ति हेतु तपस्या में तल्लीन हैं। यह समय सर्वथा अनुकूल है। आप ही हमारे कष्ट एवं लोहटजी की व्यथा दूर कीजिये। हम सभी देवता मिलकर के कुछ भी नहीं कर सकते, किन्तु आप अवतार लेने में क्षमता रखते हैं। पूर्ण अवतारों की भांति इस समय हमारी विपत्ति दूर कीजिये।

मृत्युलोक में यज्ञादि बंद हो चुके हैं। जो सुगन्धी सर्वत्र होनी चाहिये थी, उसका लोप ही हो गया है। पुनः प्रारम्भ करवाइये? उसके बिना हम देवता दुर्बल हो रहे हैं। राक्षसों की ताकत बढ़ती जा रही है। दैवीय शक्ति का ह्रास एवं आसुरी शक्ति का बढ़ावा रोकिये। बेचारा मानव दोनों संस्कृतियों के बीच में पिसा जा रहा है। यह कार्य आप स्वयं अवतार लेकर ही कर सकते हो।

इसलिए हे देव! आप अवतार लीजिये। ये वही लोहट नन्दरायजी हैं तथा हांसादेवीजी स्वयं आपकी माता यशोदाजी हैं। और वही पीपासर ब्रजभूमि है। आपने वचन दिए थे। उन्हें पूरा करने का अवसर आ गया है। यदि समय रहते आपने देरी कर दी, तो पीछे पछताना ही पड़ेगा। क्योंकि लोहट एवं हांसा की देह नहीं रहेगी, तो फिर आप जन्म कहाँ लेंगे? आपके वचनों का क्या होगा? लोहट के भाग्य में संतान नहीं है। आयु भी पार कर गये हैं। अब प्राकृतिक उपायों से तो संतान होनी असम्भव है। बिना कुछ प्राप्त किए लोहटजी वहाँ से उठेंगे नहीं। उन्होंने प्रतिज्ञा कर ली है कि देहं या पांतयामि, कार्यं या साधयामि।

भगवान् विष्णु ने देवताओं को आश्वासन देते हुए कहा- आप लोग वापिस अपने-अपने स्थान को लौट जाइये। मैं स्वयं ही इस बात से परिचित हूँ। मैं अभी जाता हूँ और लोहट को सचेत करता हूँ। उन्हें माता-पिता के रूप में स्वीकार कर लेता हूँ तथा अपने वचनों को निभाता हूँ। आयो बारा काजै, बारा मैं सूं एक घटे तो सुचेलो गुरु लाजे। अनेक :प रूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे। जो एक से अनेक रूपों में अपने आप को परिवर्तित करने में सक्ष्म है वह विष्णु लोहटजी की तपोस्थली पर साधु के वेश में जा पहुँचे।

अलख जगाई, सत्य विष्णु की बाड़ी कहते हुए। यह विष्णु की सृष्टि ही सत्य है। सदा हरी-भरी फूलती-फलती रहे। यह बाग सदा ही सुगन्ध देता रहे। हे लोहट! उठ जाओ। योगी तुम्हारे द्वार पर खड़ा भिक्षा माँग रहा है। गृहस्थ के धर्म को निभाओ, लोहट! लोहटजी ने आँखें खोली, कानों में सुमधुर योगी की ध्वनि की झंकार सुनी। आँखों से दिव्य दर्शन हुए। लोहट ने आश्चर्यचकित नेत्रों से देखा था। ऐसा योगी-यति तो कभी देखा भी नहीं था, बिल्कुल अपरिचित, असामान्य।

लोहट ने हाथ जोड़कर योगी को प्रणाम किया और कहने लगे-हे महाराज! मेरा अहोभाग्य है कि इस जनशून्य देश में आपका दर्शन हुआ है। मैं कृतार्थ हुआ। किन्तु साथ ही मेरा दुर्भाग्य भी है कि इस समय मैं आपकी इच्छा पूर्ण करने में असमर्थ हूँ। यदि आपको भिक्षा प्राप्त करनी है तो हमारे परिवार के लोग द्रोणपुर में गोवळवास का समय व्यतीत कर रहे हैं। उनके वहाँ जाइये। आपको भिक्षा अवश्य ही मिलेगी। मैं तो स्वयं ही कई दिनों से निराहारी हूँ।

