बारहवाँ अध्याय · कथा 79
जैतसी का मुकाम मन्दिर में आगमन
वील्हो उवाच -हे गुरु देव !क्या सिद्धेश्वर साक्षात विष्णु स्वरूप जाम्भोजी हम लोगो को छोड़ कर चले गये? क्या उनका दर्शन दुर्लभ हो गया? उन्होंने पच्चासी वर्षो में अनेक लीलाएँ की थी। क्या अब भी यदा कदा किसी ने उनकी लीला चरित्र प्रत्यक्ष देखा है? आगे भी देखते रहेंगे ऐसी संभावना है? बिना चमत्कार के तो नमस्कार नहीं होगा। आपने आदेश दिया है कि जाम्भोजी की आज्ञा का मैं पालन करूँ, किन्तु मेरे में कुछ भी तो शक्ति नहीं है। मैं यह दुरूह कार्य कैसे निभाऊँगा? ऐसा प्रश्न पूछने पर नाथोजी कहने लगे -
हे शिष्य! जाम्भोजी के बैकुण्ठ वास, शरीर का अन्तर्धान होने के पश्चात् की बात बतलाता हूँ। जिससे तुम्हें आश्चर्य एवं विश्वास होगा। जाम्भोजी कहीं गये नहीं हैं। न तो वे जन्म लेते हैं और न ही उनके माता-पिता, बहन-भाई आदि कुटुम्बी भी हैं। जिनका जन्म नहीं होगा, तो वह मरेगा भी कैसे? आवश्यकता पड़ने पर चमत्कार भी दिखाते हैं। आगे भी मौजूद रहेंगे। उन्होंने कहा है -“गुरु आसन सम्भराथले”गुरु का आसन तो सदैव ही सम्भराथल पर विद्यमान रहेगा। आप लोग भूल नहीं करना।
हे वील्ह ! जांभोजी के अन्तर्धान होने के पश्चात् संवत पन्द्रह सौ अठानवै के प्रारम्भ काल की बात है। जब मुकाम समाधि मन्दिर बन कर तैयार हो गया था। बीकानेर का राजा जेतसी जाम्भोजी का परम भक्त था। उन्होंने जाम्भोजी की कृपा से ही राज्य प्राप्त किया था। मंदिर बनवाने में भी पूरा सहयोग दिया था। जेतसी अपने साथ में अपने मित्र नागौर के राजा को तथा कवि को साथ में लेकर मुकाम आया था। यह देखना था कि मंदिर की प्रतिष्ठा हो गयी है। कैसी व्यवस्था चल रही है। जैतसी ने मंदिर के चारों तरफ परिक्रमा की और सीढ़ी लगाकर मंदिर के ऊपर चढ़ा, तथा निज मंदिर में चढ़ावा किया और कहने 4गा-
“जाम्भोजी री जायगा बड़ी जायगा।” उसी समय ही साथ में एक राजपूत था उसने एक दोहा कहा-
“ छाया खोज न दीसतो, सोह हूँतो जिणरो कह्यो।
खुध्या तिस नींद न व्यापती, थांहरो जांभो हूँ पणि मर गयो।
“ उस कवि का कहने का यह आशय था कि जाम्भोजी के शरीर की छाया नहीं होती थी। उनके पैरों के निशान नहीं होते थे। तृष्णा, भूख और नींद नहीं सताती थी। छः उर्मियों से उपर उठे हुए थे। जैसा वो कहते थे, वही होता था। उनके वचन सिद्ध थे। ये सभी गुण धर्म होते हुए भी तुम्हारे जाम्भोजी मर गये।
हे वील्ह! उस समय वहाँ पर हम लोग उपस्थित थे। प्रथम तो उस राजपूत ने जो कहा वह यथार्थ ही था। उससे हम प्रसन्न थे। किन्तु अंतिम पंक्ति में जाम्भोजी के मरने की बात कही, वह हमारे लिए असहनीय थी। वह तो बिल्कुल अनर्गल बात थी। निंदा वचन को हम कैसे सहन कर सकते थे। उसी समय ही निहालदास ने उनके जवाब में एक अन्य कवित कहा-
“ अंजू गंग जल बहै, अंजू छलियो रेणायर।
अंजू मेर नहीं र्टयो, अंजू रिव तपै दिणायर।
अंजू चंद आकासि, अंजू घण पवण फ रकै।
अंजू त्रिख रिख वनि बसै, अंजू कपूर महकै।
तीन लोक चवदै भुवण, वंदन मुखि जग जस भयौ।
संसार करन अछै अभै, मं कहि मं कहि जाम्भो मुवौ।
निहालदासजी ने जवाब देते हुए बतलाया- कि जाम्भो मूवो” जाम्भोजी मर गये, ऐसा क्यों कहा है? यह असंभव है, जाम्भोजी कैसे मर सकते हैं? अब तक गंगा जल बहता है। अब तक समुद्र में जल भरा हुआ है। अब तक सुमेरू पर्वत अपने स्थान पर अडिग है। अब तक सूर्य उगता है और ह्म्पता है। अब तक चन्द्रमा आकाश में चमकता हुआ दिखाई देता है। अब तक पवन चलती है। सभी को श्वास रूप से जीवन प्रदान करती है। अब तक सप्तर्षि वन में बसते हैं। अब तक कपूर में महक आती है। जाम्भोजी की महिमा तो तीन लोक एवं 14 भवनों में फैल रही है। उनकी वन्दना करने से जगत में यश की प्राप्ति होती है। वे तो साक्षात् विष्णु जगत के कर्ता, धर्ता, अभय दान देने वाले, यहीं पर ही विद्यमान हैं। जाम्भो मर गया,ऐसा न कहो, न कहो।
