दूसरा अध्याय · कथा 9
गो चारण लीला
वील्होजी ने पूछा-हे गुरुदेव! आपने मुझ जैसे अज्ञानान्धकार में भटके हुए शिष्य को अपनाया एवं ज्ञानकी ज्योति से मेरे जीवन को प्रकाशमय एवं उज्ज्वल बना दिया। आपके द्वारा कथन की हुई बाल-लीला का रसास्वादन मैंने किया। एक-एक लीला बड़ी ही रहस्यमयी थी। अब आगे मैं जाम्भेश्वरजी की अन्य गोचारण लीला का अमृतपान करना चाहता हूँ।
हे गुरुदेव! आप तो स्वयं प्रत्यक्षदर्शी हो। आपने तो उनके जीवन की एक-एक अलौकिक घटना देखी है। उन लीलाओं से आपने आनन्द प्राप्त किया है। आपके जीवन को मैं देखता हूँ। अमृतपान किया हुआ, आपका जीवन मुझे आनन्दित कर देता है। जब आप वचन बोलते हैं, तो मेरे कर्ण तृप्त हो जाते हैं। मेरा मन समाधिस्थ हो जाता है। आपके मधुर शब्द सुनने से मुझे आनन्द मिलता है। इसलिए आगे की कथा आप मुझे विस्तारपूर्वक सुनाइये? मैं जिज्ञासा करूं या न करूँ, तो भी जो कथा कहने योग्य है, वह अवश्य ही कहिये?
आप तो स्वयं सूर्य,विवस्वान,मनु,वैशम्पायन,मैत्रेय,शुकदेव,सूतजी आदि वक्ताओं की भाँति तीनों कालों की बात जानने वाले हैं। गुरु जाम्भोजी के बारे में तो अन्यत्र कहीं कुछ भी सुनने को मुझे नहीं मिला। आपके मुख से श्रवण करना चाहता हूँ। कृपया मार्गदर्शन दीजिये। मैं आपकी शरण में हूँ।
नाथोजी उवाचः- वर्ष सात तक की बाल लीला पूर्ण हुई। अब तो लोहटजी के लाला बड़े हो गये। गाँव के बालकों ने कहा- चलो गायें चराने के लिए। अब तुम बड़े हो गये हो। हमारे साथ में ही चलो। हम लोग तुम्हें अकेला नहीं छोड़ेंगे, वैसे तो घने वन में भेड़िये आदि का भय रहता है, किन्तु हम साथ रहेंगे तो भयंकर हिंसक जीव जन्तुओं का सामना कर सकेंगे। अपने प्रिय पशुधन की रक्षा कर सकेंगे। ये पशु ही हमारे जीवन के आधार हैं। इन्हीं के पालण-पोषण से हमारी आजीविका चलती है। ये पशु भी बेचारे हमारे पर आधारित हैं। हम तो एक दूसरे के पूरक हैं।
लोहटजी बोले-हे बालको! आप लोग वन में गोचारण हेतु जाते हैं। मेरा बेटा भी अब सयाना हो गया है। कुछ लोग तो ऐसे ही गूंगा कहते हैं। उनको असलियत का कुछ पता नहीं है। आप लोग कल से साथ लेकर जाना। इन्हें गोचारण की शिक्षा देना है, क्योंकि अब तक तो यह गोचारण से पूर्णतया अनभिज्ञ है।
देखो बच्चो! आप लोगों के भरोसे पर मैं आपके साथ भेज रहा हूँ। कहीं वन में अकेला पड़ जाये, मार्ग भूल जाये, आप लोग इन्हें अकेला नहीं छोड़ना। सभी ग्वाल-बाल लोहटजी की आज्ञा को शिरोधार्य करके, माता हाँसा को प्रणाम करके, प्रातःकाल की शुभ वेला में, गोचारण हेतु वन में प्रस्थान करते हैं।
आगे-आगे गायें चल रही थी। पीछे-पीछे ग्वाल-बाल अपनी-अपनी लकुटिया कंधे पर रखे हुए च4 रहे थे। सभी ने दुपहरी के भोजन हेतु कुछ-कुछ खाद्य पदार्थ अपने-अपने पल्ले में बाँध रखे थे। जलपान के लिए जल की लोटड़ी ले रखी थी। क्योंकि भूख-प्यास की निवृत्ति भी परमावश्यक थी। बालकों ने देखा कि सभी के पास पीने का जल, भोजन हेतु भोज्य पदार्थ थे। ग्वाल बालों ने कहा- हे जाम्भाजी! आप अभी नये- नये गायें चराने हेतु आये हैं। दिन में भूख-प्यास सतायेगी, तब के लिए कुछ लेकर नहीं आये। अभी भी समय है, थोड़ी दूर ही तो आये हैं। वापिस जाकर अन्न जल ले आओ। देखो! हम तो आपको भूख लगने पर कुछ भी खाने को नहीं देंगे। फिर हमसे कुछ नहीं माँगना। जाम्भोजी ने कहा-मैं किसी से कुछ माँगता ही नहीं हूँ। किन्तु सभी को कुछ न कुछ देता हूँ। मुझे किसी प्रकार की भूख-प्यास भी नहीं सताती। मैं तो स्वयं से ही जीता हूँ- म्हापण को आधारूं।
हम तो सभी के आधार हैं, किन्तु मेरा कोई आधार नहीं है। यदि इस प्रकार से आधार आधेय की परम्परा चलने लगी, तो कहीं रुकने का नाम ही नहीं लेगी। इसलिए आप लोग निश्चिंत रहिये। चलिये आगे बढ़ते हैं। आज तो अच्छी-अच्छी जगह देखनी है। यह वन तो अति सौम्य है, इसे देखना चाहिए।
पीपासर से तीन कोश तक ग्वाल-बालों के साथ गायें चराते हुए चले गये। पीपासर से चलने के पश्चात् पुनः पीछे मुड़कर नहीं देखा। आगे ही बढ़ते गये। सर्वप्रथम अनेक टीबों से घिरे हुए भयंकर वन में सम्भराथल को देखा। जो सुमेरू (कैलाश) के समान सब से ऊँचा अपनी महानता को प्रदर्शित कर रहा था। उसे देखकर ग्वाल बाल सहित जम्भेश्वरजी अति प्रसन्न हुए। सभी ने ऊपर चढ़ने की इच्छा प्रगट की।
बालक बोले-अपनी गायें तो यहाँ सुमधुर हरी-हरी घास खा रही हैं। अपन लोग ऊपर चलते हैं। वहाँ से ह्य दूर-दूर तक वन तथा गाँव साफ दिखाई देता है। इस सृष्टि के सौन्दर्य को देखने में बड़ा ही आनन्द आयेगा। ऐसा कहते हुए सभी ग्वाल-बाल एकत्रित होकर सम्भराथल की सबसे ऊँची चोटी पर चढ़कर सौन्दर्य को निहारने लगे।
ग्वाल बालों ने पूछा-हे लला! इस समय तो तुम ही हम में से ज्ञानी मालूम पड़ते हो। यदि आयु में तो हम से छोटे हो तो भी क्या? ज्ञान तथा आयु का कोई विरोध नहीं है। हम तथा हमारे वृद्ध जन जो कार्य आजीवन नहीं कर सके, वे कार्य तुमने इस छोटी सी आयु में कर दिखाये। इसलिए हमें पूर्ण विश्वास है कि आप हमसे कुछ ज्यादा ही ज्ञाता (सर्वज्ञ) हो।
यह कैसा देश है? हमारा जन्म इस देश में ही क्यों हुआ है? ये रेतीले ऊँचे-ऊँचे पर्वत कैसे निर्मित हो गये? तथा यह स्थल तो सभी से ऊँचा है। इस धोरे की क्या विशेषता है? आप अन्तर्यामी हैं। सभी कुछ जानते हैं। तभी तो आज पहली बार आप हमें खींचकर ले आये हैं। आज तो हम सभी यहीं पर जी भर के खेलेंगे। गायें हमारी बड़ी ही सयानी हो गयी है। इनका (लोहट लाला का) कहना मानती हैं। फिर हमें किस बात की चिन्ता है?
