तीसरा अध्याय · कथा 17
जाम्भा गोरख गुरु अपारा
वील्होजी उवाचः- हे गुरुदेव! सम्भराथल पर विराजमान होकर जम्भेश्वरजी ने गुप्त पदवी धारण कर ली और भगवीं टोपी-चोला पहन लिया। बिश्नोई पंथ की स्थापना श्रीदेव ने यहीं पर की थी। यह बात तो बहुत ही प्रसिद्ध है तथा मुझे ज्ञात भी है। किन्तु मैं जानना चाहता हूँ कि जाम्भोजी स्वयं समर्थ होते हुए भी अय किसी अवधूत योगी को गुरु धारण किया या नहीं? यदि किसी को भी गुरु धारण नहीं किया तब गुरु धारण करने की परंपरा का लोप कैसे कर सकते हैं? वे स्वयं राम-कृष्ण के साक्षात् अवतार थे। मर्यादा पुरुषोतम कैसे मर्यादा तोड़ सकते हैं? जब स्वयं ही गुरु धारण नहीं करेंगे, तो दूसरों को कैसे कह सकते है? “पहले क्रिया आप कमाइये,तो ओरां ने फ रमाइये।”
यह तो निश्चित ही है कि जाम्भोजी ने भगवां वस्त्र धारण किया था। “भगवीं टोपी सम्भराथल आयो” उन्होंने स्वयं ही कहा है। हमारी परंपरा रही है कि गुरु मंत्र एवं भगवां वस्त्र किसी सद्गुरु से ही धारण किया जाता है ।
हे गुरु देव! आपने यह नहीं बतलाया कि जाम्भोजी के गुरु कौन थे? किससे वस्त्र और मंत्र लिया था। ऐसे महान् योगी स्वयंभू, जो जाम्भोजी के गुरु बनने की क्षमता रखते हैं, उनके बारे में जानना चाहता हूँ। किस गुरु की परंपरा एवं सिद्धान्त को जम्भेश्वर जी ने आदर दिया था।
नाथोजी उवाच -हे शिष्य! आपने यह बात ठीक पूछी है। मैं अपनी समझ एवं ज्ञानानुसार तुझे बतलाने का प्रयास करूँगा। वैसे तो घायल की गति घायल ही जाने,जे कोई घायल होई। उनकी गति तो वही जान सकता है, हम जानने में असमर्थ हैं। यह गुप्त बात है शिष्य! जम्भेश्वर जी की सम्भराथल पर ही किसी योगी से भेंट हुई। वह योगी अवधूत कौन था? ठीक से उसके बारे में जानने में मैं समर्थ नहीं हो सका। किन्तु हमारा यह विश्वास है कि वे तो गोरख यति ही थे। हालांकि गोरख यति उनसे कई सौ वर्ष पूर्व हुए थे, फिर भी अवधूत योगी की माया बड़ी ही विचित्र होती है। उन सिद्ध पुरुषों के बारे में ठीक से कुछ भी नहीं कहा जा सकता कि वे कौन थे, कब हुए?
