दसवां अध्याय · कथा 65
चेलोजी की सहनशीलता
राजा आसकरण ने जाम्भोजी तथा उनकी पाहल का प्रत्यक्ष प्रभाव देखा। जाम्भोजी गंगा पार की जमात के साथ वापिस सम्भराथल चले गये। वहाँ पर गंगा पार की जमात कुलचन्द, धनो, बीछू आदि सोलह दिन रहे। एक दिन चेलोजी ने हाथ जोड़कर कहा-
हे देवजी! अब हमें यहाँ आये को बहुत दिन हो गये हैं। आपकी आज्ञा हो तो वापिस जाये। जाम्भोजी ने आदेश देते हुए कहा-अवश्य ही जाओ।
कुलंचद ने हाथ जोड़कर कहा-हे देव! हम आप से विलग नहीं हो सकते। हर छठे महीने हमारा आने का नियम है। यह निभता रहे। इस समय हम लोग आपको आपकी मण्डली सहित ले जाना चाहते हैं। कृपा करो एक बार हमारे देश में अवश्य ही पधारो। हम लोग वापिस जाकर विवाहोत्सव करेंगे। छोटी बेटी का विवाह होगा। उसमें सभी न्यात जमात को बुलायेगें। आप भी वहीं पर दर्शन दो, तो हमारा कार्य सफल होगा।
जाम्भोजी ने कहा-हे भक्त! विवाहोत्सव मनाओ, किन्तु सुपात्र की पूजा करो। “दान सुपाते, बीज सुखेते, अमृत फूल फ लीजै। जिस प्रकार से मौसम आने पर अच्छी खेती में बोया हुआ बीज फूलता फलता है और अनन्त गुणा हो जाता है, उसी प्रकार से सुपात्र को दिया हुआ दान भी अमृत दायी, फलदायी होता है। इसलिये विवाह में हवन यज्ञ करो। सुपात्रों को भोजन प्रेम से जिमाओ। सुपात्र साधु जनों को जिमाया हुआ भोजन भगवान् ही ग्रहण करता है।
इस समय तुम्हारे यज्ञ में मैं तो नहीं आ सकूँगा। किन्तु आपके साथ में चेलोजी भक्त है। वह मेरा ही रूप है। आप इनकी सेवा पूजा दर्शन करो। यह भगवान् का ही दर्शन होगा। आप लोगों ने बहुत ही यात्राएँ की हैं, बार-बार आने में कष्ट होता है। इसलिये आप वहीं पर आपके ही दामाद चेलो जी मेरा ही प्रतिनिधि है। उनका दर्शन उपदेश शिरोधार्य करो। आप लोग निर्धन तथा छोटे चेले जी के बारे में शंका नहीं करना। इस प्रकार से धनो, बिच्छु कुलंचद को श्री देवजी ने आदेश दिया।
नाथोजी कहते हैं कि हे वील्ह ! जाम्भोजी का आदेश शिरोधार्य करके वहाँ से रवाना होने लगे, किन्तु उनके दिल में जाम्भोजी की कही बात बैठी नहीं थी। चेलो जी को जाम्भोजी का रूप मानने को कतई तैयार नहीं थे। किन्तु देवजी के सामने कुछ बोल भी नहीं सके थे। वहाँ से रवाना होते हुए पुनः सभी ने प्रणाम किया। मन ही मन में तथा प्रकट रूप से एक दूसरे के मुँह की तरफ देखते हुए कहने लगे-
जाम्भोजी ने ऐसी बात न जाने क्यों कही कि चेलोजी का दर्शन कर लिया करो। कुलचंद जी ने कहा- आप लोग शंका मत करो। यह बड़े लोगों की रीत है। भक्तों के गुण प्रगट करते हैं। उनके अवगुणों की तरफ ध्यान नहीं देते। वैसे तो चेलोजी कोई हम से ज्यादा अच्छे नहीं है। इस समय जो कुछ भी श्री देवजी ने कहा है, वही मानलो। सभी अपनी अपनी विनती श्री देवजी से निवेदन करो और यहाँ से चलो।