जम्भेश्वर उवाचः - सुनो! यहाँ पर कभी समुद्र लहरें लेता था, जिस वजह से यहाँ ऊँचे-ऊँचे रेतीले धोरे निर्मित हो गये। जब समुद्र सूख गया था तब यहाँ पर नदियों ने अपना स्थान बनाया। पवित्र सरस्वती नदी यहीं से होकर बहती थी। बहता हुआ जल कहीं गए, तो कही ऊँची पाल बना देता है।
ये तो हजारों वर्ष पूर्व हुआ है। तभी से ये रेत के टीबे निर्मित हुए हैं। इनमें सभी से ऊँचा यह सम्भराथल तो बहुत ही पवित्र भगवान् विष्णु की पुरी है। इसे इन्द्रपुरी भी कहा गया है। यह रहस्य मैं आपको बतला रहा हूँ। इसका जैसा नाम है, तैसा गुण भी है।
सं-भर-थल इन तीनों शब्दों के योग से सम्भराथल शब्द बना है। सं का अर्थ है कि सम्यक् प्रकारेण यानि अच्छी प्रकार से। भर का अर्थ है कि भर-पोषण करने वाले भगवान् विष्णु। थल का अर्थ है कि स्थल, स्थान विशेष जहाँ पर अच्छी प्रकार से भरण पोषण करने वाले भगवान् विष्णु विराजमान होवें, वही यह स्थल सम्भराथल है।
हे बच्चों! यह बड़ा ही पवित्र धाम है, इसके नीचे भगवान विष्णु का धाम विश्वंभर नगरी है। इस कलयुग में यह बात लुप्त हो गयी थी। मैं तुम्हें ठीक-ठीक बता रहा हूँ। मैं तो अब यहीं रहूँगा। आप लोग पीपासर जा सकते हो। नित्यप्रति गायें लेकर यहीं आ जाया करो। मैं अपने आप स्वयं गायों की रखवाली करूँगा। गायें चराऊँगा। ऐसा पूज्य माता-पिता से भी कह देना।
बालकों ने पूछा-हे जम्भेश्वर! आप तो इस लुप्त-गुप्त बात का रहस्य खोल रहे हो। किन्तु यह अवश्य ही बतलाइये कि आपने जैसा कहा कि यहाँ कभी समुद्र था, वह कैसे सूख गया? इस समय यह देश इस गति को प्राप्त कैसे हो गया?
जाम्भो उवाचः-हे ग्वालो! मैं तुम्हें अपनी निजि बातें बतलाता हूँ। जब रावण को मारने के लिए मैं ही राम के रूप में समुद्र किनारे वानर सेना सहित पहुँचा था, उस समय मुझे लंका में जाना, रावण को मारना, सीता को वापिस लाना था। उधर चौदह वर्षों का वनवास भी पूरा हो रहा था।
मैंने समुद्र से तीन दिन-रात प्रार्थना की थी। किन्तु उस सठ समुद्र ने मेरी एक भी नहीं सुनी। मुझे लंका में जाने का मार्ग नहीं दे रहा था। प्रथम तो मैं साम नीति से समझा रहा था। इसे अपने कार्य की सिद्धि के लिए निवेदन कर रहा था। किन्तु दुष्ट नीच अपनी नीचता को त्यागता नहीं है। सामने वाले शांत सत्व पुरुष की वह कमजोरी समझ लेता है। समुद्र ने ऐसा ही किया। वह तीन दिनों तक कुछ भी समाधान नहीं दे सका। शायद वह मेरी सहनशीलता, सौम्य स्वभाव को तोल करके देख रहा था। जब साम नीति से कार्य नहीं हुआ, मुझे समुद्र की तरफ से कुछ भी जवाब नहीं मिला, तो मैंने दण्ड नीति का सहारा लिया और धनुष बाण चढ़ा लिया।
हे बालको! वह बाण कोई सामान्य नहीं था। वह तो अग्निबाण ही था, जो सम्पूर्ण जल को सुखा सकता था। जल में रहने वाले जीव-जन्तु भी मर जाते। बड़ा अनोखा विप्लव हो जाता। किन्तु बाण चलाने से पूर्व ही वह समुद्र मानव का रूप धारण करके हाथ जोड़कर सामने उपस्थित हो गया। देरी के लिए क्षमायाचना करने लगा।
समुद्र ने प्रार्थना की कि आप ऐसा न करें। अन्य सभी जलीय जन्तु जलकर भस्म हो जायेंगे। आपसे बड़ा भारी अपराध हो जायेगा। मैं स्वयं ही अपने घर में पलीता लगाने वाला बन जाऊँगा। इसलिये हे नाथ! आप ऐसा न करें।
मैं आपको एक उपाय बतला देता हूँ। आपकी ही सेना में नल व नील दो वानर वृहस्पति के पुत्र बड़े भारी शिल्पी हैं। वे पुल बना सकते हैं। वे जो भी जल में डालेंगे, पत्थर, लकड़ी आदि वही तैर जायेंगे, डूबेंगे नहीं। मैं उनके द्वारा डाली हुई वस्तु को डुबो नहीं सकता। हे नाथ! यह सभी कुछ आपकी ही कृपा है। आपके पवित्र नाम के प्रताप से क्या नहीं हो सकता?