हे शिष्य! मैं भी सदा उनके साथ रहने वाला इस वार्ता के बारे में पूछ नहीं सका तथा न ही किसी अन्य भक्त ने मेरे सामने यह प्रश्न पूछा। मैं तो सदा ही अपने गुरु देव से ही संतुष्ट था। कभी पीछह्य जाने की इच्छा ही उत्पन्न नहीं हुई। पता नहीं, क्या कुछ जादू था जो दृष्टि एकाग्र हो जाती थी। इधर-उधर की बातें अन्दर से जाग्रत ही नहीं होती थी। मैं तुम्हें इस विषय में प्रत्यक्ष श्रवण की बात तो नहीं बता सकूँगा, किन्तु तुम्हें अपने अनुभव की बात अवश्य ही बता रहा हूँ। जाम्भोजी ने स्वयं ही कहा है-
मेरे गुरु जो दीन्ही शिक्षा,सर्व अलिंगण फेरी दीक्षा ।
जाण अजाण ष्हीया जब-जब,सर्व अलिंगण मेटे तब-तब ।।
इससे यह पता चलता है कि जाम्भोजी ने अपने गुरु का स्पष्ट संकेत दिया है। वह गुरु उस गोरख से बढ कर कोई नहीं हो सकता था। अवश्य ही गोरख यति कई सौ वर्ष पूर्व हुए थे, किन्तु योगी लोग तो सदा ही योगी बने रहते हैं।
जाम्भोजी ने कहा है-जुगां जुगां को जोगी आयो,बैठो आसन धारी। मैं तो युगों युगो का योगी हूँ। यहाँ सम्मराथल पर आसन लगाकर बैठा हूँ। “ जोगी सो तो जुग जुग जोगी अब भी जोगी सोई।” योगी होगा तो युगों-युगों तक योगी ही रहेगा। अब भी योगी ही है।
तथा अन्यत्र भी गोरख यति के बारे में कहा है तउवा
जाग जु गोरख जाग्या,निरह निरंजन निरह निरालंब ।
जुग छतीसो एके आसन बैठा बरत्या,अवर भी अवधू जागत जागूं ।।
इस संसार में अनेक योगी जाग्रत हुए हैं किन्तु जितने जाग्रत पुरुष गोरख हुए, उतना कोई नहीं हुआ। गोरख यति, जो स्वयं निरह निराकार निरंजन निराधार भगवान् विष्णु स्वयंभू हैं। सम्पूर्ण सृष्टि उनके देखते ही देखते व्यतीत हो गई, किन्तु वो नहीं सोये। उनके सोने का अर्थ है कि सम्पूर्ण सृष्टि का ही प्रलय हो जाना। छत्तीस युगों से वे गोरख जाग रहे हैं। उनके अतिरिक्त तो कुछ ही अवधूत जाग्रत हुए हैं, किन्तु उनकी बराबरी कोई नहीं कर सका है ।
जितने भी संत मत के अवधूत हुए हैं, गोरख सभी के शिखर पर हैं। सभी ने ही गोरख के ही सिद्धान्त को ग्रहण किया है। ऐसे गोरख यति को गुरु रूप में जम्भेश्वर जी ने स्वीकार किया है, तो कोई आश्चर्य नहीं है। कई वर्ष पूर्व की बात तो सामान्य जनों की बात है, वे गोरख तो अजर-अमर, अविनाशी हैं। सभी ऋषि सूत्रकार इस बात का समर्थन कर रहे हैं। यथा-योग शास्त्र में स्पष्ट लिखा है-
अपरि निर्मित वर्तिनः परिनिर्मित वश वर्तिनश्चेति सर्व्रे संकल्पसिद्धाः अणिमाद्यैश्वर्योपपनाः कल्पायुषोः औपपादिक देहा।। अर्थात् योगी अपनी इच्छा से शरीर धारण कर लेते हैं। वे सत्य संकल्प होते हैं। जैसा चाहे वैसा रूप बना लेते हैं। माता-पिता के संयोग के बिना ही अपने संकल्प से जैसा चाहें, वैसा रूप धारण करने में समर्थ हैं, क्योंकि उनके पास अणिमादि अष्ट सिद्धियाँ होती हैं। वे अपनी दिव्य देही धारण करके जन साधारण के साथ संम्पर्क - वार्तालाप कर सके, ऐसे ही थे गोरख योगी। वे अपनी सिद्धि से मृत्यु को भी जीत लेते हैं। सौ दो सौ वर्षों की तो बात ही क्या है? ब्रह्माजी की आयु के बराबर जीवन जी सकते हैं।