श्री देवजी ने उन भक्तों की काना-फू सी तथा संशय को निवृत्त करते हुए पुनःकहा-हे कुलंचद! जो भक्त शील, संतोष, क्षमा, जरणा, अजरा जरै, जीवत मरै, वह तो मेरा ही स्वरूप है। उस भक्त और भगवान् में भेद नहीं है। ऐसी देवजी की सार गर्भित वार्ता सुन कर हृदय में धारण किया और अपने अपने बैलगाड़ी जोत ली। अंतिम विदाई लेने हेतु एक-एक करके सामने आये और अपने-अपने हृदय के उद्गार प्रकट किये।
कुलंचद कहने लगा-हमारी जमात हाथ जोड़े खड़ी है। आँखों में आँसू बह रहे हैं। मुख से कुछ बोल नहीं पा रहे हैं। आप से बिछुड़ते हुए उन्हें भारी दुःख हो रहा है। जिस प्रकार से राम वन में गये थे तो अयोध्या के लोगों को भारी दुःख हुआ था। जिस प्रकार से गुह निषाद के प्रेम था, वैसा ही प्रेम अपने लोगों का आपके प्रति झलकता है। ये लोग आप से विनती कर रहे हैं। आपको साथ ले चलने का आग्रह कर रहे हैं। बार-बार हम आप से निहोरा कर रहे हैं।
जाम्भोजी ने कहा-इस समय तो आप लोग वापिस जाइये और चेले जी को ही मेरा रूप मान कर दर्शन कीजिये। तुम्हारा कार्य सिद्ध होगा। फिर कभी मैं अवश्य ही आपके देश में आऊँगा। धनोजी स्तुति करते हुए कहने लगे-हे प्रभु हमें सदा प्रसन्नता बनी रहे। “हरष न खोइये”यह तो आपकी कृपा से ही संभव है। हम तो अज्ञानी जीव हैं। संसार की मोह-माया में उलझ जायेंगे। जब तक हम आपके पास में हैं, तभी तक आपकी यह त्रिगुणी माया का पर्दा हम से दूर है। वहाँ जाते ही छाया-माया का पर्दा गिर जायेगा। वीछू जी कहने लगे- आपका दर्शन सूर्य के समान है। जब सूर्योदय होता है तो अन्धकार नहीं टिकता। उसी प्रकार से आपका सामीप्य है। तभी तक ज्ञान प्रकाश रहता है। इसलिये आप हमें अपने पास ही रहने दीजिए।
सुरगण भंवरा ने भी अपनी अपनी कथा व्यथा का वर्णन किया। क्षमा याचना की। हे देव आपकी महिमा हम अज्ञ जन कहाँ तक वर्णन करें, स्वयं शिव, ब्रह्या भी आपकी महिमा का पार नहीं पा सकते। सम्पूर्ण ब्रह्याण्ड ही आपकी विभूति है। हे प्रभु ! आप सदा ही दयाभाव बनाये रखें, हम आपको एक क्षण भी नहीं भूलें। ऐसी कृपा करो।
श्री देवजी ने सभी को यथा योग्य आदेश दिया और चेलो जी के कंधे पर अपना दुपट्टा डाला। उन्हें अपना उत्तम अधिकारी शिष्य बनाया और सम्भराथल से विदाई दी। बिश्नोइयों की जमात सम्भराथल से वापिस अपने देश को चली। पहली रात्रि कुचौरा में व्यतीत की और आगे चलते हुए जहाँ जल की सुविधा होती वहीं अपने नियमों को निभाते हुए बीस दिन व्यतीत होने पर वापिस अपने देश गंगापार नगीने पहुँचे। अपने प्रिय मित्रों से, सज्जनों से मिले। सम्भराथल धाम की यात्रा कर के बहुत दिनों बाद लौटे थे। सभी ने खुशियाँ मनाई।