मैंने कहा-मेरी प्रतिज्ञा भंग नहीं हो सकती। राम एक बार ही बोलता है, जो कुछ भी कहता है, वह पूरा करता है। रघुकुल की यही रीति है। हमारे कुल में जो भी पैदा होता है, उनके प्राण भले ही चले जायें किन्तु वचन भंग नहीं होते। मेरा चढ़ा हुआ बाण अब बिना चले नीचे नहीं उतरेगा। अब तुम ही बताओ कि यह बाण कहाँ छोडूँ?
समुद्र बोला- इस बाण को आप उत्तर की तरफ चला दीजिये। इधर ही मेरे शत्रु,तथा आपके भी शत्रु नियम भंग करने वाले राक्षस रहते हैं, जो अन्याय करके उत्तर के समुद्र में छिप जाते हैं। आपका अग्नि बाण जब चलेगा तो वहां जल ही सूख जायेगा तो वे राक्षस लोग भी आपके कोप बाण में जलकर भस्म हो जायेंगे। न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी।
हे ग्वालो! उस विनीत भाव से खड़े हुए समुद्र की बात को सुनकर मैंने वह अग्निबाण उत्तर की तरफ चला दिया। दक्षिण दिशा रामेश्वर में स्थित होकर चलाया हुआ अग्निबाण यहीं इस देश की भूमि में गिर पड़ा था, इसीलिए समुद्र का जल सूख गया था। यहाँ की यह भूमि अग्निबाण गिरने से पवित्र हो गयी थी, क्योंकि अग्निबाण तो सभी कुछ जला डालता है। इस धरती के गुण-अवगुण सभी कुछ जल चुके थे। इसमें रहने वाले पापीजन भी जल गये थे। धरती अपने स्वरूप को प्राप्त होकर शुद्ध (निर्मला) हो गयी थी। पवित्र करने के लिए अशुभ को जलाना ही पड़ता है। यह प्राचीन देश द्रुमकुल्य नाम से प्रसिद्ध था। वज्र और अशनि के समान तेजस्वी बाण जिस स्थान में गिरा था, वह यही स्थान है। जहाँ ऊँडे गहरे जल वाले देश में हम बैठे हैं। इस देश का जल भी गहराई तक सूख गया है। इसलिए जलाभाव वाला यह देश मरुभूमि के नाम से प्रसिद्ध हुआ। समुद्र की बालुका मिट्टी अब भी देखो, इन टीबों के रूप में जहाँ कहीं भी यहाँ दिखाई दे रही है।
वील्होजी ने पूछा- हे गुरुदेव! यह कार्य जाम्भोजी ने राम रूप धारण करके किया। यह कार्य तो ठीक नहीं हुआ। क्योंकि इस भूमि को दण्डित किया। इसमें भूमि का क्या दोष था? हमारा भी जन्म इसभूमि में हुआ है, पता नहीं क्यों? यह सभी कुछ अच्छाई के लिए हुआ है या बुराई के लिए?
नाथोजी उवाचः- हे शिष्य! भगवान ने केवल इस भूमि को दण्डित ही नहीं किया है, इसके साथ ही साथ वरदान भी दिया है। वह तुम जानो। तुम्हारा संशय निवृत्त हो जायेगा। पहला वरदान यह दिया कि यह मरुभूमि पशुओं के लिए हितकारी होगी। दूसरा-यहाँ रोग कम होंगे। तीसरा-यह भूमि फल-फूल और रसों से सम्पन्न होगी। चौथा-यहाँ घी आदि चिकने पदार्थ अधिक सुलभ होंगे। दूध की बहुतायत होगी। पाँचवां- यहाँ सुगन्ध छायी रहेगी। अनेक प्रकार की ओषधियाँ उत्पन्न होगी। इस प्रकार से भगवान् श्रीराम के वरदान से यह मरुभूमि प्रदेश इस तरह के बहुसंख्यक गुणों से सम्पन्न होकर सबके लिए मंगलकारी हो गया।
भगवान् कुछ हरण करते हैं, तो उसके बदले में कुछ वरदान भी तो मंगलकारी देते ही हैं, भगवान की कृपा दृष्टि कभी खाली नहीं जाती, हम तो अज्ञानी जीव हैं, बहुत ही छोटे से स्वार्थ के दायरे में जीते हैं। हमारी दृष्टि तो अल्पज्ञ हैं।
अध्यापक बालक को दण्ड देता है तो उसकी भलाई के लिए ही देता हैं, किन्तु बालक इस बात को समझ नहीं पाता है। दूरगामी परिणाम अच्छे होते हैं, किन्तु प्रारम्भ में अवश्य ही दुखदायी होते हैं। हम तो बालक की भांति ही हैं। थोड़े से दुःख में भी रो पड़ते हैं। थोड़े से सुख में भी फूल जाते हैं। जीवन की बहुत गहराइयाँ हैं। उनसे परिचित होना आवश्यक है।
भगवान् की गोचारण लीला का कथन करते हुए, नाथोजी ने इस प्रकार से कहा-नित्यप्रति गऊवों आदि पशुओं को चराने हेतु ग्वाल-बालों के साथ जंगल में सम्भराथल तक जाया करते थे। सांय काल में सभी वापिस लौट आया करते थे। लोहट एवं हांसा अतिप्रसन्न हुआ करते थे। अपने जन्म को सफल मानते और देवी देवताओं को मनाते। अनेकों प्रकार के शुभ आशीर्वाद अपने पुत्र के लिए माँगते थे। यहकार्य नितप्रति का ही था।
एक दिन की बात कुछ सदा से भिन्न ही हुई थी। अन्य बालक तो अपने-अपने पशुधन गाय, भौस, बकरियाँ आदि लेकर साँझ के समय में वापिस पीपासर आ गये थे। किन्तु लोहट का लाला नित्यप्रति की भाँति आज लौटकर नहीं आया था। माता-पिता को चिंता सताने लगी थी, क्या बात हुई? आज आया क्यों नहीं? गायें तो लौटकर अन्य गायों के साथ आ गयी हैं।
हांसा ने कहा हे पतिदेव! आप जाकर अन्य घरों के बालकों को देखकर आओ? कहीं वहीं पर तो खेल में ही न लग गया हो? शीघ्र ही मेरे लाला को मेरी आँखों के सामने लाइये। तभी मुझे चैन पड़ेगा।
लोहटजी ने जाकर ग्वाल बालों से पूछा-क्या बात है? जम्भेश्वर नहीं आया? ग्वाल कहने लगे-हे राजन्! सुनो! तुम्हारा बेटा तो बावला है। हमें आप झूठा ओलाणा मत देना। हम सभी इकट्ठे ही पशु चरा रहे थे। तुम्हारे बालक ने ही हमें सम्भराथल दिखाया था। हम लोग आज उसी पर ही गायें चराते हुए बैठे थे। वहाँ की शोभा तो ठाकुर साहब! बहुत ही निराली है। हम तो घर गाँव माता-पिता सभी कुछ भूल गये थे। वहाँ पर बैठै तो बैठे ही रह गये। न जाने कब संध्या वेला हो गयी, कुछ पता ही नहीं चला।
हमारी गायें जब अपने-अपने बछड़ों को याद करके घर को चली, तभी हम भी सचेत होकर उनके पीछे-पीछे चले आये। अन्यथा तो वहीं रात हो जाती। वास्तव में वहाँ कुछ जादू ही ऐसा है कि समाधि सी लग जाती है-संसार को तो भूल ही जाते हैं।