वैशेषिक दर्शन में महर्षि कणाद ने लिखा है - सन्त्ययोनिजाः अर्थात् अयोनिजा बिना गर्भ से उत्पन्न हुए भी योगी शरीर धारण करते हैं। कपिल देव ने सांख्य में लिखा है -ऊष्मजाण्डजजरायुजोद्भिज सांकल्पिकं सांसिद्धकं चह्यति न नियमांः अर्थात् ऊ ष्मज,अण्डज,जरायुज,उद्भिज,सांकल्पिक,जो योगी अपने संकल्प मात्र से देह रच लेते हैं। और सांसिद्धिक ये छः प्रकार की सृष्टि होती है ।
इस प्रकार हमने देखा कि प्राचीन ऋषियों ने योगी के लिये, सिद्ध पुरुषों के लिये किसी भी प्रकार का प्राकृतिक बंधन नहीं बनाया है। इस दृष्टि से देखा जाये तो कई सौ वर्ष पूर्व में गोरख यति होते हुए भी सम्भराथल पर जाम्भोजी से भेंट करने हेतु आये थे। स्वयं जाम्भोजी ने गोरख जी को गुरु की पदवी से विभूषित किया है। जाम्भा गोरख गुरु अपारा “गोरख को अपने तथा स्वयं से ही उच्च पद पर आसीन किया है।
अन्यत्र शब्दों में भी कहा है-गोरख लो गोपाल लो गोरख की गोपाल-कृष्ण से तुलना की है। आप चाहे गोरख को ग्रहण करो,अपनाओ अथवा गोपाल कृष्ण को अपनाओ। ये दोनों ही ग्रहण करने योग्य हैं।
जम्भेश्वरजी ने गोरख को आदिनाथ पद से विभूषित किया है। आधुनिक नाथ जो गोरख के नाम से पाखण्ड करते हैं , वे कतई स्वीकार्य नहीं हैं। “ गोरख हटड़ी धोके , तेपण रह्या इवाणी।” गोरख के धूणे पर जाकर धोक लगाने से तुम गोरख नहीं बन जाओगे। कहा भी है - गोरख दीठा सिद्ध न होयबा, पोह उतरिबा पारूं। गोरख के दर्शन मात्र से तुम सिद्ध नहीं हो सकते। गोरख द्वारा बताये हुए मार्ग पर चलोगे, तो सिद्धि को प्राप्त हो सकते हो। अपने गन्तव्य स्थान पर पहुँच सकोगे।
कलश पूजा में स्वयं जम्भदेव जी कहतें हैं-थरपना थापी बाले निरंजन गोरख जती सर्वप्रथम कलश की स्थापना करने वाले तो सृष्टि के आदि में, सदा बाल्य अवस्था में रहने वाले गोरख यति ही थे। जो निरंजन, माया रहित, निराकार विष्णु ही थे। ऐसे विष्णु ही गोरख यति रूप में जाम्भोजी के गुरु थे। उन्होंने ही सम्भराथल पर जम्भेश्वर जी को भगवां वस्त्र प्रदान करके निवृत्ति मार्ग में चलने की प्रेरणा देते हुए लोक मंगल का कार्य करने का सिद्धान्त प्रदान किया था। जाम्भोजी ने उसी सिद्धान्त के अनुरूप ही आगे का कार्य निर्धारित किया था। गोरख एवं जम्भेश्वर की वाणी में बहुत ही साम्यता है। जैसे गोरख जी का एक पद-
बसती न सून्यं सून्यं न बसती , अगम अगोचर ऐसा ।
गगन शिखर महि बालक बोले , ताका नाम धरहुगे कैसा ।