कुछ समय आनन्द मंगल में व्यतीत हो जाने पर कुलंचद ने अपनी छोटी बेटी इमरती के विवाह की तिथि तय कर दी। अपने कुटुम्बी सभी लोगों को निमन्त्रण देकर बुलाया। बहन-बेटियों को स्वंय जाकर ले आये। इस प्रकार की खुशी के अवसर पर किसी को भी नहीं छोड़ा। निमन्त्रण देकर बुलाया। अपने नजदीकी थे या दूर के भी थे, जमाती भक्त थे। उनको भी निमंत्रण भेजा। किन्तु धनों ने अपनी बड़ी बहन राम प्यारी तथा अपने बहनोई चेलो जी को नहीं बुलाया। स्वयं कुलचंद जी ने ही मना कर दिया था। कुलंचद जी सभी को एकत्रित कर के कहने लगे -
जाम्भोजी ने कहा है कि हम लोगो में शिरोमणि भक्त चेलोजी हैं, किन्तु हमें विश्वास नहीं हो रहा है। वहाँ पर सम्भराथल पर तो हम शिष्टाचार वश कुछ कह नहीं सके थे। अब हमें चेलोजी की परीक्षा करके देखना है। चेलोजी को निमंत्रण नहीं देना,और यदि बिना बुलाये आ भी जाये तो कोई आदर सत्कार नहीं करना और इतने पर भी क्रोधित न हो तो ऐसे कटु असहनीय शब्दों द्वारा अपमान भी करना है। सावधान रहे।
वैसे भक्त का क्या पता चले, शूरवीर का पता तो युद्ध के मैदान में ही चलता है।
हीरा असली है या नकली, इसका पता भी हीरे को अहरण पर रखकर के घण से चोट मारे, न टूटे तो असली और टूट जाये तो नकली समझे। सोने का असली नकली का पता भी तपाने से चलता है। उसी प्रकार से भक्त का पता भी जरणा रखने से चलता है, पुरुष कैसा क्या है? उसी का पता भी विद्या पढने के बाद ही चलता है। यदि चेलोजी जाम्भोजी का रूप ही है, तो हम परीक्षा कर के देखेंगे।
जाम्भोजी की बराबरी तो वही कर सकता है, जो काम, क्रोध, लोभ, मोह को जला डाले। सम्पूर्ण सृष्टि में एक ही परमात्मा परिपूर्ण है। व्यापक है, ऐसा देखता है”
वासुदेव सर्वमिति स महात्मा, राग -द्वेष, भाव-कुभाव, बन्ध-कुबन्धु इत्यादि मानव के स्वाभाविक दुर गुण जिनमें न हो वही ईश्वर तुल्य दर्शनीय पुरुष है। किन्तु चेलोजी शायद ऐसा नहीं है? इनकी परीक्षा करके देखेंगे। इसलिये सभी को बुलाया किन्तु बहन-बहनोई को नहीं बुलाया।
विवाह महोत्सव में भोजन के लिये घृत, मिष्ठान आदि की व्यवस्था अपने समाज के लोगो द्वारा ही की गयी। शुद्धता-पवित्रता से भोजन बनाया गया। संतों द्वारा विराट यज्ञ किया गया। सर्वप्रथम यज्ञदेव को अग्नि में भोजन प्रसाद की आहुति दी गयी। उसके पश्चात् बाहर से आये हुए अतिथि सुपात्र को प्रेम से भोजन करवाना प्रारम्भ किया तथा अन्य भी बराती जमाती लोग भी समय पर भोजन करने लगे।
नगीने में ही निवास करने वाले चेलोजी अपनी पत्नी रामप्यारी से कहने लगे-आज तुम उदास सी क्यों दिख रही हो? तुम्हारे पिताजी के घर पर तो महोत्सव हो रहा है। तुम्हारी माता, बहिनें, भाई आदि तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे होंगे। अपने नन्हें बच्चो को लेकर जाओ ये बच्चे भूखे हैं। भोजन का समय हो गया है। सभी लोग भोजन कर रहे हैं। चलो चलते हैं आज तो वहीं भोजन होगा।