लोहटजी ने कहा-यह बात तो बिल्कुल सच्ची है। इस बात को मैं अच्छी तरह से जानता हूँ। मेरे साथ भी ऐसा हुआ था। इस भय के मारे तो हम गाँव वाले वहाँ जाते ही नहीं है। कहीं गये तो मोह-माया को भूलकर सदा के लिए वहीं के होकर रह जायेंगे। अब तो हमें गृहस्थी का ख्याल रखना है।
हे बालको! यह तो बतलाओ! कि आज अभी तक मुनि नहीं आये! क्या! यह वहीं तो कहीं न रह गया हो! मैंने तो प्रतीक्षा कर ली। सभी बालकों से भी पूछा है। कहीं कुछ अब तक पता नहीं चला है। यदि तुम्हें पता है तो बतलाओ? हांसा बहुत ही व्याकुल हो रही है। उसका दिल तो बहुत ही नाजुक है। वह वियोग सहन करने में असमर्थ है। मुझ से भी उसकी हालत देखी नहीं जाती।
ग्वाल-बाल कहने लगे-ठाकुर साहब! हम सभी एकत्रित होकर सम्भराथल पर खेल रहे थे। हमारी गायें वहीं पर ही हरी-हरी घास चर रही थी। दिनभर हम अपने आप में आनन्दित थे। जब शाम का समय होने लगा, तो हम तो वहाँ से चले आये, चलते समय हमने कहा-हे जम्भेश्वर! आप भी चलो! घर पर तुम्हारी प्रतीक्षा हो रही है। दिन छिपने को जा रहा है। रात्रि हो जायेगी। अंधकार छा जायेगा। यहाँ जंगली जीव आ जायेंगे। कहीं हमें खा ही न जायें।
हे राजन्! हम आपसे सत्य कहते हैं कि आपके लाडले ने तो वहीं पर आसन लगा लिया। आँखें मूंद ली। देवली (मूर्ति) की तरह हो कर बैठ गया। न तो वह हिलता था, और न ही वह देखता था और न ही कुछ बोलता था। हमने पुनः आवाज लगायी कि चलो जम्भेश्वर! गाँव चलते हैं। किन्तु उन्होंने तो एक शब्द भी नहीं बोला। केवल इशारा किया कि आप लोग चले जाओ। हम तो यहीं रहेंगे। मेरा गाँव में कुछ भी कार्य नहीं है।
दूसरे दिन प्रातःकाल लोहटजी बालकों के पास पहुँचे और कहने लगे-हे बालको! अब मैं तो बूढ़ा हो गया हूँ। गायें चराने में असमर्थ हूँ। मेरी व्यथा तो सुनो! आज तो तुम ले जाओ मेरी गायों को, कल मैं किसी ओर को सम्भला दूँगा।
बालकों ने सहर्ष स्वीकार किया और गायें लेकर सम्भराथल पर जहाँ जाम्भोजी विराजमान थे वहीं पर पहुँच गये। वहीं पर प्रभु का धन प्रभु को ही सौंपते हुए कहा-तुम तो यहीं पर रह गये। रात्रि में पीपासर नहीं गये। तुम्हारे माता-पिता बहुत ही दुःखी हो गये हैं। तुम्हारे बूढ़े पिता ने कहा है कि अब मेरी गउएँ कौन चरायेगा? मैं तो पुत्रवान होते हुए भी अऊता ही रह गया हूँ। पुत्र कुपुत्र हो जाये तो वंश एवं धन का नाश कर देता है।
देखो! दूसरों के पुत्र तो सचेत हैं। पशु चराते हैं। धन संग्रह करते हैं। किन्तु मेरा पुत्र तो वन में रहने लगा है। मैं कैसे विश्वास करूँ कि यह बेटा वंश को आगे बढ़ायेगा। धन संग्रह करेगा।
जाम्भेश्वरजी ने कहा-बालको! आप आज जब साँयकाल में वापिस घर जाओ तब मेरे पूज्या माता एवं पिताजी से कह देना कि आप गऊवें चराने की चिन्ता बिल्कुल ही न करें। मैं स्वयं ही सभी प्राणियों को चराने के लिए ही यहाँ पर आया हूँ। हे बालको! आप लोग भी निश्चिन्त होकर खेल खेलें। धन चराने संग्रह करने की मेरी बारी है। मैं अपनी बारी निभाना जानता हूँ। मेरी आज्ञा से ही ये पशु वन में घास चरते हैं। इन्हें कोई भी वन्य हिंसक जीव नहीं सतायेगा। कल प्रातःकाल भी इसी प्रकार से गायों को लेकर यहाँ आ जाना।
बालकों ने लोहटजी को सभी बातें बतलायी तथा विश्वास दिलाया कि हम तो केवल निमित्त मात्र हैं। असली तो गोपालक हमारे गोपाल शिरोमणि जाम्भोजी ही हैं।
उनकी कृपा से हमारी तो सभी गायें चरती है। पहले से कहीं अधिक दूध देती हैं। बड़ी प्रसन्न रहती हैं। इन्हें कोई भेड़िया आदि वन्य पशु भी नहीं सताता। अब तो जँगल में ही मँगल हो रहा है। आप भी एक दिन हमारे साथ चलकर देखें। हमें तो चिन्ता से निवृत्त कर दिया है। किन्तु ठाकुरजी! आप बिना मतलब ही चिंतित हो रहे हैं।
ग्वाल-बाल तो गऊएँ लेकर वन में चल गये। बालकों की रस एवं रहस्य भरी बातें लोहटजी के समझ में आती थी। जब ज्ञान की बातें सुनते, तब तक तो मोह-माया का पर्दा हट जाता था। किन्तु जब संसार के कार्य व्यवहार में प्रवृत्त होते तो पुनः मोह माया का परदा पड़ जाता। थोड़ी देर की बिजली की चमक की तरह सुख-दुःख द्वन्द्व आते-जाते रहते हैं।
लोहटजी अपने भाई-बन्धुओं के पास बैठते। वार्तालाप करते। सभी लोग अपनी-अपनी गायों, बकरियों, जमीन-जायदाद,मकान-घर,अपने पुत्र -पुत्रियों, बन्धु-बान्धवों की चर्चा करते। एक दूसरे से बढ़-चढ़कर बड़ाई करते। अपने अंहकार को पुष्ट करते। लोहटजी उनकी वार्ता सुनते और अपनी स्थिति देखते, तो चुप हो जाते। उनकी बढ़ी-चढ़ी बातें सुनकर उदास हो जाते। अपनी स्थिति का स्मरण करके प्राचीन यादगार ताजा हो जाती।
जंगल में योगी का दर्शन, पुत्र प्राप्ति का वरदान आदि स्मरण करके भाव विभोर हो जाते। आँखों में आँसुओं की धारा बह चलती। अन्य बन्धुओं ने देखा कि हमारी वार्ता सुनकर तो लोहट को रोना आता है। ये सांसारिक बातें बंद करो। अन्य कोई ज्ञान की बातें करो।
लोहटजी से पूछा- आप इतने दिलगीर क्यों हो जाते हो? तुम्हारे पर तो प्रभु की अहैतु की कृपा बरस रही है। देखो न! इस बुढ़ापे में तुम्हें पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। फिर क्यों न भगवान् की कृपा का अनुभव करते?