हंसिबा खेलिबा धरिबा ध्यान , अहनिसि कथिबा ब्रह्म गियान।
हंसै खेलै न करे मन भंग , ते निहचल सदा नाथ के संग ।
अहनिसि मन ले उनमन रहै , गम की छाड़ी अगम की कहै।
छाड़े आशा रहै निरास , कहै बह्मा हूँ ताको दास ।
अरधै जाता उरधै धरै , काम दग्ध जे जोगी करै ।
तजे अलिंगन काटै माया , ताका विसनु पखालै पाया ।
मरो वै जोगी मरो , मरो मरन है मीठा।
तिस मरणी मरौ , जिस मरणी गोरख मरि दीठा ।।
सम्पूर्ण जम्भेश्वरजी के सिद्धान्त शब्द का मूल यही शब्द दृष्टि गोचर होता है। अन्य शब्दों में भी इसी प्रकार की साम्यता देखने को मिलती है। यहाँ पर उदाहरणार्थ यह शब्द सुनाया गया है। जैसे-अगम, अगोचर, गगन, अहनिस, निहचल, उनमुन, गम, अगम, आशा, निरासा, अरधै, उरधै, अल्यगन, विसनु, पांव पखाले इत्यादि शब्द जम्भेश्वरजी की वाणी में यत्र तत्र सर्वत्र प्रयोग हुए है। तथा मरो वे इत्यादि सिद्धान्त तो ज्यों के त्यों शब्दों में आया है। यथा -
जीवत मरो रे जीवत मरो , जाँ जीवन की विध जाणी ।
जे कोई आवै हो हो करता , आप जै हुइये पाणी ।।
इन शब्दों की साम्यता से तो यही दृष्टि गोचर होता है कि शब्द सिद्धान्त आदि दोनों सद्गुरु ओं के एक ही थे। इसलिये तो नाथ पंथ से भ्रष्ट, केवल नाम मात्र के योगी जनों को जाम्भोजी ने शब्दों द्वारा फटकार सुनाई है। इस गोरख के पवित्र पंथ को कुछ अनधिकारी लोगों ने दूषित करने की कोशिश की थी। सद्गुरु जाम्भोजी ने उसे पुनः शुद्ध करने की कोशिश की थी।
हे शिष्य! जाम्भोजी महाराज जब सम्भराथल पर विराजमान थे, उस समय मैं भी वहीं था तथा अन्य बहुत से लोग वहाँ पर उपस्थित थे। जब हमने अपनी आँखों से देखा था कि वहाँ पर गुरु शिरोमणि गोरख एवं उनके शिष्य गोपीचन्द और भरथरी ये तीनों सम्भराथल पर आये थे। हमने अपनी आँखों से देखा था किन्तु पहचान नहीं सके थे। उस समय गुरु देव ने गोपीचन्द और भरथरी को लक्ष्य करके यह शब्द भी सुनाया था-
सुण गुणवंता सुण बुधवंता , मेरी उत्पति आदि लुहारूं।
भाठी अंदर लोह तपीलो , तंतक सोना घड़ै कसारूं ।
मेरी मनसा अहरण नाद हथोड़ो , शशीयर सूर तपीलो ।
पवन अधारी खालूं , जेथे गुरु का शब्द मानीलो ।
लंघिबा भवजल पारूं। आसण छोड़ि सुखासण बैठो , जुग जुग जीवै जम्भ लुहारूँ ।।
गोपीचन्द-भरथरी की यहाँ पर बहुत बड़ाई की है तथा अपना परिचय भी इस शब्द द्वारा दिया है। कहा है कि-मैं तो आदि सृष्टि रचयिता, कुम्हार की भांति जगत की रचना करता हूँ।
हे गोपीचन्द-भरथरी! यदि आप लोग गुरु का शब्द मान लो, तो भवसागर से पार उतर जाओगे। इस शब्द को श्रवण करके वे लोग वहाँ से अदृश्य हो गये थे। उन्होंने कुछ बिना बोले इशारे से भी बाते की थी, हम तो नहीं समझ पाये कि वार्ता हो रही थी। उनके चले जाने के पश्चात् हमने गुरु देव से पूछा कि ये महानुभाव योगी कौन थे?
