पहला अध्याय · कथा 1
जाम्भा पुराण
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुर्साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः।।
फाल्गुन बदी अमावस्या को मुकाम मेला लगा हुआ था। विशाल हवन हो रहा था, शब्दों का सस्वर पाठ हो रहा था। बिश्नोई भक्त-संत शुभ समय का लाभ उठा रहे थे। मुकाम के अति निकट हिमटसर गाँव में संतों की जमात ने आकर आसन लगाया था। प्रातःकालीन शुभ वेला में मुकाम मन्दिर से शब्दों की ध्वनि हिमटसर में संतमण्डली के कानों में गुंजायमान हुई। उन संत मण्डली में बालक वील्होजी ने ध्यानपूर्वक सुना। वह अधिकारी बालक आकर्षित हुआ। कर्णप्रिय शब्दों को सुनकर अपने अन्य साथी साधुओं से पूछा कि इधर जो शब्दों की ध्वनि आ रही है, वह क्या है? साथी साधु तो अनजान थे। कुछ भी नहीं बता सके। किन्तु उसी गाँव की एक वृद्धा स्त्री ने बताया कि इधर जहाँ से शब्दों के ध्वनि आ रही है, उधर जाम्भा द्वारा है।
वील्होजी अभी अन्धे थे। आँखों से भी तथा ज्ञान से भी। अपने साथियों से कहने लगे-मुझे वहाँ ले चलो, जहाँ से आवाज आ रही है। मैं अपने आप को रोक नहीं पा रहा हूँ। मुझे अब वहाँ जाना ही पड़ेगा। मेरी सोई हुई आत्मा, संस्कार जाग गये हैं। साथी साधुओं ने वील्होजी संत की भावना देखी और मुकाम मंदिर तक पहुँचा दिया।
वील्होजी ने पहली बार हवन-ज्योति का साक्षात्कार किया था तथा वेदवाणी शब्दों का श्रवण किया था। शब्द श्रवण एवं ज्योति दर्शन से वील्होजी के अन्तर एवं बाह्य दोनों नेत्र खुल गये थे और वाह-वाह कहने लगे थे। प्रथम बार शब्द श्रवण करने से ही 120 शब्द कण्ठस्थ हो गये थे तथा पुनः दोहराने लगे थे। वहाँ पर उपस्थित साधु श्री नाथोजी, उधवजी आदि ने वील्होजी को जाम्भोजी का उत्तराधिकारी जानकर जो पोशाक सफेद चादर,चोलो,टोपी एवं माला जाम्भोजी ने धरोहर रूप में रखी थी, वह वील्होजी को प्रदान करके नाथोजी ने अपना शिष्य बना लिया। जाम्भोजी द्वारा कहे गये 120 शब्द-मंत्र आदि नाथोजी को याद थे। उन्हीं को वील्होजी ने धारण किया तथा आगे प्रचार-प्रसार किया।
वील्होजी ने अपने साथियों से कहा कि मैं तो अब यही रहूँगा। मुझे मेरा स्थान मिल गया है। आप लोग स्वेच्छा से जा सकते हैं। वील्होजी ने अपने गुरु नाथोजी से गुरुमंत्र लिया और पंथ के बारे में तथा जाम्भोजी के बारे में अपने गुरु नाथोजी से वार्तालाप करते हुए पूछा कि-हे गुरुदेव! इस असार संसार सागर में युक्तिपूर्वक जीवन एवं मुक्ति किस प्रकार से हो सकती है? मैं जहाँ तक समझता हूँ, इस प्रकार से अज्ञान अन्धकार के रहते हुए सतपंथ तो दिखाई भी नहीं पड़ता है। आप हमें संसार सागर से पार उतरने के लिए दृढ़ नौका प्रदान कीजिए। यह बिश्नोई पंथ है, जिसमें मैं आपकी कृपा से सम्मिलित हुआ हूँ। क्या यह मुझे सच्चे घर पहुँचा देगा? यह पंथ कब और कैसे चला? यह मैं आपसे जानना चाहता हूँ? इस पंथ के स्वामी भगवान श्री जाम्भोजी ही हमारे सतगुरु हैं। उन्हीं के बारे में यदि विस्तार से जान सकूँ, तो मैं अनन्त खुशी प्राप्त कर सकूंगा। इन्हीं सभी प्रश्नों के बारे में आप से अधिक ज्ञाता आचार्य इस समय मुझे कोई नहीं दिख रहा है।
हे गुरुदेव! आप सदा ही अति निकट रहे हैं। आपने परमेश्वर का सान्निध्य सुख प्राप्त किया है। जाम्भोजी के प्रति आपकी अगाध श्रद्धा उनके साथ ले जाने में समर्थ नहीं हो सकी, इसका कारण क्या है?