लोहटजी कहने लगे-बन्धुओ! मेरी भी व्यथा-कथा सुनो! मेरे एक ही पुत्र हुआ है, वह भी वृद्धावस्था में, निश्चित ही यह तो कोई ईश्वर की महान कृपा का ही फल है, किन्तु यह बालक तो कुछ खाता-पीता नहीं है। इसका उपाय तो मैंने करके देख लिया। कुछ भी फल नहीं मिला। इस बालक को तुम सभी देख ही रहे हो। बिना कुछ खाये-पिए अब तक इतना बड़ा हो गया है। दिनों-दिन वृद्धि को प्राप्त हो रहा है।
बिना अन्न्न जल के तो हम जी नहीं सकते। यह तो दिन दूना, रात चौगुना बढ़ता जाता है। सूर्य सदृश तेज उत्तरोत्तर बढ़ता ही जाता है। मेरी समझ में तो यह आता है कि इसका शरीर तेजस्वी है। यानी तेज प्रधान है। यह तो तेज को ही पी रहा है। इसलिए तो शरीर में सूर्य सदृश क्रान्ति हो रही है। यह तो साक्षात् जलती हुई ज्योति ही है। पता नहीं कैसे यह ज्योति को पी जाता है। इसलिए तो अन्न-जल की आवश्यकता ही नहीं है।
हे भाइयों! मुझे यह बतलाओ कि इस सन्तान ने मुझे क्या सुख दिया? अपने पूर्वजों द्वारा एकत्रित की हुई सम्पत्ति को आगे बढ़ाना चाहिये। किन्तु ये तो बिल्कुल ही गंवाने के लिए तत्पर हैं। पहले तो वापिस पीपासर आ जाया करता था। किन्तु अब तो वन में ही रहने लग गया है। बालकों से यह भी पता चला है कि गउएँ चराने की बात तो स्वीकार कर ली है। किन्तु घर, खेती आदि की परवाह नहीं है। ऐसी दशा में मैं क्या कर सकता हूँ। कैसे धैर्य धारण करूं? मैं यह कैसे मानूं कि मेरे कुल का दीपक सदा-सदा के लिए उन्नतिशील रहेगा। दीपक से दीपक प्रज्ज्वलित होता रहेगा।
सभी भाई बन्धु समझाने लगे-हे भाई साहब! आप तो पुत्र के मोह में मोहित हो रहे हो। आपको तो कुछ भी विवेक नहीं रहा। इसीलिए तो आप ऐसी बात बोलते हो। यह पुत्र तुम्हारा कोई साधारण बालक नहीं है। हमने तो प्रत्यक्ष लीलाएँ (आश्चर्यजनक कार्य) इनके देखे हैं, हम कैसे भूल सकते हैं? घूंटी ग्रहण न कर ना, कान न बिंधवाना, जनेऊ संस्कार न करवाना, तेरह जीव मारने वाले पुरोहित को फटकारना, पुरोहित को शब्द सुनाना। जल से दीपक प्रज्ज्वलित कर देना, कच्चे घड़े में जल ठहराना आदि ये कार्य क्या साधारण बालक द्वारा संभव हैं? या तो यह कोई पूर्णयोगी है, या स्वयं कृष्ण कन्हैया ही तुम्हारे पर कृपा करने हेतु जन्म लेकर आया है। हे भाई! जब से तुम्हारे घर तथा हमारी पीपासर की भूमि पर इस बालक का पर्दापण हुआ है। तभी से हम लोग धन्य-धन्य हो गये हैं। यहाँ तक कि जड़ योनि, वृक्ष, लता, फूलादि भी धन्य हो गये हैं। कहाँ तक कहें? वन्य हिंसक जीव भी वैरभाव भूल गये हैं। जब से जाम्भोजी पीपासर में आये हैं, तभी से अब तक किसी भी हिंसक वन्यजीव ने हमारा कोई भी नुकसान नहीं किया है। सिंह-बकरी एक घाट पर पानी पीते हैं।
हे लोहट! तुम तो अपने को बड़ा ही सौभाग्यशाली समझो कि तुम्हारे आँगन में स्वयं द्वारिकानाथ आये हैं। यह तो तुम्हारे पूर्वजन्म की तपस्या का ही फल है। संतान की प्राप्ति या अप्राप्ति, सुपात्र या कुपात्र संतान की प्राप्ति, यह सभी पूर्व जन्म के कर्मों का ही फल है। कुछ लेना या देना होता है, तभी संतान की प्राप्ति होती है। यदि आपसे कुछ कर्जा माँगता है, तो आपसे सेवा धन लेकर जायेगा। आपका हिसाब-किताब पूरा करेगा और यदि आप अपनी संतान से पूर्व जन्म का दिया हुआ ऋण वापिस लेना है, तो वह आपकी सेवा करके चला जायेगा। ये सभी अपने ही कर्मों का फल है। ऐसा समझ करके हे लोहट! धैर्य धारण करो। आँखों में यदि आँसू आते हैं, तो पोंछ लो।
मरुधर के निवासियों के लिए तो गोधन ही सर्वश्रेष्ठ धन था। गो माता है, जन्म दाता माता दूध पिलाती है। किन्तु अधिक से अधिक दो चार वर्ष तक ही। किन्तु गो माता तो हमें आजन्म दूध, दही, घी आदि पिलाती है। हमारे जीवन का प्रमुख आधार तो गउएँ ही है। अन्य भी पशु उपयोगी हैं, किन्तु गऊ को माँ का दर्जा मिला हुआ है। गोचारण से जो हमें शुद्ध संस्कार मिलेंगे वे माता के होंगे। अन्य पशु भैंस, ऊँट, बकरी आदि से जो भी हमें मिलेगा, वह पशुता की ओर ले जाने वाला ही होगा।