ऐसी बात सुनकर चेलोजी की पत्नी कहने लगी-क्यों जले पर नमक छिड़कते हो? जिन मेरे माता-पिता, भाइयों ने नजदीक तथा दूरी के भी सम्बन्धियों को निमंत्रण देकर बुलाया है, हम यहाँ पास में ही बैठे हुए हैं। हमें बुलाया तक नहीं। ऐसे यज्ञ महोत्सव में कैसे जाएँगे? मैं तो उस घर का पानी भी नहीं पीना चाहती।
चेलोजी अपनद्ध धर्मपत्नी से कहने लगे-अपने ही लोगों को निमंत्रण नहीं दिया जाता। वह तो पराये को दिया जाता है। क्रोध तो उनको करना चाहिये, जो निमंत्रण की प्रतीक्षा करते हैं। फिर भी निमंत्रण मिलता नहीं है। तुम्हें तो ऐसा नहीं करना चाहिये। उनको क्यों दोष देती हो? उनके तो घर में विवाह का कार्य है। उन कार्यो में सेवा करने के लिए हमें जाना चाहिये था। तू तो नाराज होकर बैठ गयी। यदि तू नहीं जाती है, तो ना जा। हम तो अभी जाते हैं। ऐसा कहते हुए चेलोजी बाल-बच्चों को साथ लेकर अपने ससुराल कुलचंद के घर पर पहुँच गये।
धनो जी ने सभी को सावधान कर दिया था। इसलिए किसी ने भी आदर सत्कार नहीं किया। उल्टा कहने लगे-अपने परिवार को लेकर चले आये हैं। कुलचंद जी कहने लगे-कुछ लोग ही ऐसे होते हैं जो बिना बुलाये ही चले आते हैं। जिनको लाज शर्म नहीं है। वे ही लोग अपनी अपनी थाली लेकर आ जाते हैं। इतना कहने पर भी अपने पिता तुल्य श्वसुर की बात का कोई बुरा नहीं माना। घर में प्रवेश कर गये। घर में भी चेले जी से कोई नहीं बोला। आगत-स्वागत का कुछ भी शब्द नहीं कहा। चेलोजी भोजन करने के लिए बैठने हेतु ताकड़-तोला विचार करने लगे। कहाँ बैठूँ? तभी भक्त चेलोजी की सासू कहने लगीयहाँ
क्यों खड़े हो? जैसे कोई तमोली खड़ा है। जैसे कोई पान सुपारी वाला पनवाड़ी है। ऐसे खड़ा मूँछे फ रकाता है। ऐसे ही शब्दों द्वारा सभी ने ही अपमान किया। भोजन करने का अवसर ही नहीं मिला। एक प्रहर तक उठते-बैठते रहे,किन्तु कहीं भी भोजन की प्राप्ति नहीं हुई। उठ कर अपने घर को चल पड़े। जब घर से बाहर निकलने लगे, तब बाहर बैठे हुए लोगों ने भी हंसी उड़ाते हुए कहा-चेलोजी भोजन कर के आ रहे हैं। दूसरा कहने लगा तभी तो पसीना आ रहा है। इस प्रकार से व्यंग्य बाण सुनते हुए चेलोजी घर पर पहुँच गये।
चेलोजी बाल बच्चों से कहने लगे- इस समय तो तुम लोग भोजन अपने घर पर ही करो। वहाँ तुम्हें भोजन नहीं मिला, क्योंकि अपने लोग देरी से पहुँचे थे। इस समय मैं जाता हूँ। सेवा कार्य करवाता हूँ। शाम को भोजन में सम्मिलित होंगे। मैं आकर तुम्हें ले जाऊँगा।
चेलोजी अपने श्वसुर के घर पहुँचे। सेवा कार्य में जुट गये। चेलोजी ने देखा कि घर के लोग तो सभी अन्य कार्य में व्यस्त हैं। ये बेचारे अनबोल पशु, गाय, बैल आदि भूखे प्यासे हैं। उनकी सेवा कार्य में तल्लीन हो गये। उन्हें घास खिलाना, पानी पिलाना, उनका गोबर डालना आदि करना, किन्तु किसी ने भी यह नहीं कहा कि जमाता जी! आपका कार्य यह नहीं है। सभी चेलोजी की सेवा से प्रसन्न हो रहे थे। शाम को भोजन का समय हुआ, तब चेलोजी अपने घर आये और रामप्यारी से कहने लगे-