गुरु देव ने बतलाया था कि ये तो गुरु शिरोमणि गोरख यति और गोपीचन्द-भरथरी थे। अपने दोनों शिष्यों को साथ लेकर यहाँ पर आये थे। हमारी अपनी निजी वार्तालाप थी। तुम लोग नहीं समझ पाओगे।
हमने कहा हे गुरु देव! आपने हमें पहले नहीं बतलाया यदि बतलाते तो हम दर्शन अवश्य ही करते। अभी हमने दर्शन तो किया, किन्तु अज्ञानतावश पहचान नहीं सके थे। हे गुरु देव! क्या ये अब भी जिंदे है, कहाँ रहते है? क्या करते हैं? अभी भी यदि हमें दर्शन हो सके तो हम कृत कार्य हो जायेंगे। अपने जीवन को सफल कर लेंगे।
गुरु देव ने कहा हे शिष्यो! अब तो वह्य बहुत दूर चले गये हैं। उनकी काया अब तक अजर-अमर है। अपनी इच्छानुसार भ्रमण करते रहते हैं। किन्तु अब वो थक गये हैं , नाक-नाक आ गये हैं। यही इशारा उन्होने नाक के हाथ लगाकर किया था।
शिष्यों ने पूछा-हे गुरु देव! जब वे नाक-नाक आ गये तो आपने क्या जवाब दिया था? कृपया बतलाने का कष्ट करें? जाम्भोजी बोले हे शिष्यो! मैंने यही कहा था आपने ही तो इस इस जिना से अजर अमरता माँगी थी। पहले इसको वश में करते, फिर माँगते, क्या माँगना है? अब तो इस जीवन को जैसै तैसै जीओ। अब क्या हो सकता है , जो होना था वो हो गया ।
हे गुरु देव! लम्बी आयु तथा अमरता से वे योगी क्यों ऊब गये थे? हम तो सभी लोग दीर्घ आयु चाहतें हैं। हे शिष्यो! अधिक आयु भी दुःखदायी है। दूर के ढोल बहुत ही सुहावने लगतें हैं। एक ही तरह का जीवन सदा एक ही रहन-सहन, सदा ऊबाऊँ होता है, क्योंकि मानव स्वभाव से ही सदा नया चाहता है। यही प्रकृति का नियम है। यदि इस नियम के विरुद्ध चलेंगे तो अवश्य ही उपद्रव होगा।
दुनिया बड़ी विचित्र है। जिस प्रकार से भी आप जियेंगे तो भी दुनिया वाले टीका टिप्पणी करेंगे ही। फिर भी-ज्यों ज्यों दुंनिया करे खुवारी, त्यूं त्यूं किरिया पूरी। दुनिया निन्दा करे, कुछ भी कहे फिर भी अपनी किरिया (कर्म धर्म) से न हटे, अपना धर्म पूर्णतया निभाये। तभी संसार में अपना कार्यक्रम चल सकता है। अन्यथा तो भटक ही जायेगा गोपीचन्द-भरथरी जैसे योगी भी दुनिया से तंग आ गये, तो साधारण जनों की तो बात ही क्या है?
हे शिष्य वील्हा! इस समय जितने भी संत-पंथ चल रहे हैं, कोई भी संत सिद्धि को प्राप्त हो रहा है, जो भी हुआ है, वे सभी गोरख यति के ऋ णी हैं। सभी का मूल गोरख ही है। संसार के लिये गोरख की बहुत बड़ी देन है। भक्ति ज्ञान, योग की ऐसी संगम त्रिवेणी गोरख ने प्रवाहित की है उसी में ही सभी परवर्ति संत सिद्ध स्नान कर रहे हैं, और आगे भी करते रहेंगे। मेरी समझ में यदि ऐसे गोरखयति भगवान् विष्णु-शिव स्वरूप को जम्भेश्वरजी गुरु भाव से मानते हैं तो इसमें कोई अनहोनी या आपति नहीं है। किन्तु वर्तमान में नाथ सम्प्रदाय गोरख को अपना गुरु कहते है। किन्तु वैसा आचरण करते नहीं हैं इसलिये उन्होंने नाथजी को दूषित कर दिया है, जाम्भोजी नह्य सम्प्रदाय का खण्डन किया है। गोरखनाथजी की तो बहुत प्रशंसा की है।