अब तो ग्रामीणजनों एवं माता-पिता, प्रियजनों को प्रसन्न करने के लिए नित्यप्रति गऊएँ चराते हैं। पूर्व अवतार श्रीकृष्ण के समय में भी तो गोचारण ही किया था। उसी परम्परा को आगे बढ़ाया है। भारतवासियों के लिए प्रेरणा के स्त्रोत बने हैं। वन में सभी निर्भय थे। किसी प्रकार का वन्य जीवों का उपद्रव नहीं था। पशुधन दिन दुगुना रात चौगुना वृद्धि को प्राप्त हो रहा था।
हे वील्हा! एक दिन ग्वाल-बालों के साथ सम्भराथल वन में गऊएँ आदि पशुधन चरा रहे थे। सभी ग्वाल-बाल उस समय सम्भराथल के सर्वोच्च शिखर पर एकत्रित हुए और कहने लगे-हम सभी मिल कर लुकमीचण का खेल खेलते हैं। एक गोपाल आँख बँद करके बैठेगा। दूसरे सभी छुपेंगे। यदि वह खोजने वाला जो आँख बँद करके बैठा था, वह अन्यों को, जो छुपे हुए हैं, उनको खोज लेगा तो वह जीत जायेगा। जिसको खोज लिया, पकड़ लिया, वही फिर अन्यों को खोजेगा। इसी प्रकार से यह खेल चलता जायेगा।
सर्वप्रथम सभी बालक जाम्भोजी के पास आये और कहने लगे-आप भी आज हमारे साथ खेल खेलने के लिए सम्मिलित हो जाइये। यह बाल्यावस्था तो खेल खेलने के लिए ही तो मिली है। यदि आप स्वयं विष्णु अवतार हैं, तो भी सभी अवतारों ने अपने-अपने तरीके से खेल खेले ही हैं। सभी बालकों ने कहा- आज तो हम आपके साथ ही खेलेंगे। क्योंकि अब हम हमारी गायें आदि पशुधन तो आपकी कृपा से निश्चित हैं। आपने स्वयं ही चराने की जिम्मेवारी ले ली है। आज तो बारी भी आपकी है। जब से आप हमारे संरक्षक हुए हैं, तब से ही हम खेल ही खेलते हैं। अन्य तो हमारा कुछ कार्य नहीं है, किन्तु आज तो आप ही हमारे साथ खेलें, तो हमें आनन्द मिलेगा।
आप मुझे किस प्रकार का खेल खिलाओगे, वैसे तो सम्पूर्ण सृष्टि ही मेरा खेल है। इसे हम तो सत्य स्वीकार नहीं करते। मात्र ईश्वर की क्रीड़ा के रूप में ही मानते हैं। यदि आज कुछ विशेष खेल खेलना है, तो आप मुझे आदेश दें कि मुझे क्या करना होगा?
बालक कहने लगे-कि आज हम आप मिलकर हमारा लोकप्रसिद्ध खेल लुकमीचण ही खेलेंगे। इससे हम आपको सर्वप्रथम आँखे बंद करके बिठायेंगे, हम सभी अदृश्य स्थानों में जाकर छुपेंगे। जब हम आपको आवाज लगायेंगे, तभी आप आकर हमें ढूँढ़ लेना। हमने सुना है कि आप अन्तर्यामी हैं। किन्तु अन्तर की तो बात ही क्या? आप हमें बाहर भी नहीं ढ़ूंढ़ सकते। हम लोग छिपने में बड़े ही कुशल हैं। उतने आप ढूंढ़ने में नहीं है।
जाम्भोजी ने कहा- ऐसा ही होगा। जो आप लोगों की इच्छा है वहीं मैं आज करूँगा। आप लोग छिपने के लिए जाइये! मैं यहाँ आँखे बन्द किये बैठा हूँ। मैं आप लोगों को छिपते हुए नहीं देखूँगा। फिर भी ध्यान रखना, मैं ढूँढ़ ही लूँगा। तुम्हें मालूम होना चाहिये कि मैं आप लोगों को खोजने के लिए ही आया हूँ? तुम लोग इस देश में आकर छिप गये हो। मुझे तो पता था कि प्रह्लाद भक्त के बिछड़े हुए जीव किस देश में छिपे हुए हैं? इस समय तो तुम खेल कर रहे हो किन्तु मैं तुम्हें वास्तविकता की बात बतला रहा हूँ।
जाम्भोजी ने अपने दोनों हाथ आँखों पर रखकर आँखें बन्द कर ली। वृत्ति अन्तर हो गयी। बाह्य संसार से निवृत्त हो गये। बालक जहाँ भी छिपने के लिए जाते, वहीं पर जाम्भोजी आँखे बन्द किये हुए बैठे दिखाई दिये। अनेक पेड़, फोग, कंकेहड़ी, कुमठा आदि वृक्षों के पीछे छिपने की जगह ढूँढ़ने लगे। जहाँ कहीं भी जाते, वहीं पर ही आँख बन्द किये हुए बैठे दिखाई दिये।
भगवान् तो कण-कण में व्यापक हैं। उनकी विद्यमानता कभी अभाव को प्राप्त नहीं होती। बालकों को बतलाया कि आप लोग ईश्वर को किसी एक शरीरधारी या मन्दिर में ही न देखो। जहाँ पर भी देखो, वहीं पर उपस्थित हैं। आप छिपकर कोई पापकर्म करने की कोशिश मत करना। तुम छुप ही नहीं सकते। वह तो तुम्हारी आत्मा रूप से तुम्हारे भीतर ही विराजमान है। तुम कैसे, किससे छिप सकते हो? परेशान होकर सभी बालक एकत्रित हो गये, और आपस में कहने लगे-
यह जाम्भोजी तो रूँगट खेलता है। हम लोग जहाँ पर भी लुकने जाते हैं, वहीं पर जाकर पहले ही बैठ जाता है। अब हम लोग इनके साथ नहीं खेलेंगे। यह भी कोई खेल हुआ कि हमारे छिपने के स्थानों पर हमसे पहले ही जाकर आँखे बन्द किये हुए बैठा है। चलो इनके पास ही चलते हैं। उनसे यह रूंगट खेल खेलने की बात कहते हैं। हमारी बात अवश्य ही स्वीकार करेगा। ऐसा कहते हुए सभी बालक जाम्भोजी के पास पँहुचे और कहने लगे-हे जम्भेश्वर!