हे लोहट! मिथ्या भाषण मत करो! पीछे देखो, एक बछड़ी खड़ी है। इसका दूध दूहकर मुझे पिला दो। मैं अतिशीघ्र ही चला जाऊँगा। तुम्हारी तपस्या में विघ्न नहीं डालूँगा।

हे योगी महाराज! आप क्या कहते हैं? यह बछिया तो मैं यहाँ प्रथम बार ही देख रहा हूँ। यह भी आश्चर्य ही है तथा आप भी अचम्भा ही हैं। इस बिना ब्याही बछड़ी के दूध कहाँ से आयेगा? आप माँग भी विचित्र ही कर रहे हैं।

हे लोहट! आप उठिये! तथा यह मेरा कमण्डल लीजिये। इसका दूध निकालिये। मुझे पान कराइये। मेरी बात पर विश्वास कीजिये, तभी तुम्हारी यह तपस्या सफल होगी। योगी के वचनों पर विश्वास करके लोहटजी उठे। योगी का कमण्डल ग्रहण किया। बच्छी के पीठ पर हाथ फेरा और दुहने बैठ गये। तत्काल ही स्तनों में दूध उतर आया। दूध तो स्नेह से उतरता है। वह स्नेह प्रकृति से परमात्मा का हुआ। ईश्वर के आशीर्वाद से बच्छी के दूध उतर आया। कमण्डल भर गया, लाकर योगी को दिया और कहा- हे भगवन्! अब दुग्धपान कीजिये।

योगी ने लोहट से कहा-इस दूध को तुम पी लो। यह ईश्वरीय प्रसाद है। यह तुम्हारी तपस्या का फल है। इसको पान कर लोगे, तो तुम्हारी मनोकामना पूर्ण हो जायेगी। लोहटजी ने प्रेम से परमात्मा का प्रसाद पीने के लिए होठों पर लगाया था। प्रसाद का प्रेमरस हृदय में प्रवेश कर गया। उसी समय ही भगवान् वहाँ से अन्तर्ध्यान हो गये। आकाशवाणी ही सुनाई दी कि अब तुम तपस्या से निवृत्त हो जाओ। वापिस अपने घर चले जाओ। मैं तुम्हारे पुत्र रूप में नये वर्ष में आऊँगा।

जब तुम्हारे गाँव-वन में पुनः वर्षा होगी, हरियाली का साम्राज्य हो जायेगा, खेतों में नया अन्न-फलादि मिलने लग जायेगा, तब मैं आऊँगा। तुम उठो। घर जाओ। अपना कार्य करो।

लोहट एक दृष्टि से देखते रह गये। यह तो एक चमत्कार हुआ है। ईश्वर की जैसी इच्छा है। मेरे घर पर स्वयं भगवान् ही आयेंगे। क्या यही भगवान् जिन्होंने अभी-अभी दर्शन दिये थे। ये तो भगवा वस्त्रधारी योगी थे। अच्छा है। जो भी जैसे भी, आयेंगे तो अवश्य ही।

आगे से लोग मुझे निपूता कहकर तो नहीं पुकारेंगे। मेरा मुँह देखने से अकाल तो नहीं पड़ेगा। मैं अकाल पड़ने में निमित्त कारण बनूँ और संसार में जीवित रहूँ, यह कैसे हो सकता है? ऐसा विचार करते हुए लोहटजी उठ खड़े हुए और घर की तरफ चल पड़े। अपनी धर्मपत्नी को यह समाचार सुनाने की शीघ्रता हो रही है। अपने साथियों को भी तपस्या का वृतान्त और वरदान की बात बतानी है। इसीलिए अतिशीघ्रता से जा रहे हैं।

माता हांसा अपनी सखियों के बीच में बैठी विलाप कर रही है। हांसा कहने लगी-हे सजनी! मेरे दुःख की कथा तुम श्रवण करो। मैं अपनी बात किससे कहूँ? यह ब्रह्माजी ही, हम से तो टेढ़ा है। यदि एक ही पुत्र दे देते, तो क्या उनके कमी आ जाती? राजा सागर को तो सुना है, साठ हजार पुत्र दिये थे। मेरी कोख में एक पुत्र भी नहीं दिया। यदि मेरे पुत्र हो जाता वह चाहे साधु ही हो जाता, घर नहीं बसाता, तो कम से कम आज मेरी यह दशा नहीं होती। मेरे पतिदेव मरने के लिए अनशन पर बैठे हैं। उनके बिना यह देह कैसे रहेगी? पति तो प्राण होते हैं। वही नहीं हैं, तो फिर यह शरीर मेरा जीवित कैसे रहेगा? आज मुझे कई दिन हो गये रोते-रोते। नींद-भूखादि मुझे छोड़कर चले गये हैं। अब मेरा जीना भी क्यों हो रहा है, यह कुछ भी पता नहीं है?