भोजन करने के लिए चलो। रामप्यारी कहने लगी-तुम ही चले जाओ। मैं तो नहीं जाऊँगी, और यह भी बता देती हूँ कि तुम्हें वे लोग एक लोटा जल भी नहीं पिलायेंगे। चेलोजी कहने लगे- यदि जल नहीं पिलायेंगे, तो भी कोई बात नहीं है। आखिर रहना तो उस घर में ही है। क्या अपनी आत्मा को छोड़ी जा सकती है? वे तो मेरी ही आत्मा हैं। वे तो हमारे माता-पिता, भाई-बंधु सभी कुछ हैं। यह तो कौन सी बात है? हमारे ऊपर उनका ऋण है। यदि जिंदगी भर उनकी झूठ भी उठायें, तो भी हम उन माता-पिता के ऋण से उऋण नहीं हो सकते। इस प्रकार कहते हुए चेलोजी अपने बच्चों को लेकर चल पड़े। घर में प्रवेश करते ही कुलचंदजी ने रोक दिया और कहा-तुम लोग घर में क्यों जा रहे हो? बिना ही प्रयोजन भीड़ क्यो करते हो? यहाँ खड़े रहो। मैं अंदर जाता हूँ। पहले देखकर आता हूँ कि आगे जगह है या नहीं? चेलोजी ने कुलचंद के पीछे-पीछे आंगन में प्रवेश किया। अंदर किसी ने ऐसा नहीं कहा कि आओ, आओ बैठो।
बालकों के सहित चेलोजी भोजन करने बैठे, तब धनोजी ने कहा-तुम लोग देरी से आये हो। अब भोजन समाप्त हो गया है। जल्दी आना चाहिये था। न जाने क्या करते रहे, अब आकर बैठ गये है। जाओ यहाँ से। कल सुबह आना। चेलोजी कहने लगे-ये बालक भोले हैं। इस बात को नहीं समझते हैं। इन्हें थोड़ा ही है वही दीजिये। इन बालकों को क्रोधित न करें। अब थोड़ा दीजिए प्रातःकाल फिर आयेंगे किन्तु वहाँ किसी ने भी चेलोजी की बात नहीं सुनी। थोड़ी देर वही बैठे रहे, फिर वहाँ से उठ कर चल दिये।
धनो कुलचंद ने देखा कि चेलोजी में सहनशीलता है। कहीं क्रोध का नाम नहीं है। एक बार और भी देखेगे। क्या होता है? तीसरी बार फिर से न्यात-जमात को भोजन करने के लिये बुलावा आया, किन्तु चेलोजी को नहीं बुलाया। जब सभी लोग भोजन कर चुके, तब सब से पीछे चेलोजी आये। पाकशाला में एक आदमी को बिठा रखा था। उन्होंने चेलोजी से कहा-एक प्रहर बाद आना। साथ में अपने बालक स्त्री को ले आना।
तीसरी बार चेलोजी ने भोजन शाला में प्रवेश किया। वहाँ पर किसी ने भी सम्मान नहीं किया। चेलोजी पंक्ति में जाकर बैठ गये। कोई व्यक्ति आया। चेलोजी के आगे से थाली उठा ली, और अन्दर ले गये। चेलोजी प्रतीक्षा करने लगे। शायद थाली लेकर वापिस आयेगा। थाली लेकर तो कोई नहीं आया किन्तु चेलोजी की सासू बोली-पेट पर तो झोली मांड रखी है। पेट हो तो भर भी जाये, किन्तु झोली कैसे भरेगी? जहाँ देखती हूँ दामाद तो वही आगे खड़ा तैयार मिलता है।
चेलोजी ने अपनी सासू की बात की कुछ भी परवाह नहीं की। वही भोजन शाला में बैठे रहे। धनोजी ने कहा-यहाँ भीड़ क्यों कर रहे हो? अपने घर को क्यों नहीं जाते?