आप हम से रूँगट न खेलें। यदि आपको खेलना ही हो तो अबकी बार आप छिप जाओ, हम सभी मिलकर आपको अभी तुरंत ही ढूंढ़ लेते हैं। तभी आपकी रूँगट का पता चलेगा। हम लोग यहाँ के चप्पे- चप्पे से परिचित हैं। कहीं भी आपको छोड़ेंगे नहीं।
जाम्भोजी बोले- तब तो ऐसा ही हो? मैं छिप जाता हूँ। आप लोग सभी मिलकर या एक एक अलग अलग रहकर के मुझे ढूँढ़ लेना। अब नियमानुसार पहले अपनी अपनी आँखे बन्द करो? सभी अपनी- अपनी आँखें बन्द करके बैठ गये। उसी समय जाम्भोजी वहीं पर छिप गये। किसी ने कहीं आते जाते नहीं देखा। बालकों ने आँखें खोलकर सम्पूर्ण जँगल ढूँढ़ लिया किन्तु कहीं पर भी नहीं मिले। साँझ का समय हो गया। बालक अपनी-अपनी गायों को लेकर वापिस पीपासर चले आये, किन्तु जाम्भोजी का कहीं कुछ पता नहीं चला।
ग्वाल-बालों ने लोहटजी को जाकर समाचार सुनाया-हे राजन्! आज हम सभी ग्वाल-बाल आपके लाला के साथ मिलकर के अंधलघेटा खेल खेल रहे थे। पहले तो हमने उनसे आँखें बन्द करके बैठने को कहा, किन्तु हम तो जहाँ पर ही जाते, वहीं पर ही आपका लाल हमारा मित्र जाम्भोजी बैठे हुए दिखाई देते थे। जब हमने कहा कि तुम छिपो, हम सभी मिल करके खोजेंगे। तब तो वह तो ऐसा छिप गया कि कहीं उसका पता नहीं चला। न जाने कहाँ गया? इस धरती पर तो कहीं दिखाई नहीं दिया। हम तो सम्भराथल जंगल से सदा ही परिचित हैं। ऐसी कोई जगह नहीं है, जिसे हम नहीं जानते हो? जहाँ पर हमने ढूंढ़ा नहीं हो। आप तो ग्रामपति ठाकुर हो। हमने आपका बच्चा खो दिया है। आप हमें क्षमा करें।
लोहटजी ने कहा- हे बालको! आप लोग निर्दोष हो। मैं अपने बेटे से अच्छी तरह से परिचित हूँ। उसका कुछ भी नहीं बिगड़ेगा। किन्तु मैं पिता हूँ। यह मेरा ओरस है। बिना खोजे मुझे शांति कैसे होगी? अब तो आप लोग अपने-अपने घर जाओ। प्रातःकाल मैं और अन्य ग्रामवासी तुम्हारे साथ ही चलेंगे। जहाँ पर भी छिपा था, वह जगह हमें बताना। हम लोग खोजने की कोशिश करेंगे।
दूसरे दिन प्रातःकाल ग्वाल-बालों को आगे करके ढूँढ़ने के लिए वन में चले। बालकों ने वह जगह बतलाई जहाँ से अन्तिम दर्शन हुए थे। उसके बाद कहीं दिखाई नहीं दिये थे। पैरों के निशान देखे, किन्तु कहीं पर भी खोज नहीं मिला, शाम को हार कर के वापिस घर लौट आये।
गाँव के लोग लोहट-हाँसा को धैर्य बंधाते। अलख की गति लखी नहीं जाती। पूर्व चरित्रों का स्मरण करते हुए उनकी अलौकिकता से अभिभूत हो जाते। पुत्र के वापिस आने की आशा जग जाती। मोहवश हो जाने पर नित्यप्रति सम्भराथल की तरफ निहारते कि अभी आया। इस प्रकार से एक महीना व्यतीत हो गया, लेकिन हाँसा का दुलारा लौटकर नहीं आया।
एक दिन ग्वाल-बाल अपने पशुधन को लेकर प्रातःकाल ही घर से निकल पड़े। नित्यप्रति की भांति सम्भराथल की ओर से प्रस्थान किया। ग्वालों ने देखा कि जाम्भोजी सम्भराथल पर बैठे ध्यान लगा रहे हैं। दौड़कर पास में गये। खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। प्रेम से गले से गला, हाथ से हाथ, पैर से पैर मिलाकर शरीर से शरीर स्पर्श करके मिले। प्रेमाश्रु बहने लगे।
ग्वाल बाल कहने लगे-हे भाई! तुम्हारे कहने से तो हम लुके थे और हमारे कहने से तुम ऐसे लुक गये कि एक माह तक तुम्हारा कहीं पता ही नहीं चला। क्या कहीं ऐसा भी छिपा जाता है? एक माह तक लगातार? हम लोग एवं तुम्हारे माता पिता, तुम्हारे बिना कितने उदास थे। किस प्रकार से तुम्हारे बिना ये दिन दुःख से काटे हैं? हमारी कोई भूल हो गयी हो तो हमें क्षमा कर देना। ऐसा खेल फिर कभी मत खेलना, जिससे हम अपने प्राण प्यारे को ही खो बैठे।
उनमें से एक बालक भागता हुआ पीपासर आया और सर्वप्रथम लोहट हाँसा से बधाई माँगी। आपका बेटा आज वापिस सम्भराथल पर विराजमान है। लोहट हांसा ने कहा- हे बालक! यह शुभ समाचार, सुनी सुनाई बात कहता है या आँखो से देखी हुई।
बालक बोला- मैँ अभी अभी अपनी इन्हीं आँखों से देखकर दौड़ता हुआ, एक ही श्वास से पीपासर आया हूँ। लोहटजी ने उस बालक को बहुत-बहुत बधाइयाँ दी। एक बछड़े वाली दुधारू गाय प्रदान की। लोहट-हांसा एवं सगे सम्बन्धी दौड़कर गाँव से बाहर निकले। पहले मिलने की लालसा लिए हुए बड़े-बूढ़ों से आगे तो बच्चे भाग रहे हैं। लोहट-हांसा तो बहुत ही पीछे रह गये हैं। अब क्या किया जाय? बुढ़ापा आ गया है। भागा जाता नहीं। यदि इस समय पंख आ जाये तो उड़कर पहले पहुँचा जा सकता है।
लोगों ने देखा कि जाम्भोजी ग्वाल-बालों से घिरे हुए सम्भराथल पर बैठे हुए हैं। माता हांसा, पिता लोहटजी ने देखा, लोचन सफल किये। सूखी खेती वर्षा से पुनः हरी भरी हो जाती है। गर्मी के पश्चात् वर्षा की बौछारें भली लगती है। ठण्डक में ठिठुरते हुए को आग की तपन सुहावनी लगती है। वियोगजन्य दुःख के पश्चात् संयोग सुख अति आनन्ददायी होता है। माता हांसा ने अपने लाडले को छाती से चिपकाया, अश्रुधारा बह चली। आँसुओं के जल से अपने प्यारे पुत्र को स्नान करवाया। खुशी में नाचते-गाते ढ़ोल, बजाते हुए वापिस पीपासर नगरी में प्रवेश करवाया। पीपासर में खुशियाँ मनायी गयी, रंग गुलाल छिड़के। लोहटजी ने खुशी में विशेष पूजा-पाठ का आयोजन किया। अपने परिजनों को मिष्टान्न भोजन करवाया। दूसरा जन्म हुआ हो ऐसा ही लोहट के घर उत्सव होने लगा। सुहागिनें गीत गाने लगी। गायक वादक कलाकारों ने अपने अपने राग-रागनियों से पीपासर नगरी को गुंजायमान कर दिया। आज पींपासर नगरी इन्द्रपुरी से भी बढ़कर राग रंग महोत्सव में डूबी हुई थी।
गाँव के लोग चर्चा करने लगे कि देखो भाई! यह लोहटजी का गूंगा एक महीने तक कहाँ गया था? न जाने यह कहाँ तो बैठा, कहाँ सोया, कहाँ रहा, कुछ पता नहीं है? लेकिन लोहट एवं अपना सभी का सौभाग्य है कि वापिस आ गया। कहीं ढूँढ़ने से नहीं मिला किन्तु अपने आप आ गया। ऐसा क्यों किया? इसकी तो गति ही निराली है, भगवान् की बात भगवान् ही जाने हैं। हम तो अल्पज्ञ हैं। कहाँ उस सर्वज्ञ की गति को जान सकते हैं?