आप अपने प्राणों के चले जाने पर भी अभी जीवित रहकर कुछ शून्य में निहार रहे हैं। लगता है कि आप किसी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। क्या आपको गुरु महाराज ने जीवन धारण करने का आदेश दिया था। इसलिए आप अनमने मन से जीवन जी रहे हैं। जाम्भोजी आपको अपनी धरोहर शब्दवाणी, समर्पित करके गये हैं। आप उसकी सुरक्षा कर रहे हैं, तथा किसी अधिकारी शिष्य को प्रदान करना चाहते हैं। यदि मैं इस धरोहर को सम्भालने में सक्षम अधिकारी हूँ, तो आप मुझे प्रदान कीजिये। मैं आपकी कृपा से इसका विस्तार करूँगा। कंजूस की भांति आपकी विद्या को संकुचित नहीं करूँगा। मैंने जो कुछ भी जानना चाहा है, या अनभिज्ञता के कारण आप से जानने की प्रार्थना नहीं की है, वह सभी यदि कहने योग्य हो तथा मुझे अधिकारी समझते हो तो कहने की कृपा करें।
नाथोजी कहने लगे- हे शिष्य! यह संसार तो चलायमान है। यहाँ की कोई वस्तु स्थिर नहीं है। जाम्भोजी महाराज ने बतलाया था कि अनेक-अनेक चलंता दीठा, कलि का माणस कौन विचारूं यहाँ पर सदा- सदा के लिए रहने की कोशिश मत करो।
युक्तिपूर्वक जीवन जीने से ही मुक्ति हो सकती है। मुक्ति का अर्थ है कि जन्म-मरण के चक्कर से छूट जाना, भगवान् के पास ही विराजमान हो जाना या भगवान् के लोक तक पहुँच जाना अथवा भगवान् के पास पहुँचने की योग्यता प्राप्त कर लेना। कुल मिलाकर के यह कहा जा सकता है कि पुनः जन्म नहीं होगा तो मृत्यु कहाँ से होगी? यह मुक्ति तो सदाचार जीवन जीने से संभव है। युक्तिपूर्वक जीवन जीने की कला बिश्नोई सतपंथ में बतलाई, अन्यत्र दुर्लभ है। जां जीवन की विधि जांणी। जीने की कला से ही युक्त यह जीवन है एवं सतपंथ है।
वील्होजी ने सतपंथ की बात श्रवण करके पूछा कि - हे गुरुदेव! यह सतपंथ क्या जम्भदेवजी ने ही चलाया था या इससे पूर्व भी था? यदि प्रथम बार ही जाम्भोजी ने पंथ स्थापना की है, तो कब व किस काल में उदय हुआ और यदि इससे पूर्व भी यदि पंथ की स्थापना हो चुकी थी, तो सर्वप्रथम इस पंथ का प्रकाशक कौन था? आप कृपा करके इस युक्तिमुक्ति दाता पंथ के बारे में विस्तार से वर्णन कीजिए। मैं आपकी वार्ता श्रवण करते हुए तृप्ति को प्राप्त नहीं हो रहा हूँ। उत्तरोत्तर मेरी जिज्ञासा बलवती होती जा रही है।
नाथोजी आचार्य बोले- हे शिष्य! तुमने ये महत्वपूर्ण सवाल पूछकर इस सतपंथ के बारे में जानने की जिज्ञासा प्रकट की है। गुरु जाम्भोजी द्वारा बताये गये मार्ग का मैं अनुयायी हूँ। मुझे इस पंथ पर चलने में आनन्द की अनुभूति होती है। वह आनन्द मैं अधिकारी शिष्य को प्रदान करना चाहता था। अब मुझे तुम्हारे जैसा सुपात्र अधिकारी शिष्य मिल गया है। मैं तुझे प्रत्येक बात विस्तार से बतलाऊँगा। ध्यानपूर्वक श्रवण करो।