“दूहो कवत जैतसी सांभल्या, ल्यौनी देखा, खोल्य न देखों, बिश्नोई अर्ज करण लागा, चवदस रे दिन कजियौ रहयो, साम्ही अमावस री राति आई, नाल्हाजी ने राति सुता आवाज हुई, खोले तो खोलण द्यो, मति पालियौ, आहं की निसा करिस्या, परभात तबूत खोल्य दरस्या, माथ पसेव का मोती, हाथे जप माली फि रै। कहण लागा- बीजा रा सबद साचा न पिंड काचा। जाम्भाजी रा सबद ह साचा पिंड इ साचा। अतरी कह- पछे पछतावो कियो, असड़ो कोई हिंदवाण तुरकाण कई कीयौ नही सो आपा कीयौ। अपार रो पार कीणी पायो न पायसी। हमें कोई हींदवाण तुरकाण विचारज्यो मती।
उपर्युक्त दोहा कवित जैतसी ने सुनकर सचेत हुआ और कहने लगा- यदि ऐसी बात है तो समाधि खोलकर देख लेते हैं। हे वील्ह! उस समय वहाँ पर उपस्थित बिश्नोई भाई बन्धुओं ने राजा के सामने प्रार्थना करते हुए कहा- ऐसा मत करो। तुम्हारे लिए यह ठीक नहीं होगा। किसी भक्त राजा को ऐसा दुःसाहस नहीं करना चाहिये। इस प्रकार से संवत पन्द्रह सौ अठानवें की वैशाख कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को आपस में विवाद रहा। रात्रि को अमावस्या थी। इसलिए वहाँ पर काफी लोग उपस्थित थे। बिश्नोई कहने लगे हम समाधि को नहीं तोड़ने देंगे। राजा है तो क्या हुआ? बलिदान हो जायेंगे। ऐसा अधर्म कदापि नहीं होने देंगे।
निहा4दास ने रात्रि में प्रार्थना करते हुए कहा- हे देव! मैंने तो आपकी कृपा से जो कुछ कहना था, वह कह दिया। यह मेरा कथन केवल कवित ही न रह जाये। मेरे वचन को सत्य करने की आप कृपा करेंगे। अन्यथा सुबह वह राजा समाधि तोड़ देगा। सभी के सामने आप और हम लज्जित हो जायेंगे। इस प्रकार की करुण पुकार करते हुए निहालदास सो गये। रात्रि में आकाशवाणी सुनाई दी कि हे नाल्हा! यदि समाधि खोलते हैं तो खोलने देना। उन्हें रोकना नहीं। उनको विश्वास दिलायेंगे।
प्रातःकाल वैशाख की अमावस्या के अवसर पर समाधि की एक डाबड़ी उखाड़ी और राजा ने स्वयं अन्दर झाँक कर देखा कि जाम्भोजी ज्यों के त्यों ज्योतिस्वरूप बैठे हुए हैं। उनके माथे पर पसीने की बूँदें मोती की तरह चमक रही हैं। हाथ में माला जप रहे हैं। जैतसी कहने लगा- अन्य महापुरुषों के तो केवल शब्द ही सच्चे हैं, शरीर कच्चा है। जो फूट गया, टूट गया, बिखर गया। किन्तु जाम्भोजी के तो शब्द ही सत्य है और शरीर भी सत्य सनातन है। इतना कहते हुए उसने वापिस सिला लगा दी। आँखें चकाचौंध हो गयी और पछतावा करने लगा- मैंने बड़ा भारी अपराध किया है। जाम्भोजी के शब्द नहीं माने और उन्हें दह्यखने की कोशिश की। निर्माण की हुई समाधि को तोड़ा। इस प्रकार का कार्य न तो किसी हिन्दू ने किया और न ही किसी मुसलमान ने किया। जो आज हमने करके दिखाया।
उस अपार का पार अब तक किसी ने भी नहीं पाया है और न ही कभी पा सकेगा। आगामी इस प्रकार की घटना किसी को भी नहीं करनी चाहिये। इस प्रकार का परचा लेकर जैतसी वापिस बीकानेर पहुँचा। अपने परिवार को यह घटना बतलायी और कहा- मैं तो अतिशीघ्र ही संसार से प्रस्थान करूँगा। आप लोग सदा ही जाम्भोजी के प्रति श्रद्धा एवं विश्वास रखें। तुम्हारा राज्य सुचारू रूप से चलता रहेगा। तुम नहीं जानते, मुझे यह राज स्वयं जाम्भोजी की कृपा से ही मिला था। ,