एक बात अवश्य ही मान्य है कि जब से यह बालक पीपासर में आया है, तभी से हमारे यहाँ धन, धान्य, गऊ आदि से परिपूर्ण हो गये हैं। यह तो हमारे लिए इन्द्र देवता या विष्णु से कम नहीं है। इसके आने के पश्चात् तो हमारे यहाँ पर समय से वर्षा होती है। हमारी गायें पेट भरकर घास चरती हैं। हमारे धान के कोठे भर गये हैं। हमारी गायें भी पहले से कहीं अधिक दूध देती हैं। किसी प्रकार की आधि-व्याधि हमें नहीं सताती।
भगवान् विष्णु से बस एक ही प्रार्थना है कि यह बालक धरती पर बना रहे। यहाँ से कहीं चला न जाये। एक महीना यहाँ न रहने से हमें कितना वियोग का कष्ट सहन करना पड़ा। हे भाइयो! यह या तो कोई परम योगी है, या शिव-ब्रह्मा-विष्णु में से कोई एक है। इनकी लीला तो अपरम्पार है। पहले की भाँति अब की बार भी कहीं लोप न हो जाये। एक महीना यह बालक कहाँ रहा, इस रहस्य को तो कोई नहीं जान सका।
वील्होजी उवाचः- हे गुरुदेव! आपने अभी-अभी हमें बतलाया कि बाल्यावस्था में जम्भेश्वरजी एक महीना तक लुप्त रहे। यदि आप बताना उचित्त समझें तो बतायें कि कहाँ पर रहे? क्यों और कैसे रहे? उनका लुप्त रहने का क्या प्रयोजन था? यदि अन्य कोई कथन करने योग्य वार्ता हो तो अवश्य ही बतलावें। आपसे अधिक वक्ता इस समय कोई मुझे दिखाई नहीं देता।
नाथोजी उवाचः- एक माह तक जम्भेश्वरजी पाताल लोक में रहे। प्रह्लाद पंथी जीवों को सÔन्मार्ग में लाने हेतु रहे। भगवान् ने जब नृसिंह रूप धारण करके प्रह्लाद के अनुयायियों के उद्धार का वचन दिया था, उस वचन की पूर्ति हेतु वहाँ पर पहुँचे थे। कुछ तो यहाँ जम्बुद्वीप (भरतखण्ड) के बागड़ देश में जन्म लेकर आ गये थो। तथा कुछ पाताल लोक में चले गये थे। उन्हें भी सचेत करके सत्पंथ के पथिक बनाया।
कलयुग में सर्वप्रथम पंथ की स्थापना जाश्वभोजी ने पाताल लोक में ही की थी। उन्हें यही पंथ बतलाया था। जाम्भोजी तो सर्वसमर्थ, अन्तर्यामी हैं। वे तो सभी के घट-घट की बात जानते हैं। बिछुड़े हुए जीवों की जाति से भी भली-भाँति परिचित हैं। म्हे खोजी थापण होजी नाहीं, खोज लहाँ धुर खोजूं।
कैसे गये? यह प्रश्न हम साधारण शरीरधारी उठा सकते हैं। किन्तु उनका शरीर तो तेजोमय था। सम्पूर्ण सृष्टि की ज्योति तो एक ही है। ज्योति से ज्योति मिलकर ज्योतिस्वरूप से सर्वत्र व्यापक हो सकती है। यहाँ मृत्युलोक में भी रहते हुए कभी छाया नहीं झलकती थी। ज्योति के छाया कैसे हो सकती है? वह ज्योति ही जब मानव से वार्तालाप करने आती है, तो मानव आकार धारण कर लेती है। इसके लिए अन्य चार तत्त्व आकाश, वायु, जल और पृथ्वी भी सूक्ष्म रूप से सम्मिलित हो जाते हैं। गीता में प्रकृति स्वामधिष्ठायसम्भवाम्यात्ममायया स्वयं ही अपनी प्रकृति को आधीन करके अनेक रूप धारण कर लेते हैं। वैसे तो देखा जाये तो हमारी ऊर्जा शक्ति भी पाताल में ही छिपी हुई है। हमारा नाभि का क्षेत्र पाताल ही है। इसका स्पर्श करके ही अपनी सोयी हुई ऊर्जा शक्ति को जाग्रत किया जा सकता है। वहीं से साक्षात्कार होगा। सर्वप्रथम अपनी ही शक्ति का पाताल में सोयी हुई ऊर्जा शक्ति जब प्राणायाम द्वारा जाग्रत होगी, तभी ऊ र्ध्वगमन करके सहस्रार मे पहुँचेगी। पाताल का पाणी आकाश कूं चढ़ायले भेटले गुरु का दर्शणा।
कुछ समय तक, एक माह तक पाताल में ही रहना होगा। तभी हम प्रह्लाद पंथ को सद्गुणी, सद्वृत्ति को जाग्रत कर सकेंगे। अन्यथा मन की चंचलता हमें विचलित कर देगी। हमारा मूल पाताल ही है। नाभि सम्पूर्ण शक्तियों का केन्द्र है। मूल में प्रवेश करके ही जम्भेश्वरजी ने अपना कार्यक्षेत्र प्रारम्भ किया था किन्तु साधारण ग्वाल-बाल अशिक्षित ग्रामीण जन इस गंभीर बात को क्या जानें? वे तो कहने लगे कि कहाँ गये? कहाँ बैठे, कहाँ सोये, कुछ पता नहीं।