सखियाँ कहने लगीं- हे देवी! आप चिन्ता न करें। आप तथा आपके पति बिना अन्न जल के भी अब तक जीवित हैं, तो आपको जिलाने वाला कोई और ही है। वह शक्तिदाता आपसे कुछ कार्य लेना चाहता है। अन्यथा तो आप दोनों के प्राण कभी के प्रयाण कर जाते। ईश्वर के हाथ लम्बे हैं। वह न जाने, कब क्या करेगा? कुछ पता नहीं है। अनहोनी को भी होनी कर दे। असंभव को भी संभव कर दे।

हे देवी! हमारा तो यह कहना है कि विकट परिस्थितियों में भी भगवान् को न भूलें। वह सभी का योग क्षेम वहन करने वाला है। सदा समय एकरस नहीं रहता। परिवर्तनशील है। हमें तो ऐसा ही लगता है कि सभी कुछ ठीक ही होगा। आप पुनः सामान्य जीवन जियेंगे। तुम्हारे पूज्यपति तपस्या करके अतिशीघ्र ही लौट आयेंगे। थोड़े दिनों की ही तो बात है, धैर्य धारण करो।

जब हांसा कह रही थी कि साधु ही पुत्र हमारे होते, तो मम पति प्राणन किम खोते। उसी समय वही योगी लोहटजी को शुभवचन कह करके तुरंत हांसा के सामने उपस्थित हो गया। आवाज लगायी- सत विष्णु की बाड़ी। हे देवी! तुम्हारा बगीचा हरा-भरा रहे। उत्तरोतर उन्न्ति को प्राप्त होवे। तुम्हारा वंश आगे बढ़े।

हांसा बोली-हे महाराज! आपके वचन सत्य हों। किन्तु सत्य होने में मुझे संदेह है, क्योंकि यही तो नहीं हो रहा है। जो हम चाहते हैं, वही होगा कैसे? आप भी हमें यही आशीर्वाद दे रहे हैं।

योगी बोले-हे माते! आप चिंता न करें। तुम्हारे अवश्य ही पुत्र होगा किन्तु होगा साधु ही। तुम्हारा अन्तिम वचन ही प्रमाण है। ऐसा कहते हुए भिक्षा प्राप्त करके वहाँ से ओझल हो गये। हांसा ने पीछे से देखा। किन्तु न तो आते हुए दिखाई दिये और न ही जाते हुए। हांसा देखती ही रह गयी। साधु ही हमारे पुत्र होगा, ऐसा क्यों कहा? ये योगी बाबा ही स्वयं पुत्र रूप में आयेंगे? कब आयेंगे, तब तक पता नहीं हम जिंदा रहे या न रहें।

विचार किया हांसा ने, यह कोई साधारण योगी तो नहीं है। क्या स्वयं शिव या विष्णु ही तो नहीं आये हैं। वे अवतारधारी विष्णु ही पुत्र रूप में आ सकते हैं। अन्य कोई संसारी जीव तो मेरे गर्भ से कैसे आ सकता है? क्योंकि शरीर तो अब वृद्ध हो गया है। गर्भ धारण करने की शक्ति भी तो नहीं है। क्या होगा? कैसे होगा? यह समाचार मैं अपने पति तक कैसे पहुँचाऊँ। उन्हें तपस्या से निवृत्त भी कैसे करूँ? उनकी तपस्या सफल हुई है। यह समाचार भी उन्हें कौन कहेगा?