चेलोजी ने कहा-ये बच्चे भूखे हैं, आज इन्होंने कलेवा भी नहीं किया। अपने मामा के घर भोजन करने के लिये आये हैं। जो कुछ पीछे बचत-खुरचण आदि है, वही दीजिये। धनोजी ने कहा -कुछ है तो दे दो। नहीं तो यह हमारा पीछा नहीं छोड़ेगा।
धनोजी के कहने से पीछे बचा हुआ खुरचण भोजन,अधजला हुआ भोजन लाकर दिया,चेलोजी ने भगवान् विष्णु के भोग लगाया और प्रेम से अमृत मान कर भोजन करने लगे। कुलचंदजी ने चेलोजी का हाथ पकड़ लिया। भोजन का ग्रास मुँह में जाने नहीं दिया। चेलोजी कहने लगे, इन बच्चों को तो भोजन करने दो। आज ये भूखे है। हम फिर आपको कष्ट नहीं देगे। इस प्रकार के यज्ञ से इन बच्चो को भूखे नहीं जाने दो।
धनोजी ने हाथ जोड़ दिये-कुलचंदजी ने कहा-जम्भेश्वरजी सच्चे हो गये।
जाम्भोजी के अनुसार ही चेलोजी खरे उतरे हैं। यह हमने प्रत्यक्ष देख लिया है।
चेलोजी में भारी सहनशीलता है। हमने आपका अपमान किया। जाम्भोजी की बात का विश्वास नहीं किया। हम आपके अपराधी हैं। आप तो सहनशीलता के मूर्ति हैं। हमने आपका अपराध किया। हम पापी हैं। आप ही हमारे पाप का निवारण कर सकते हैं।
चेलोजी कहने लगे-हम तो आपके बालक हैं। तुम हमारे माता-पिता हो, अन्य सभी ही एक गुरु के चेले गुरु भाई हैं। आपने सभी ने भोजन कर लिया, तो समझो सभी ने कर लिया हैं। मैं आपकी कुछ भी सेवा नहीं कर सका, उल्टा भीड़भाड़ में आपको दुःख ही दिया। फिर आपने तो कुछ भी क्रोध नहीं किया। आप फिर भी उल्टा मुझ से ही याचना कर रहे हैं।
इस प्रकार से याचना करके मुझे शर्मिंदा न करें। धनो वीछू कहने लगे-हे देवता जी! हम तो आपकी शरण में हैं। आप तो जाम्भोजी की ही देही हो। आपका दर्शन जाम्भोजी का ही दर्शन है। ऐसे विष्णु रूप साक्षात् हमारे घर में मौजूद हैं। हमने आप का अपमान किया। फिर भी आपने क्षमा कर दिया। परीक्षा करने के चक्कर में हमने इह लोक और परलोक दोनों ही खो डाले हैं। जो संतों को दुःख देता है, फिर भी संतजन उसका उपकार ही करते हैं। अपने श्वसुर जी के यज्ञ में चेलेजी ने तनिक भी क्रोध नहीं किया। उपकार की भावना से चेलोजी ओतप्रोत थे।
चेलोजी अपने घर पर आये और रामप्यारी को समझाते हुए इस प्रकार कहने लगे-इस यज्ञ महोत्सव में इतना आनन्द आया। मेरे जीवन भर में इससे पूर्व इतना आनन्द कभी नहीं आया। इन सात दिनो में आत्मोन्नति का सुअवसर प्राप्त किया। तथा सेवा धर्म करके मैं कृतार्थ हो गया। मेरे पर प्यारे बिछू ने मेरी आत्म-उन्नति में समय-समय पर अवसर दे मुझे कृतार्थ किया। मैं प्रभु जम्भदेव से प्रसन्न और सच्चे दिल से प्रार्थना करता हूँ। ईश्वर उनका भला करे।
आनन्द के रहस्य को तुम नहीं समझती प्यारी। शारीरिक सुख का नाम ही क्या आनन्द होता है? आनन्द तो आत्मा की तृप्ति का नाम है। ऋषि-मुनि लोग तो आनन्द के लिये जप-तप-व्रत सभी करते हैं। शरीर रहे चाहे जाय, इसकी चिंता किये बिना आत्मिक आनन्द के लिये हँसते-हँसते विष के प्याले पिये। सूली पर चढे, तथा सर्पो से खेलते रहे, उन महात्माओं के आनन्द के रहस्य को क्या थोड़े से ही दुःख में भूल गयी?
हमारे सब से बड़े प्रह्लाद भक्त, राजा युधिष्ठिर आदि पुरुष और सति शिरोमणि सीता, दमयन्ती, तारा, सावित्री, अनुसूइया, आदि देवियों ने कष्ट सहे,किन्तु क्रोध को निकट नही आने दिया। तुम दूर क्यों जाती हो? आज कल के ही दिनो में गुरुजी महाराज के थोड़े से ही सदुपदेश सुनकर तुम्हारी ही स्त्री जाति की देवी मीरा का जीवन देखो। अनेक प्रकार का अपमान और कष्ट सहने पर भी कुछ भी परवाह नहीं की, हंसते हुये अनेकों कष्ट सहन कर लिये, किन्तु भगवान् की भक्ति एवं प्रेम भाव नहीं छोड़ा क्रोध को जीत लिया।