हांसा अपने विचारों के उहापोह में डूबती इतराती हुई खुशी में मग्न थी कि लोहटजी घर पर आ गये। दोनो दम्पति प्रेम से मिले। लोहटजी ने अपनी तपस्या तथा पुत्र प्राप्ति के वरदान की बात बतलाई। हांसा ने कहा - हे पतिदेव! वही योगी मुझसे भी भिक्षा माँगने आया था। मैं भिक्षा देने लगी तब मेरी पुत्र प्राप्ति की इच्छा जानकर मुझे भी वरदान दिया है। अब तो भगवान् ही मालिक हैं। क्या होगा, वही जाने।

पीपासर में अच्छी वर्षा हुई है। धन-धान्य, तृणादिक से धरती आच्छादित हो गयी है। इन्द्र देवता प्रसन्न हो गये हैं। ऐसा समाचार उन गोवलवासी लोहट एवं अन्य साथियों ने सुना और तुरंत ही वापिस पीपासर की ओर प्रस्थान कर गये। वापिस अपनी मातृभूमि में गोपाल गो आदि पहुँच गये। गोवलवास का समय पूरा किया और वापिस अपने घर आ गये।

सभी लोग यथावत अपने-अपने कार्य में प्रवृत्त हो गये। लोहटजी का अपार धन्यवाद करने लगे। सभी ने कहा, हमारे ग्रामपति ठाकुर साहब बहुत ही अच्छे हैं। इनकी वजह से हमने अकाल का समय अच्छी तरह से व्यतीत किया है। ये तो साक्षात् देवता ही हैं। गोवलवास में हमारे साथ ही सुख-दुःख में रहे। हालांकि इनका तो वहीं ससुराल भी था। ये चाहते तो हमें अकेले छोड़कर, स्वयं दामाद बनकर रह सकते थे। किन्तु ये शरणागत की रक्षा करने के धर्म को अच्छी प्रकार से जानते हैं। इनके ससुराल वालों ने इनसे बारबार आग्रह किया, तो भी हमें छोड़कर नहीं गये।

अपने देश में अच्छी वर्षा होने में भी तो हमारे ठाकुर साहब की तपस्या का ही फल है। अबकी बार तो भगवान् हमारे पर कुछ ज्यादा ही प्रसन्न हैं। ऐसा लगता है कि भगवान् स्वयं ही इन घास, धान, पेड़ पौधों के रूप में प्रकट हो रहे हैं। कुछ लगता है कि क्या होगा? प्राचीन रूढ़ियों को तोड़कर असंभव भी संभव होने जा रहा है। सम्पूर्ण प्रकृति आनन्द-विभोर हो रही है। इस वर्ष भाइयो! प्रकृतिरूपी स्त्री का पति परमेश्वर से मिलन हो गया है। किन्तु पूर्व वर्षों में तो ऐसा नहीं था। प्रकृति अपने पुरुष चेतन के अभाव में उदासीन रहती थी। आप देखिये! जहाँ देखो, वहाँ प्रकृति पूर्णतया खिली हुई है। अपने यौवन पर पूर्णता को प्राप्त हो रही है।

हांसा कहने लगी-हे पतिदेव! मैं क्या कहूँ? कुछ कहा नहीं जाता। किन्तु कुछ कहे बिना रहा भी नहीं जाता। मेरी इस अवस्था को देखती हूँ, तो निराशा ही होती है। जब योगी के वचनों पर विश्वास करती हूँ, तो पुत्र होने की आशा जगती है। मेरे शरीर में कुछ गर्भ जैसा मालूम पड़ता है। लेकिन हिलता-डुलता सा तो मालूम नहीं पड़ता। यदि गर्भ में बच्चा हो तो भार होना चाहिये। किन्तु वह तो बिल्कुल ही निर्भार है उस अवस्था का बखान कैसे करें? जो कोई सुनेगा वही हँसी उड़ायेगा। वे जाने क्या कहेंगे? लोगों के लिए तो जितने मुँह, उतनी ही बातें होगी। लोहटजी कहने लगह्य हे देवी! चुप ही रहना ठीक है, समय व्यतीत हो जाने पर वृक्ष के फल फूल नहीं लगते। कहा भी है-

सम्बन्धी जन जो सुने, हंस ही कर ही श्चवाब।

वृद्ध भये तै वृक्ष के, फूलहू फल नहीं आव।।

वचन सुने अवधूत के, लगी पुत्र की आस।

सत्य जान मन हरष है, वृद्ध करि होय उदास।।